पार्थिव पूजनं

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

पार्थिव पूजनं अनुप्रयोग

भूमिका

कृते रत्नमयं लिंगं त्रेतायां हेमसंभवम् ।
द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे ॥

यथा सर्वेषु देवेषु ज्येष्ठः श्रेष्ठो महेश्वरः ।
एवं सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥

A serene clay Shivling being worshipped with flowers and diya in a traditional setup
A serene clay Shivling being worshipped with flowers and diya in a traditional setup

य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥

श्रीमद्भगवद्गीता/१६/२३

हम जो भी शास्त्रोक्त कर्म करें वह यदि शास्त्रीय विधि से करें तभी सार्थक और फलदायक होता है, शास्त्रविधि का त्याग करके किया गया कर्म नहीं।

वर्त्तमान में सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि कर्म में प्रवृत्त होकर भी उसकी शास्त्रीय विधि को जानने की मति ही होती, उचित विधि से प्रवृत्ति की तो बात ही क्या करें। आगे क्रमशः पार्थिव पूजन की प्रामाणिक विधियां स्पष्ट होंगी और एक स्थान पर सम्पूर्ण विधि नहीं मिलेगी अपितु अनेकों अनुभाग होंगे। एक स्थान पर पार्थिवार्चा में निर्माण व पूजा की पूरी विधि का प्रमाण भी संकलित किया गया है।

लिङ्ग पूजन होने से पूजा विधि भी सरल हो जाता है क्योंकि प्रतिमा बनाने की आवश्यकता नहीं होती। अनेकानेक प्रकार के शिवलिङ्गों का शास्त्रीय विधान है और उसमें से एक पार्थिव शिवलिङ्ग भी है। पार्थिव लिङ्ग का भी तात्पर्य केवल मिट्टी का के शिवलिङ्ग नहीं हैं तदपि मुख्य भाव ग्रहण किया जाता है और मिट्टी का लिङ्ग बनाकर भगवान शिव का पूजन किया जाता है। यही कारण है कि जब हम पार्थिव पूजन की बात करते हैं तो एक ही भाव उत्पन्न होता है – मिट्टी का शिवलिङ्ग बनाकर उनकी पूजा-आराधना करना।

जब महादेव पूजा कहते हैं तो भी मुख्य भाव यही होता है मिट्टी का लिङ्ग बनाकर भगवान शिव की पूजा। यद्यपि यह मुख्य भाव है नहीं तदपि यही ग्रहण किया जाता है।

अस्तु भगवान शिव की उपासना में पार्थिव शिवलिङ्ग निर्माण करके उनकी पूजा करना अपना विशेष महत्व रखता है और मुख्य भाव के रूप में ग्रहण भी किया जाता है। वर्त्तमान में पार्थिव पूजन की विशेष वृद्धि हुई है और श्रावण मास में तो हर कोई पार्थिव पूजन ही करता है।

विगत दो-तीन दशकों में और मुख्य रूप से एक ही दशक में पार्थिव पूजन का जो शास्त्रीय विधान है उसमें बहुत बड़ी व्यावहारिक विकृति को समाविष्ट होते देखा गया है। पूजा होने को तो अधिक होती है किन्तु पूजा विधान की बात करें तो उसका परित्याग कर दिया गया है और शास्त्रीय सिद्धांतों का परित्याग दिखने को मिलता है।

वर्त्तमान युग में सभी ज्ञान इंटरनेट और मोबाईल ऐप से प्राप्त करने का भी प्रचलन हो गया है, शास्त्रों का अवलोकन तो विलुप्त होता जा रहा है। इसका निदान भी यही है कि शास्त्रीय विधान आदि भी मोबाईल ऐप के माध्यम से उपलब्ध हो जिससे सामान्य जन भी शास्त्रीय सिद्धांतों को जान सकें, और शास्त्रीय विधि से पूजनादि में प्रवृत्त हों।

इसी उद्देश्य से पार्थिव पूजनं ऐप को विकसित किया गया है कि केवल कर्मकांडी ही नहीं सामान्य जन भी शास्त्रीय विधानों एवं अन्यान्य नियमों को भी जान सकें। सही विधि यदि ज्ञात ही न हो तो पालन की कल्पना नहीं की जा सकती। उचित विधि से पार्थिव पूजन हो इसके लिये यह आवश्यक है कि उसका ज्ञान भी हो।

इस अनुप्रयोग में सभी आवश्यक तथ्यों को संकलित करने का प्रयास किया गया है और जो कुछ छूटा भी हो उसे भविष्य में संकलित किया जा सकेगा। मुख्य रूप से विधि-विधान आदि का विश्लेषण करते हुये पार्थिव पूजन सामग्री, पार्थिव निर्माण और पार्थिव पूजन विधि एवं मंत्र को संकलित किया गया है। रुद्राष्टाध्यायी आदि के लिये अंतर्जाल से सामग्री उपलब्ध की गई है।

आइये हम पूजा करने के साथ-साथ मुख्य विधि-विधानों को भी समझें ताकि वह पूजा सार्थक हो, क्योंकि शास्त्रविधि से रहित किया गया कर्म निरर्थक ही होता है :

“कलौ चण्डीमहेश्वरौ” जैसा आर्ष वचन कलयुग में विशेष रूप चण्डी और महेश्वर की उपासना के लिये प्रेरित करता है। एक विशेषता यह भी है कि कामनापूर्ति में भी भगवान आशुतोष की उपासना विशेष लाभकारी है। अन्य देवी-देवताओं के लिये प्रतिमा आदि की आवश्यकता होती है किन्तु भगवान आशुतोष की उपासना में लिङ्ग पूजन ही विशेष महत्वपूर्ण है और विशेष कर लिङ्ग पूजन ही किया जाता है। भगवान शिव के मंदिर (शिवालय) में लिङ्ग की ही स्थापना की जाती है।

संपूर्ण कर्मकांड विधि द्वारा “पार्थिव पूजनं” मोबाइल अनुप्रयोग भी विकसित किया गया है। किन्तु मोबाईल अनुप्रयोग में सम्पूर्ण सामग्री व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत करना कठिन कार्य होता है अस्तु वहां सरलता से सम्पूर्ण वैदिक पार्थिव पूजन की प्रस्तुति के लिये यहां “सम्पूर्ण कर्मकांड विधि” पर यह विधि प्रस्तुत की गई है।

सर्वे लिङ्गमया लोकाः सर्वे लिङ्गे प्रतिष्ठिताः।

तस्मादभ्यर्चयेल्लिङ्गं यदीच्छेच्छाश्वतं पदम्॥

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि
worm's-eye view photography of concrete building
worm's-eye view photography of concrete building

सूत उवाच

शृणुध्वमृषयः सर्वे सद्भक्त्या हरतोऽखिलाः ।
शिवपार्थिवलिंगस्य महिमा प्रोच्यते मया ॥

उक्तेष्वेतेषु लिंगेषु पार्थिवं लिंगमुत्तमम् ।
तस्य पूजनतो विप्रा बहवः सिद्धिमागताः ॥

हरिर्ब्रह्मा च ऋषयः सप्रजापतयस्तथा ।
संपूज्य पार्थिवं लिंगं प्रापुःसर्वेप्सितं द्विजाः ॥

देवासुरमनुष्याश्च गंधर्वोरगराक्षसाः ।
अन्येपि बहवस्तं संपूज्य सिद्धिं गताः परम् ॥

कृते रत्नमयं लिंगं त्रेतायां हेमसंभवम् ।
द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे ॥

अष्टमूर्तिषु सर्वासु मूर्तिर्वै पार्थिवी वरा ।
अनन्यपूजिता विप्रास्तपस्तस्मान्महत्फलम् ॥

यथा सर्वेषु देवेषु ज्येष्ठः श्रेष्ठो महेश्वरः ।
एवं सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥

यथा नदीषु सर्वासु ज्येष्ठा श्रेष्ठा सुरापगा ।
तथा सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥

यथा सर्वेषु मंत्रेषु प्रणवो हि महान्स्मृतः ।
तथेदं पार्थिवं श्रेष्ठमाराध्यं पूज्यमेव हि ॥

यथा सर्वेषु वर्णेषु ब्राह्मणःश्रेष्ठ उच्यते ।
तथा सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥

यथा पुरीषु सर्वासु काशीश्रेष्ठतमा स्मृता ।
तथा सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥

यथा व्रतेषु सर्वेषु शिवरात्रिव्रतं परम् ।
तथा सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥

यथा देवीषु सर्वासु शैवीशक्तिः परास्मृता ।
तथा सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥

प्रकृत्यपार्थिवं लिंगं योन्यदेवं प्रपूजयेत् ।
वृथा भवति सा पूजा स्नानदानादिकं वृथा ॥

पार्थिवाराधनं पुण्यं धन्यमायुर्विवर्धनम् ।
तुष्टिदं पुष्टिदं श्रीदं कार्यं साधकसत्तमैः ॥

यथा लब्धोपचारैश्च भक्त्या श्रद्धासमन्वितः ।
पूजयेत्पार्थिवं लिंगं सर्वकामार्थसिद्धिदम् ॥

यः कृत्वा पार्थिवं लिंगे पूजयेच्छुभवेदिकम् ।
इहैव धनवाञ्छ्रीमानंते रुद्रो भिजायते ॥

त्रिसंध्यं योर्चयंल्लिंगं कृत्वा बिल्वेन पार्थिवम् ।
दशैकादशकंयावत्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

अनेनैव स्वदेहेन रुद्र लोके महीयते ।
पापहं सर्वमर्त्यानां दर्शनात्स्पर्शनादपि ॥

जीवन्मुक्तः स वैज्ञानी शिव एव न संशयः ।
तस्य दर्शनमात्रेण भुक्तिर्मुक्तिश्च जायते ॥

शिवं यः पूजयेन्नित्यं कृत्वा लिंगं तु पार्थिवम् ।
यावज्जीवनपर्यंतं स याति शिवमन्दिरम् ॥

मृडेनाप्रमितान्वर्षाञ्छिवलोकेहि तिष्ठति ।
सकामः पुनरागत्य राजेन्द्रो भारते भवेत् ॥

निष्कामः पूजयेन्नित्यं पार्थिवंलिंगमुत्तमम् ।
शिवलोके सदा तिष्ठेत्ततः सायुज्यमाप्नुयात् ॥

पार्थिवं शिवलिंगं च विप्रो यदि न पूजयेत् ।
स याति नरकं घोरं शूलप्रोतं सुदारुणम् ॥

यथाकथंचिद्विधिना रम्यं लिंगं प्रकारयेत् ।
पंचसूत्रविधानां च पार्थिवेन विचारयेत् ॥

अखण्डं तद्धि कर्तव्यं न विखण्डं प्रकारयेत् ।
द्विखण्डं तु प्रकुर्वाणो नैव पूजाफलं लभेत् ॥

रत्नजं हेमजं लिंगं पारदं स्फाटिकं तथा ।
पार्थिवं पुष्परागोत्थमखंडं तु प्रकारयेत् ॥

अखंडं तु चरं लिंगं द्विखंडमचरं स्मृतम् ।
खंडाखंडविचारोयं सचराचरयोः स्मृतः ॥

वेदिका तु महाविद्या लिंगं देवो महेश्वरः ।
अतो हि स्थावरे लिंगे स्मृता श्रेष्ठादिखंडिता ॥

द्विखंडं स्थावरं लिंगं कर्तव्यं हि विधानतः ।
अखंडं जंगमं प्रोक्तं शैवसिद्धान्तवेदिभिः ॥

द्विखंडं तु चरां लिंगं कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः ।
नैव सिद्धान्तवेत्तारो मुनयः शास्त्रकोविदाः ॥

अखंडं स्थावरं लिंगं द्विखंडं चरमेव च ।
येकुर्वन्तिनरामूढानपूजाफलभागिनः ॥

तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना अखंडं चरसंज्ञकम् ।
द्विखंडं स्थावरं लिंगं कर्तव्यं परया मुदा ॥

अखंडे तु चरे पूजा सम्पूर्णफलदायिनी ।
द्विखंडे तु चरे पूजामहाहानिप्रदा स्मृता ॥

अखंडे स्थावरे पूजा न कामफलदायिनी ।
प्रत्यवायकरी नित्यमित्युक्तं शास्त्रवेदिभिः ॥

॥ इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां साध्य साधन खंडे पार्थिव शिवलिंग पूजनमाहात्म्य वर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥

माहात्म्य

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

मंडल विषयक चर्चा में एक तथ्य विशेष महत्वपूर्ण है कि यदि ५० – ६० वर्ष के वृद्ध से पूछें तो कहेंगे कि पहले एक भी मंडल नहीं बनता था और यदि नयी पीढ़ी से बात करें तो ज्ञात होगा कि जितने मंडल बनें उतनी विशेष पूजा। पार्थिव पूजन में मंडल विषयक चर्चा बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि आप पार्थिव पूजन का विधान जानना चाहते हैं तो पार्थिवार्चा का विशेष रूप से अवलोकन करके समझने का प्रयास करें ।

पार्थिव पूजन में एक भी मंडल बनाने की चर्चा नहीं है । ये मतिभ्रम और अज्ञान है जो कर्मकाण्ड में प्रवृत्त होने पर भी स्वेच्छाचारी ही बना रहा है, कारण अन्न-धन का दोष है । जब वैदिक विधि से पार्थिवार्चा विधान में भी मंडल प्रयोग नहीं मिलता तो किस आधार से किया जा रहा है यह गंभीर प्रश्न है और उन सबसे पूछना आवश्यक है।

आइये संक्षेप में मंडल की आवश्यकता को बिन्दुवार समझते हैं :

वृद्धिश्राद्ध जब हो तब मातृका पूजन व वसोर्द्धारा अनिवार्य है, वृद्धिश्राद्ध न करते हुए जहां कहीं भी मातृका मंडल बनाया जाता है वह हास्यास्पद शास्त्र विधान के विपरीत है।

वास्तु शांति के अतिरिक्त जब आहुति की संख्या सहस्राधिक हो अथवा कुण्ड निर्माण किया गया हो तो वास्तु शांति आवश्यक है और वास्तु मंडल बनाया जायेगा। पार्थिव पूजन में वास्तु मंडल की कहीं से कोई आवश्यकता नहीं होती है। हां तब अवश्य आवश्यकता होगी जब १००० से अधिक पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया गया हो और १००० से अधिक आहुति भी देनी हो। केवल पार्थिव निर्माण के अनुसार ही वास्तु मंडल का निर्णय नहीं होगा अपितु कुण्ड बना या नहीं, आहूति की संख्या कितनी है इसके आधार पर होगा।

हवन काल में जब सविधि हवन करें तो वहां नवग्रह मख आवश्यक होता है। हवन कुण्ड के ईशान कोण में नवग्रह मंडल बनाने का विधान है। अर्थात केवल नवग्रह मंडल बनाकर ईशान कोण में लगा दिया और हवन करेंगे ही नहीं अथवा हवन कहीं अन्यत्र करेंगे तो त्रुटि है। हवन जहां करेंगे वहीं ईशान कोण का विचार किया जायेगा।

प्रधानदेवता से संबंधित मंडल अथवा सर्वतोभद्र, अष्टदल आदि सामान्य विधान है।

पार्थिवार्चा का एक निषेधात्मक नियम भी है कि पार्थिव निर्माण करके पार्थिव (सांग/सपरिवार) पूजन ही करे अन्य किसी देवता की न करे । अर्थात् कलश स्थापन-पूजनादि भी पार्थिव निर्माण से पूर्व ही करे । यदि पूर्व न किया गया हो तो पार्थिव निर्माण के पश्चात् वो भी निषिद्ध हो जाता है। फिर ये मंडल बनाकर इस निषेधाज्ञा का उल्लंघन ही किया जाता है।

प्रकृत्यपार्थिवं लिंगं योन्यदेवं प्रपूजयेत् ।
वृथा भवति सा पूजा स्नानदानादिकं वृथा ॥

चतुर्लिंगतोभद्र वा सर्वतोभद्र एक अवस्था में बनाई जा सकती है यदि पार्थिव को उस मंडल पर स्थापित करके पूजन करना हो । प्राधान मंडल की आवश्यकता प्रधान देवता के लिये ही होती है।

इस प्रकार उपरोक्त सभी तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि पार्थिव पूजन में ढेरों मंडल बनाना पाण्डित्य सिद्धि नहीं करता है अपितु अपाण्डित्य सिद्ध करता है।

विशेष प्रामाणिक तथ्य सम्पूर्ण कर्मकाण्ड विधि पर द्रष्टव्य। पांडित्य का मूल मंडलों की कतार बनाने में समझना एक बड़ा भ्रम है और इस भ्रम का सर्वथा परित्याग अपेक्षित है। मंडल की कब-कहां-क्यों आवश्यकता होती है इसको भलीभांति समझे बिना मंडल बनाना शास्त्र उल्लंघन की श्रेणी में ही आता है। क्योंकि जहां जिस मंडल की शास्त्रज्ञा हो वहां उसका निर्माण करे और जहां न हो वहां न करे। सभी पूजन में यज्ञ की विधियां प्रचलित नहीं हो सकती।

मंडल

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

हवन का तात्पर्य विधिपूर्वक स्थापित अग्नि में सावधानी से उत्तम द्रव्यों की आहुति देना होता है न कि अलाव लगाना। प्रायः देखा यही जाता है कि अलाव लगाकर उसमें शाकल्यादि नामक द्रव्य देना मात्र ही हवन समझा जाता है जो की सर्वथा भ्रम है। यदि ठंड में ऐसे अलाव लगायें तो एक लाभ आग सेंकना प्राप्त हो भी सकता है किन्तु गर्मी में तो वो भी दग्ध ही करने वाला होता है।

शास्त्रों में देवताओं के दो मुख कहे गये हैं :- १. अग्नि और २. ब्राह्मण का मुख । पूजा के समय जो भोग (नैवेद्य) अर्पित किया जाता है उसमें भाव को प्रधान कहा गया है, भगवान उस भोग का नहीं अपितु भाव का भोग लगाते हैं और अर्पित किया गया भोग प्रसाद स्वरूप पुनः हम ही ग्रहण करते हैं।

शतपथ ब्राह्मण – देवा अग्निमुखा अन्नमदन्ति, यस्यै कस्यै च देवतायै च जुह्वति, अग्नावेव जुह्वति, अग्निमुखा हि तद्देवा अन्नमकुर्वत

  • ये सिद्ध होता है कि हवन में हम परोक्ष देवता को प्रत्यक्ष भोजन करा रहे होते हैं ।

  • हवन में भाव व श्रद्धा तो आवश्यक होता ही है साथ-साथ मन्त्र, विधान, वस्तु, शुद्धता, संस्कार आदि भी अनिवार्य होता है।

  • होमकर्म में असंस्कृत कुछ भी प्रयुक्त होने पर वह आसुरी-श्रेणी प्राप्त कर लेता है।

  • पहले होत्री स्वयं संस्कारित होकर अग्निस्थापन से पूर्व भूमि, स्थण्डिल या कुण्ड का संस्कार करे, फिर अग्नि को भी संस्कारित करके स्थापित करे, फिर जो पात्र (स्रुव,स्रुक् आदि) प्रयुक्त होंगे उसे संस्कारित करे, फिर जो द्रव्य (आज्य, चरु आदि) प्रयुक्त होंगे उसे भी संस्कारित करके ही आहुति देना चाहिए।

यत्संख्याकं यजेल्लिङ्गं तन्मितं होममाचरेत् ।
आज्यान्वितैस्तिलैरग्नौ घृतैर्वा पायसेन वा ॥

इष्ट देवताकी प्रीति के लिये अनुष्ठित यज्ञमें ब्राह्मण और अग्नि के लिये जो कुछ अश्रद्धा से समर्पित किया जाता है, उससे देवगणों की तृप्ति नहीं होती । दाता का वह दक्षिणा आदि द्रव्य निरर्थक ही जाता है। विधिरहित किया गया हवन सर्वथा निष्फल होता है यही शास्त्राज्ञा है।

इसलिए हवनकाल में जो मन्त्र, विधि व वस्तु शास्त्रों में वर्णित है उसका श्रद्धापूर्वक पालन करना अनिवार्य होता है और यदि उसका पालन नहीं किया जाय तो वह हवन आसुरी कहलाता है।

प्रायः ऐसा देखा जाता है कि पूजा/ अनुष्ठान आदि तो बहुत वृहद् करते हैं परंतु हवन बहुत संक्षित्प में करते हैं या मन्त्र, विधि व वस्तु आदि का शास्त्रीय अनुपालन नहीं करते वह हवन आसुरी हो जाता है ।

पार्थिव पूजन में हवन विहित अथवा निषिद्ध : पार्थिव पूजन में हवन को विहित अथवा निषिद्ध; इस भाव से नहीं देखा जा सकता, अनिवार्य है अथवा नहीं इसका विचार हो सकता है। जप में दशांश हवन की अनिवार्यता होती है और उसका (हवन) भी विकल्प होता है (विंशांश जप बढ़ाना)।

  • विहित ही कहा जा सकता है किन्तु अनिवार्य नहीं, क्योंकि हवन तो अन्यान्य दिनों में भी स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं फिर जब पूजन कर रहे हैं तो क्यों न करें। किन्तु विकल्प का मार्ग अवरुद्ध नहीं होगा क्योंकि जहां जप में अनिवार्य कहा गया है वहां भी विकल्प प्राप्त है। यहां यदि अनिवार्य भी सिद्ध हो तो इसका विकल्प पुनः ब्राह्मण भोजन हो सकता है।

  • निषेध तो हो ही नहीं सकता किन्तु अनिवार्य है इस भ्रम का त्याग करना होगा। जो लोग प्रत्येक मास सहस्र (११००) आदि संख्या पार्थिव पूजन करते हैं वो तो हवन नहीं करते। किन्तु इससे निषिद्ध नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकार पार्थिव पूजन में हवन किया तो जा सकता है किन्तु यह भाव की अनिवार्य है शास्त्रसम्मत नहीं है। जब हवन करे तो हवन की विधि से सम्यक् करे, अलाव लगाकर हुआ-हुआ न करे। हवन करें में हवन विधि की अनिवार्यता को संक्षेप में ऊपर बताया गया है और यदि विधिपूर्वक हवन नहीं करेंगे तो आसुरी संज्ञक होगा जिसका शुभ परिणाम नहीं हो सकता।

हवन विधि की भी अनेकों आलेखों में विस्तृत चर्चा “सम्पूर्ण कर्मकांड विधि” पर उपलब्ध है।

प्रामाणिक तथ्य : ये उसके लिये समझने का विषय है जो विधिरहित हवन करते हैं, अब जो विधिपूर्वक हवन करने वाले हैं उनके लिये विहित ही नहीं पार्थिव लिंग की संख्या के अनुसार आहूति का भी विधान है :

अश्रद्धया च यद्दत्तं विप्रेऽग्नौ दैविके क्रतौ ।
न देवास्तृप्तिमायान्ति दातुर्भवति निष्फलम् ॥

इस प्रकार जब हवन विहित का प्रामाणिक पक्ष लिया जायेगा तो किसी भी द्रव्य से स्वेच्छापूर्वक संख्या का निर्धारण नहीं किया जा सकता। पार्थिव लिंग की संख्या के अनुसार ही आहूति देकर हवन करे। आहूति के मुख्य द्रव्य घृताक्त तिल अथवा घृत अथवा पायस।

निष्कर्ष : हवन विहित है अथवा नहीं इस प्रश्न का मूल कारण विधिरहित हवन करना है। विधिरहित हवन कल्याणकारी नहीं होता अपितु दुष्परिणाम देने वाला ही होता है इसलिये यदि हवन करे तो विधिपूर्वक पार्थिव लिंग की संख्या के अनुसार करे अथवा न करे। ब्राह्मण भोजन में ब्राह्मणों की संख्या अधिक कर दे और ब्राह्मणों की पूजा करके भोजन कराये और दान-दक्षिणादि से संतुष्ट करे।

हवन

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

यदि हम विधि व्यवस्था कि बात करें तो यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है और इस विषय को गंभीरता से समझना आवश्यक है। इस भाग में आने वाले अनेकों विषय को अलग से भी रखा गया है जैसे हवन, मंडल, पार्थिव निर्माण विधि आदि, इसलिये यहां उन विषयों के अतिरिक्त ही समझेंगे और अंत में वैदिकपूजापद्धति (शिवपुराणोक्त) का भी अवलोकन करेंगे। जो समझ सकेंगे वो भलीभांति समझ लेंगे कि वर्त्तमान में पूजा करने वालों की संख्या भले, लिंगों की संख्या आदि भले बढ़ गई हो किन्तु पूजा की जो शास्त्रोक्त विधि है उसकी पूर्णतः अवहेलना करते जा रहे हैं। जब आप इन तथ्यों को जाने-समझेंगे तो आपको ३ – ४ दशक पूर्व का कालखंड स्मरण होगा कि उक्त काल में ऐसे बहुत सारे विधानों का अक्षरशः पालन किया जाता था।

आपने देखा होगा (यदि ४०-५० वर्ष आयु हो तो) कि पार्थिव पूजन में केवल पायस ही बनता था और वही ब्राह्मण भोजन कराया जाता था, नमक का प्रयोग (सब्जी) कदापि नहीं होता था। आज देखिये कुछ अपवाद ब्राह्मणों में ही देखने को मिलेंगे को परम्परा से करते आ रहे हैं। आपने देखा होगा कि ब्राह्मण ही पार्थिव निर्माण करके पूजा भी करते थे। आपने देखा होगा कि पार्थिव की संख्या अधिक नहीं होती थी, अत्यल्प लोग ही सपादलक्ष (सवा लाख) करते थे। आज यदि कराने वाले कर्मकांडी को स्वयं बनाने और पूजा करने के लिये कहा जाय तो अनमने मन से करेंगे, क्योंकि आज जो व्यवहार बनता जा रहा है वो पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध है और शास्त्रसम्मत विधान में ही अरुचि होती है। विधि व्यवस्था के कुछ प्रमुख तथ्यों को यदि बिन्दुवार क्रम से समझे तो उचित होगा :

  • पार्थिव पूजन में शिववास का विचार विशेषरूप से करना चाहिये किन्तु परिहार का भी ध्यान रखना चाहिये। श्रावण, अधिकमास, आर्द्रा के सूर्य, संक्रांति, सोमवार, विशेष निमित्त आदि में शिववास का विचार नहीं होता।

  • पार्थिवपूजन में बिना जाने-समझे संख्या की अधिकता के आधार पर निर्णय न लें, संख्या की अधिकता के स्थान पर प्रामाणिक संख्या को ज्ञात करके पूजा की उचित विधि के अनुसार करें।

  • शारीरिक शुद्धि, मानसिक शुद्धि, स्थान शुद्धि, द्रव्य शुद्धि आदि सबको जाने और पालन करें।

  • पूजा की वैदिक विधि होगी या आगमोक्त इसका निर्धारण करके तदनुसार करें। किसी भी विधि के लिए शास्तीय पद्धति क्या है यह समझें।

  • पूजा संबंधी जितनी भी तैयारियां होती है (शुद्धि, पाक आदि के अतिरिक्त) वो पूर्व ही करना उचित होता है। अनेकों संबंधित विषय की चर्चा सामग्री, पार्थिवनिर्माण, मंडल, हवन आदि भाग में किया गया है अतः उनका अवलोकन सावधानी से करें।

  • आगे पूजा विधान के प्रमाण में स्पष्ट होगा कि हवन पूजा का अनिवार्य अंग नहीं होता है। हवन करें तो हवन की विधि से ही करें।

  • भोजन में यदि पायस हो तो सब्जी न बनायें और यदि सब्जी बनायें (नमकीन पाक) तो पायस ही न बनायें। क्षीर और नमक का संयोग होने पर मांसतुल्य हो जाता है।

  • पूजा में कोई भी अनावश्यक विस्तार न करें, प्रायः अनावश्यक विस्तार ही देखने को मिलता है जो विघ्नकारक और फलनाशक होता है।

  • पूजा उस समय तत्काल करें जब पार्थिव निर्माण पूर्ण हो जाये, पार्थिव निर्माण करके अन्यान्य कर्म न करें अर्थात अन्यान्य सभी कर्म पार्थिव निर्माण से पूर्व ही करें।

  • पूजा के मध्य में विराम आदि न लें, फलाहार आदि न करें। जो भी करना हो पहले करें या पूजा के बाद करें एवं पूजा का इतना भी विस्तार न करें कि मध्य में विराम लेना पड़े।

जब हम वर्ष में अथवा मास में पूजन करते हैं तो वो विशेष पूजा है, नित्य नहीं। नित्य पूजन का तात्पर्य प्रतिदिन पूजन करना है भले ही पार्थिव लिंग की संख्या एक क्यों न हो। इसी प्रकार जब हम किसी विशेष दिन वर्ष या मास में एक बार करते हैं तो पार्थिव लिंग की संख्या कितनी भी हो वह विशेष पूजा ही होती है। नित्य पूजा में भी सर्वविध शास्त्रीय विधि और पवित्रता आदि का पालन करना आवश्यक होता है, विशेष पूजा में तो विशेष रूप से करने की आवश्यकता होती है।

दोष यह है कि हम धर्म और कर्मकांड आदि के विषय में उस परम्परा से ज्ञान प्राप्त करते ही नहीं जिससे होनी चाहिये। आज के समय में वो लोग धर्म और कर्मकांड आदि का ज्ञान बांटते हैं जो विशुद्ध रूप से धर्म में आस्था ही नहीं रखते, स्वधर्म का रत्तीभर भी पालन नहीं करते। आपको कहीं से कोई भी ज्ञान प्राप्त हो तो कम से कम उसका मूल श्रोत ज्ञात करके परीक्षण तो करना चाहिये कि वास्तव में ऐसा है अथवा नहीं। तार्किक तथ्यों और सिद्धांतों का धर्म और कर्मकांड में कोई अस्तित्व ही नहीं जब तक उसके पक्ष में कोई प्रमाण न हो।

विशेष पूजा

भगवान शिव की पूजा का कलयुग में विशेष महत्व है और शीघ्र कल्याणकारी, मनोरथ पूर्ण करने वाला है। भगवान शिव की अराधना कोई भी कर सकता है किन्तु स्वयं की योग्यता-अधिकार आदि का ध्यान रखते हुये करने से ही कल्याण प्राप्त कर सकता है, विधान का उल्लंघन करके की गयी पूजा भी विपरीत फलदायक हो सकती है। चारों वर्णों का शिव पूजन में अधिकार है किन्तु कुछ विशेष नियम भी है, यथा :

  • स्त्री-शूद्र-पतित को मंदिरों में प्रतिष्ठित शिवलिंग का स्पर्श नहीं करना चाहिये।

  • घर में जो शिवलिंग हो, गुरु से प्राप्त हो उसके स्पर्श का स्त्री-शूद्र-पतित को भी अधिकार होता है।

  • पार्थिव शिवलिंग में भी सबको स्पर्श का अधिकार है।

  • जो श्रोत्रिय होते हैं उनको वैदिक विधि और मंत्रों से ही शिवपूजा करनी चाहिये, अन्य विधि मंत्रों से नहीं।

  • जो वेद में अधिकार नहीं रखते उनको आगमोक्त विधि से पूजनादि करना विहित और कल्याणकारी है।

विशेष पूजा और नित्य पूजा में अंतर होता है, विशेष पूजा किसी विशेष दिवस का निर्धारण करके विशेष विधि से की जाती है जबकि नित्य पूजा में उन विधियों की आवश्यकता नहीं होती। विशेष पूजा करने के लिये पूर्व दिन विशेष नियमों को ग्रहण करें जिसकी जानकारी विद्वान ब्राह्मणों से लें। यदि उपनीत हों तो नूतन यज्ञोपवीत धारण कर लें।

  • पूजा के दिन नित्यकर्म, कुलदेवता, इष्टदेवता का पूजन करके पूजा स्थान को गाय के गोबर से लीपें, यदि पक्का मकान हो तो समस्या होती है किन्तु मंडल करने का ही प्रयास करें, पंचगव्य निर्माण करके प्राशन, प्रोक्षण आदि करें।

  • पूजा स्थान के मध्य भाग में हवन वेदी बनायें, हवन न करना हो तो न बनायें।

  • ईशान कोण में कलश स्थापन के लिये अष्टदल का निर्माण करके अन्य व्यस्था करें।

  • पूर्व भाग में सुंदर पीठ, पात्र आदि में पार्थिव शिवलिंग को स्थापित करें, यदि चतुर्लिंगतो भद्र आदि निर्माण करना हो तो मंडल निर्माण करके उसी पर स्थापित करें।

  • पूजा की अन्य व्यस्था करके पूजा आरम्भ करें।

  • पार्थिव शिवलिंग निर्माण करना हो तो धूप-दीप जलाकर पार्थिव निर्माण करें, यदि ब्राह्मणों द्वारा निर्माण कराना हो तो ब्राह्मणों से ही करायें। किन्तु विशेष यह है कि पूर्व पूजा करके ही पार्थिव निर्माण करें।

विशेष : पूजा-अनुष्ठान यदि दिन भर का हो तो फलाहार कर लें। फलाहार के पश्चात् स्नान अनिवार्य नहीं होता है, किन्तु यदि स्नान करना चाहें तो कर सकते हैं निषेध भी नहीं होता है। यदि लघुशंका करनी हो तो धारित वस्त्र को खोले बिना ही करें और लघुशंका करके विधिपूर्वक शुद्ध होवें। यदि शंका (मलोत्सर्जन) हो तो स्नान भी करें और धारित वस्त्र को खोला भी गया हो तो पुनः धारण न करें, अन्य वस्त्र धारण करें।

विधि व्यवस्था

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

नमः शिवाय मंत्रेणार्चनद्रव्यं च प्रोक्षयेत् ।
भूरसीति च मंत्रेण क्षेत्रसिद्धिं प्रकारयेत् ॥

आपोऽस्मानिति मंत्रेण जलसंस्कारमाचरेत् ।
नमस्ते रुद्र मंत्रेण स्फाटिकाबंधमुच्यते ॥

शंभवायेति मंत्रेण क्षेत्रशुद्धिं प्रकारयेत् ।
नमः पूर्वेण कुर्यात्पंचामृतस्यापि प्रोक्षणम् ॥

नीलग्रीवाय मंत्रेण नमः पूर्वेण भक्तिमान् ।
चरेच्छंकरलिंगस्य प्रतिष्ठापनमुत्तमम् ॥

भक्तितस्तत एतत्ते रुद्रायेति च मंत्रतः ।
आसनं रमणीयं वै दद्याद्वैदिकमार्गकृत् ॥

मानो महान्तमिति च मंत्रेणावाहनं चरेत् ।
या ते रुद्रेण मंत्रेण संचरेदुपवेशनम् ॥

मंत्रेण यामिषुमिति न्यासं कुर्य्याच्छिवस्य च ।
अध्यवोचदिति प्रेम्णाधिवासं मनुनाचरेत् ॥

मनुनासौ जीव इति देवतान्यासमाचरेत् ।
असौ योऽवसर्पतीति चाचरेदपसर्पणम् ॥

नमोऽस्तु नीलग्रीवायेति पाद्यं मनुनाहरेत् ।
अर्घ्यं च रुद्र गायत्र्याऽचमनं त्र्यंबकेण च ॥

पयः पृथिव्यामिति च पयसा स्नानमाचरेत् ।
दधिक्राव्णेतिमंत्रेण दधिस्नानं च कारयेत् ॥

घृतस्नाने खलु घृतं घृतपावेति मंत्रतः ।
मधुवाता मधुनक्तं मधुमान्न इति त्र्यृचा ॥

मधुखंडस्नपनं प्रोक्तमिति पंचामृतं स्मृतम् ।
अथवा पाद्यमंत्रेण स्नानं पंचामृतेन च ॥

मानस्तोके इति प्रेम्णा मंत्रेण कटिबंधनम् ।
नमो धृष्णवे इति वा उत्तरीयं च धापयेत् ॥

या ते हेतिरिति प्रेम्णा ऋक्चतुष्केण वैदिकः ।
शिवाय विधिना भक्तश्चरेद्वस्त्रसमर्पणम् ॥

नमः श्वभ्य इति प्रेम्णा गंधं दद्यादृचा सुधीः ।
नमस्तक्षभ्य इति चाक्षतान्मंत्रेण चार्पयेत् ॥

नमः पार्याय इति वा पुष्प मंत्रेण चार्पयेत् ।
नमः पर्ण्याय इति वा बिल्वपत्रसमर्पणम् ॥

नमः कपर्दिने चेति धूपं दद्याद्यथाविधि ।
दीपं दद्याद्यथोक्तं तु नम आशव इत्यृचा ॥

नमो ज्येष्ठाय मंत्रेण दद्यान्नैवेद्यमुत्तमम् ।
मनुना त्र्यम्बकमिति पुनराचमनं स्मृतम् ॥

इमा रुद्रायेति ऋचा कुर्यात्फलसमर्पणम् ।
नमो व्रज्यायेति ऋचा सकलं शंभवेऽर्पयेत् ॥

मानो महान्तमिति च मानस्तोके इति ततः ।
मंत्रद्वयेनैकदशाक्षतै रुद्रान्प्रपूजयेत् ॥

हिरण्यगर्भ इति त्र्! यृचा दक्षिणां हि समर्पयेत् ।
देवस्य त्वेति मंत्रेण ह्यभिषेकं चरेद्बुधः ॥

दीपमंत्रेण वा शंभोर्नीराजनविधिं चरेत् ।
पुष्पाञ्जलिं चरेद्भक्त्या इमा रुद्राय च त्र्यृचा ॥

मानो महान्तमिति च चरेत्प्राज्ञः प्रदक्षिणाम् ।
मानस्तोकेति मंत्रेण साष्टाङ्गं प्रणमेत्सुधीः ॥

एष ते इति मंत्रेण शिवमुद्रां प्रदर्शयेत् ।
यतोयत इत्यभयां ज्ञानाख्यां त्र्यंबकेण च ॥

नमः सेनेति मंत्रेण महामुद्रां प्रदर्शयेत् ।
दर्शयेद्धेनुमुद्रां च नमो गोभ्य ऋचानया ॥

पंचमुद्राः प्रदर्श्याथ शिवमंत्रजपं चरेत् ।
शतरुद्रियमंत्रेण जपेद्वेदविचक्षणः ॥

ततः पंचाङ्गपाठं च कुर्य्याद्वेदविचक्षणः ।
देवागात्विति मंत्रेण कुर्याच्छंभोर्विसर्जनम् ॥

इत्युक्तः शिवपूजाया व्यासतो वैदिकोविधिः ।
समासतश्च शृणुत वैदिकं विधिमुत्तमम् ॥

ऋचा सद्योजातमिति मृदाहरणमाचरेत् ।
वामदेवाय इति च जलप्रक्षेपमाचरेत् ॥

अघोरेण च मंत्रेण लिङ्गनिर्माणमाचरेत् ।
तत्पुरुषाय मंत्रेणाह्वानं कुर्याद्यथाविधि ॥

संयोजयेद्वेदिकायामीशानमनुना हरम् ।
अन्यत्सर्वं विधानं च कुर्य्यात्संक्षेपतः सुधीः ॥

पंचाक्षरेण मंत्रेण गुरुदत्तेन वा तथा ।
कुर्यात्पूजां षोडशोपचारेण विधिवत्सुधीः ॥

भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमहि ।
उग्राय उग्रनाशाय शर्वाय शशिमौलिने ॥

अनेन मनुना वापि पूजयेच्छंकरं सुधीः ।
सुभक्त्या च भ्रमं त्यक्त्वा भक्त्यैव फलदः शिवः ॥

इत्यपि प्रोक्तमादृत्य वैदिकक्रमपूजनम् ।
प्रोच्यतेऽन्यविधिः सम्यक्साधारणतया द्विजः ॥

पूजा पार्थिवलिंगस्य संप्रोक्ता शिवनामभिः ।
तां शृणुध्वं मुनिश्रेष्ठाः सर्वकामप्रदायिनीम् ॥

हरो महेश्वरः शंभुः शूलपाणिः पिनाकधृक् ।
शिवः पशुपतिश्चैव महादेव इति क्रमात् ॥

मृदाहरणसंघट्टप्रतिष्ठाह्वानमेव च ।
स्नपनं पूजनं चैव क्षमस्वेति विसर्जनम् ॥

ॐकारादिचतुर्थ्यंतैर्नमोन्तैर्नामभिः क्रमात् ।
कर्तव्या च क्रिया सर्वा भक्त्या परमया मुदा ॥

कृत्वा न्यासविधिं सम्यक् षडङ्गंकरयोस्तथा ।
षडक्षरेण मंत्रेण ततो ध्यानं समाचरेत् ॥

कैलासपीठासनमध्यसंस्थं
भक्तैः सनंदादिभिरर्च्यमानम् ।
भक्तार्तिदावानलमप्रमेयं
ध्यायेदुमालिंगितविश्वभूषणम् ॥

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रा वतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥

इति ध्यात्वा च संपूज्य पार्थिवं लिंगमुत्तमम् ।
जपेत्पंचाक्षरं मंत्रं गुरुदत्तं यथाविधि ॥

स्तुतिभिश्चैव देवेशं स्तुवीत प्रणमन्सुधीः ।
नानाभिधाभिर्विप्रेन्द्राः पठेद्वै शतरुद्रियम् ॥

ततः साक्षतपुष्पाणि गृहीत्वाञ्जलिना मुदा ।
प्रार्थयेच्छंकरं भक्त्या मंत्रैरेभिः सुभक्तितः ॥

तावकस्त्वद्गुणप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड ।
कृपानिध इति ज्ञात्वा भूतनाथ प्रसीद मे ॥

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जप पूजादिकं मया ।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर ॥

अहं पापी महानद्य पावनश्च भवान्महान् ।
इति विज्ञाय गौरीश यदिच्छसि तथा कुरु ॥

वेदैः पुराणैः सिद्धान्तैरृषिभिर्विविधैरपि ।
न ज्ञातोऽसि महादेव कुतोऽहं त्वं महाशिव ॥

यथा तथा त्वदीयोऽस्मि सर्वभावैर्महेश्वर ।
रक्षणीयस्त्वयाहं वै प्रसीद परमेश्वर ॥

इत्येवं चाक्षतान्पुष्पानारोप्य च शिवोपरि ।
प्रणमेद्भक्तितश्शंभुं साष्टांगं विधिवन्मुने ॥

ततः प्रदक्षिणां कुर्याद्यथोक्तविधिना सुधीः ।
पुनः स्तुवीत देवेशं स्तुतिभिः श्रद्धयान्वितः ॥

ततो गलरवं कृत्वा प्रणमेच्छुचिनम्रधीः ।
कुर्याद्विज्ञप्तिमादृत्य विसर्जनमथाचरेत् ॥

इत्युक्ता मुनिशार्दूलाः पार्थिवार्चा विधानतः ।
भुक्तिदा मुक्तिदा चैव शिवभक्तिविवर्धिनी ॥

पार्थिवार्चा

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि