पार्थिव पूजनं – उत्तर पूजन
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार
उत्तर पूजन


उत्तर पूजन का तात्पर्य रुद्राभिषेक के उपरांत की जाने वाली पुनः पूजा से है। यदि अभिषेक न किया गया हो तो उत्तर पूजन नहीं होगा और यदि पूजा के पश्चात् अभिषेक करते हैं तो उत्तर पूजा पुनः होगी। संभवतः आप यहां उत्तर पूजन विधि ढूंढने आये होंगे कि पार्थिवपूजन में उत्तरपूजन कैसे करें और यदि आपके मन में यह जिज्ञासा है तो प्रशंसनीय है क्योंकि ऐसी जिज्ञासा भी देखने को नहीं मिलती। वास्तविकता यह है कि वर्त्तमान में कर्मकांड का स्वरूप इतना विकृत कर दिया गया है की वास्तविक जिज्ञासा का भी अवकाश रिक्त नहीं रहा।
उत्तर पूजन मुख्यतः रुद्राभिषेक का अंग है किन्तु पार्थिवपूजन का मूल स्वरूप ही छिन्न-भिन्न कर दिया गया है और यह ज्ञात ही नहीं होता कि पार्थिव पूजन है अथवा रुद्राभिषेक सत्यनारायण पूजा अथवा चण्डीप्रयोग ! जब वास्तविक कर्म ही ज्ञात न हो तो उसकी विधि क्या होगी, कैसे होगी कुछ भी समझना कठिन है। पार्थिवपूजन और रुद्राभिषेक का सम्मिश्रण होने से ही पार्थिवपूजन में भी उत्तर पूजन नामक प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। वास्तव में मैं यहां स्पष्ट यह करना चाहता हूँ कि पार्थिव पूजन और रुद्राभिषेक दोनों भिन्न प्रयोग हैं और इनका सम्मिश्रण नहीं करना चाहिये।
यदि पार्थिव पूजन विधान का अवलोकन करें तो ज्ञात होता है कि पार्थिव पूजन में वर्णित ही नहीं है किन्तु अन्यत्र महाभिषेक प्रयोग प्राप्त भी होता है जो स्नानोपरांत रुद्रसूक्त के षोडश ऋचाओं से करने के लिये कहा गया है। तदुपरांत आगे की पूजा होती है अर्थात पार्थिव पूजन में यदि महाभिषेक है भी तो मात्र षोडश ऋचाओं से है कर महाभिषेक नाम से है और इस कारण यहां उत्तर पूजन भी नहीं है।
इति ध्यात्वा च संपूज्य पार्थिवं लिंगमुत्तमम् ।
जपेत्पंचाक्षरं मंत्रं गुरुदत्तं यथाविधि ॥
स्तुतिभिश्चैव देवेशं स्तुवीत प्रणमन्सुधीः ।
नानाभिधाभिर्विप्रेन्द्राः पठेद्वै शतरुद्रियम् ॥
पार्थिव पूजन के पश्चात् पंचाक्षर अथवा गुरुदत्त मन्त्र जप, स्तुति, नानाभिधाओं के अनुसार ब्राह्मणो द्वारा शतरुद्री पाठ आदि कहा गया है। अर्थात पार्थिव पूजन में रुद्री का पाठात्मक प्रयोग होगा न कि अभिषेकात्मक।
अब प्रश्न है कि यदि रुद्राभिषेक करना हो तो ?
यदि रुद्राभिषेक करना है तो फिर पार्थिव पूजन क्यों ?
रुद्राभिषेक करना है तो नर्मदेश्वर अथवा धातु आदि के लिंग की पूजा करके या शिवालय में रुद्राभिषेक करें, पार्थिव पूजन करना है तो पार्थिव पूजन करें और पार्थिव पूजन की विधि से करें सम्मिश्रित न करें।
