पार्थिव पूजनं – भजन विद्यापतिकृत
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार
विद्यापतिकृत
आजु नाथ एक व्रत
आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे।
तोहे सिव धरु नट भेस कि डमरू बजाबह हे॥
तोहे गौरी कहै छह नाचय हमें कोना नाचब हे॥
चारि सोच मोहि होए कौन बिधि बाँचब हे॥
अमिअ चुमिअ भूमि खसत बघम्बर जागत हे॥
होएत बघम्बर बाघ बसहा धरि खायत हे॥
सिरसँ ससरत साँप पुहुमि लोटायत हे॥
कातिक पोसल मजूर सेहो धरि खायत हे॥
जटासँ छिलकत गंगा भूमि भरि पाटत हे॥
होएत सहस मुखी धार समेटलो नहीं जाएत हे॥
मुंडमाल टुटि खसत, मसानी जागत हे॥
तोहें गौरी जएबह पड़ाए नाच के देखत हे॥
भनहि विद्यापति गाओल गाबि सुनाओल हे॥
राखल गौरी केर मान चारु बचाओल हे ॥
आयल छि हम पुजारी
पूजा के हेतु शंकर
आयल छी हम पुजारी
जानी ने मंत्र-जप-तप
पूजा के विधि ने जानी ॥
तइयो हमर मनोरथ
करूं हे दानी ॥
चुप भए किए बइसल जी
खोलू ने कने केबारी ॥
बाबा अहाँके महिमा
बच्चेसँ हम जनइ छी।
दुःख कि कहब अहां सं
सब टा अहां जानै छी ॥
दर्शन दिअऽ दिगम्बर
दर्शन केर हम भिखारी ॥
हे नाथ हम अनाथे
वर दय करू सनाथे
मीनती करू नमेश्वर
कर जोड़ि दुनू हाथे ॥
डामरु कने बजाउ
गाबइ छी हम नचारी ॥
कखन हरब दुःख मोर
कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ।
दुखहि जनम भेल दुखहि गमाएब
सुख सपनहु नहिं भेल, हे भोला...
आछत चानन अवर गंगाजल
बेलपात तोहि देब, हे भोला...
यहि भवसागर थाह कतहु नहिं
भैरव धरु कर पाए, हे भोला...
भव विद्यापति मोर भोलानाथ गति
देहु अभय बर मोहिं, हे भोला...
सखि जोगी एक ठाढ़ अंगनमा में
सखि जोगी एक ठाढ़ अंगनमा में
अंगनमा मे, हे भवनमा मे
साँपहि साँप बाम-दहिन छल
चित्र-विचित्र बसनमा मे
नित दिन भीख कतऽ सँ लायब
घुरि फिरि जाहु अंगनमा मे
भीखो ने लिअय जोगी घुरियो ने जाइ
गौरी हे निकलू अंगनमा मे
भनहि विद्यापति सुनू हे मनाइन
शिव सन दानी के भुवनमा मे
