पार्थिव पूजनं – विधि व्यवस्था

धर्माचरण हो शास्त्रानुसार

यदि हम विधि व्यवस्था कि बात करें तो यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है और इस विषय को गंभीरता से समझना आवश्यक है। इस भाग में आने वाले अनेकों विषय को अलग से भी रखा गया है जैसे हवन, मंडल, पार्थिव निर्माण विधि आदि, इसलिये यहां उन विषयों के अतिरिक्त ही समझेंगे और अंत में वैदिकपूजापद्धति (शिवपुराणोक्त) का भी अवलोकन करेंगे। जो समझ सकेंगे वो भलीभांति समझ लेंगे कि वर्त्तमान में पूजा करने वालों की संख्या भले, लिंगों की संख्या आदि भले बढ़ गई हो किन्तु पूजा की जो शास्त्रोक्त विधि है उसकी पूर्णतः अवहेलना करते जा रहे हैं। जब आप इन तथ्यों को जाने-समझेंगे तो आपको ३ – ४ दशक पूर्व का कालखंड स्मरण होगा कि उक्त काल में ऐसे बहुत सारे विधानों का अक्षरशः पालन किया जाता था।

आपने देखा होगा (यदि ४०-५० वर्ष आयु हो तो) कि पार्थिव पूजन में केवल पायस ही बनता था और वही ब्राह्मण भोजन कराया जाता था, नमक का प्रयोग (सब्जी) कदापि नहीं होता था। आज देखिये कुछ अपवाद ब्राह्मणों में ही देखने को मिलेंगे को परम्परा से करते आ रहे हैं। आपने देखा होगा कि ब्राह्मण ही पार्थिव निर्माण करके पूजा भी करते थे। आपने देखा होगा कि पार्थिव की संख्या अधिक नहीं होती थी, अत्यल्प लोग ही सपादलक्ष (सवा लाख) करते थे। आज यदि कराने वाले कर्मकांडी को स्वयं बनाने और पूजा करने के लिये कहा जाय तो अनमने मन से करेंगे, क्योंकि आज जो व्यवहार बनता जा रहा है वो पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध है और शास्त्रसम्मत विधान में ही अरुचि होती है। विधि व्यवस्था के कुछ प्रमुख तथ्यों को यदि बिन्दुवार क्रम से समझे तो उचित होगा :

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि
  • पार्थिव पूजन में शिववास का विचार विशेषरूप से करना चाहिये किन्तु परिहार का भी ध्यान रखना चाहिये। श्रावण, अधिकमास, आर्द्रा के सूर्य, संक्रांति, सोमवार, विशेष निमित्त आदि में शिववास का विचार नहीं होता।

  • पार्थिवपूजन में बिना जाने-समझे संख्या की अधिकता के आधार पर निर्णय न लें, संख्या की अधिकता के स्थान पर प्रामाणिक संख्या को ज्ञात करके पूजा की उचित विधि के अनुसार करें।

  • शारीरिक शुद्धि, मानसिक शुद्धि, स्थान शुद्धि, द्रव्य शुद्धि आदि सबको जाने और पालन करें।

  • पूजा की वैदिक विधि होगी या आगमोक्त इसका निर्धारण करके तदनुसार करें। किसी भी विधि के लिए शास्तीय पद्धति क्या है यह समझें।

  • पूजा संबंधी जितनी भी तैयारियां होती है (शुद्धि, पाक आदि के अतिरिक्त) वो पूर्व ही करना उचित होता है। अनेकों संबंधित विषय की चर्चा सामग्री, पार्थिवनिर्माण, मंडल, हवन आदि भाग में किया गया है अतः उनका अवलोकन सावधानी से करें।

  • आगे पूजा विधान के प्रमाण में स्पष्ट होगा कि हवन पूजा का अनिवार्य अंग नहीं होता है। हवन करें तो हवन की विधि से ही करें।

  • भोजन में यदि पायस हो तो सब्जी न बनायें और यदि सब्जी बनायें (नमकीन पाक) तो पायस ही न बनायें। क्षीर और नमक का संयोग होने पर मांसतुल्य हो जाता है।

  • पूजा में कोई भी अनावश्यक विस्तार न करें, प्रायः अनावश्यक विस्तार ही देखने को मिलता है जो विघ्नकारक और फलनाशक होता है।

  • पूजा उस समय तत्काल करें जब पार्थिव निर्माण पूर्ण हो जाये, पार्थिव निर्माण करके अन्यान्य कर्म न करें अर्थात अन्यान्य सभी कर्म पार्थिव निर्माण से पूर्व ही करें।

  • पूजा के मध्य में विराम आदि न लें, फलाहार आदि न करें। जो भी करना हो पहले करें या पूजा के बाद करें एवं पूजा का इतना भी विस्तार न करें कि मध्य में विराम लेना पड़े।

जब हम वर्ष में अथवा मास में पूजन करते हैं तो वो विशेष पूजा है, नित्य नहीं। नित्य पूजन का तात्पर्य प्रतिदिन पूजन करना है भले ही पार्थिव लिंग की संख्या एक क्यों न हो। इसी प्रकार जब हम किसी विशेष दिन वर्ष या मास में एक बार करते हैं तो पार्थिव लिंग की संख्या कितनी भी हो वह विशेष पूजा ही होती है। नित्य पूजा में भी सर्वविध शास्त्रीय विधि और पवित्रता आदि का पालन करना आवश्यक होता है, विशेष पूजा में तो विशेष रूप से करने की आवश्यकता होती है।

दोष यह है कि हम धर्म और कर्मकांड आदि के विषय में उस परम्परा से ज्ञान प्राप्त करते ही नहीं जिससे होनी चाहिये। आज के समय में वो लोग धर्म और कर्मकांड आदि का ज्ञान बांटते हैं जो विशुद्ध रूप से धर्म में आस्था ही नहीं रखते, स्वधर्म का रत्तीभर भी पालन नहीं करते। आपको कहीं से कोई भी ज्ञान प्राप्त हो तो कम से कम उसका मूल श्रोत ज्ञात करके परीक्षण तो करना चाहिये कि वास्तव में ऐसा है अथवा नहीं। तार्किक तथ्यों और सिद्धांतों का धर्म और कर्मकांड में कोई अस्तित्व ही नहीं जब तक उसके पक्ष में कोई प्रमाण न हो।

विशेष पूजा

भगवान शिव की पूजा का कलयुग में विशेष महत्व है और शीघ्र कल्याणकारी, मनोरथ पूर्ण करने वाला है। भगवान शिव की अराधना कोई भी कर सकता है किन्तु स्वयं की योग्यता-अधिकार आदि का ध्यान रखते हुये करने से ही कल्याण प्राप्त कर सकता है, विधान का उल्लंघन करके की गयी पूजा भी विपरीत फलदायक हो सकती है। चारों वर्णों का शिव पूजन में अधिकार है किन्तु कुछ विशेष नियम भी है, यथा :

  • स्त्री-शूद्र-पतित को मंदिरों में प्रतिष्ठित शिवलिंग का स्पर्श नहीं करना चाहिये।

  • घर में जो शिवलिंग हो, गुरु से प्राप्त हो उसके स्पर्श का स्त्री-शूद्र-पतित को भी अधिकार होता है।

  • पार्थिव शिवलिंग में भी सबको स्पर्श का अधिकार है।

  • जो श्रोत्रिय होते हैं उनको वैदिक विधि और मंत्रों से ही शिवपूजा करनी चाहिये, अन्य विधि मंत्रों से नहीं।

  • जो वेद में अधिकार नहीं रखते उनको आगमोक्त विधि से पूजनादि करना विहित और कल्याणकारी है।

विशेष पूजा और नित्य पूजा में अंतर होता है, विशेष पूजा किसी विशेष दिवस का निर्धारण करके विशेष विधि से की जाती है जबकि नित्य पूजा में उन विधियों की आवश्यकता नहीं होती। विशेष पूजा करने के लिये पूर्व दिन विशेष नियमों को ग्रहण करें जिसकी जानकारी विद्वान ब्राह्मणों से लें। यदि उपनीत हों तो नूतन यज्ञोपवीत धारण कर लें।

  • पूजा के दिन नित्यकर्म, कुलदेवता, इष्टदेवता का पूजन करके पूजा स्थान को गाय के गोबर से लीपें, यदि पक्का मकान हो तो समस्या होती है किन्तु मंडल करने का ही प्रयास करें, पंचगव्य निर्माण करके प्राशन, प्रोक्षण आदि करें।

  • पूजा स्थान के मध्य भाग में हवन वेदी बनायें, हवन न करना हो तो न बनायें।

  • ईशान कोण में कलश स्थापन के लिये अष्टदल का निर्माण करके अन्य व्यस्था करें।

  • पूर्व भाग में सुंदर पीठ, पात्र आदि में पार्थिव शिवलिंग को स्थापित करें, यदि चतुर्लिंगतो भद्र आदि निर्माण करना हो तो मंडल निर्माण करके उसी पर स्थापित करें।

  • पूजा की अन्य व्यस्था करके पूजा आरम्भ करें।

  • पार्थिव शिवलिंग निर्माण करना हो तो धूप-दीप जलाकर पार्थिव निर्माण करें, यदि ब्राह्मणों द्वारा निर्माण कराना हो तो ब्राह्मणों से ही करायें। किन्तु विशेष यह है कि पूर्व पूजा करके ही पार्थिव निर्माण करें।

विशेष : पूजा-अनुष्ठान यदि दिन भर का हो तो फलाहार कर लें। फलाहार के पश्चात् स्नान अनिवार्य नहीं होता है, किन्तु यदि स्नान करना चाहें तो कर सकते हैं निषेध भी नहीं होता है। यदि लघुशंका करनी हो तो धारित वस्त्र को खोले बिना ही करें और लघुशंका करके विधिपूर्वक शुद्ध होवें। यदि शंका (मलोत्सर्जन) हो तो स्नान भी करें और धारित वस्त्र को खोला भी गया हो तो पुनः धारण न करें, अन्य वस्त्र धारण करें।