उत्सर्ग

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" - पुरोहित के निमित्त दान

चर्चा के जो दो मूल प्रश्न हैं वो हैं :

  1. श्राद्ध में महापात्र को दान देने के पश्चात् पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है ?

  2. प्राङ्गणकृत्य सामान्योत्सर्ग एकादशाह को करें या द्वादशाह को ?

धर्म की रक्षा के लिये यह आवश्यक है कि उसका ज्ञान हो और ज्ञान के लिये यह आवश्यक है कि उसका स्रोत शास्त्र हो, तर्क-कुतर्क नहीं या संशोधित शास्त्र नहीं। और इसी कड़ी में मेरी भूमिका मुझे यही प्रतीत होती है कि धर्म की रक्षा के लिये कर्मकांडी वर्ग को सामान्य बातें और किसी भी विषय से संबंधित प्रमाण और प्रमाणित तथ्य सरलता से प्राप्त हो सकें। धर्म का ज्ञान ब्राह्मण ही दे सकते हैं एवं इसके लिये जिन्होंने यह दायित्व स्वीकार किया है (वृत्तिवशात्) वो सामान्य प्रश्नों के तो कम से कम प्रामाणिक उत्तर दें, प्रमाणों के प्रति जागरूक हों।

जो प्रमाणों के प्रति ही जागरूक नहीं है, शास्त्र में ही निष्ठा नहीं रखता, कुतर्कजीवि है, वह धर्म की स्थापना में कोई योगदान नहीं कर सकता। इसलिये मैं उन जिज्ञासु कर्मकांडी ब्राह्मणों के लिये जिनका दायित्व धर्म की स्थापना करना है किसी भी विषय पर शास्त्रीय और प्रामाणिक विमर्श करता हूँ जो “संपूर्ण कर्मकांड विधि” व अन्यान्य ब्लॉग पर भी आपको प्राप्त होता है।

इसी कड़ी में मूल दो प्रश्न आता है जो सामान्य कर्मकांडी ब्राह्मणों के लिये भी जानना आवश्यक है और यजमानों के लिये भी। क्योंकि किसी भी कर्म में श्रद्धा-विश्वास/आस्था तभी उत्पन्न हो सकता है जब उसका प्रामाणिक ज्ञान हो अर्थात शास्त्रीय ज्ञान हो और इसी कारण हम यहां इन प्रश्नों का शास्त्रीय उत्तर ही अवलोकन करेंगे और वर्त्तमान काल की व्यवस्था एवं अपने सामर्थ्य के आधार पर हमें यही हमारी भूमिका ज्ञात होती है।

श्राद्ध में महापात्र को दान देने के पश्चात् पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है ?

“गरुड़पुराण का श्रवण वैकल्पिक नहीं, बल्कि पितृ-ऋण से मुक्ति का अनिवार्य मार्ग है।”

इस प्रश्न का उत्तर हमें गरुडपुराण के फलश्रुति से मिलता है इस कारण यह उत्तर प्रामाणिक भी सिद्ध होता है न कि तर्क पर आधारित। गरुडपुराण माहात्म्य का अंतिम तीन श्लोक इस प्रकार है :

श्रुत्वा दानानि देयानि वाचकायाखिलानि च । पूर्वोक्तशयनादीनि नान्यथा सफलं भवेत् ॥

पुराणं पूजयेत्पूर्वं वाचकं तदनन्तरम् । वस्त्रालङ्कारगोदानैर्दक्षिणाभिश्च सादरम् ॥

अन्नदानैर्हेमदानैर्भमिदानैश्च भूरिभिः । पूजयेद्वाचकं भक्त्या बहुपुण्यफलाप्तये ॥

यश्चेदं शृणुयान्मर्त्यो यथापि परिकीर्तयेत् । विहाय यातनां घोरां धूतपापो दिवं व्रजेत् ॥

गरुडपुराण/प्रेतकाण्ड (धर्मकाण्ड)/४९/१३३ – १३६

यद्यपि यदि षोडषाध्यायी संकलन में देखें तो वहां हमें यह श्लोक प्राप्त होता है :

वाचकास्यार्चनेनैव पूजितोऽहं न संशयः। संतुष्टे तुष्टितां यामि वाचके नात्र संशयः ॥

हमें इसमें पड़ने की आवश्यकता नहीं है अपितु मूल प्रश्न का उत्तर ढूंढने की है। यहां “श्रुत्वा दानानि देयानि वाचकायाखिलानि च” कहकर जो वाचक (गरुडपुराण वक्ता) को भी सभी प्रकार के दान देने की बात कही गयी है उसे समझने की है। “पूर्वोक्तशयनादीनि” से यह भी स्पष्ट किया गया है कि जो श्राद्ध के लिये शय्यादि दान पूर्वोक्त कहे हैं वो सभी कथावाचक को भी दे।

यहां यह तो सिद्ध हो गया कि कथावाचक को भी वो सभी दान दे जो श्राद्ध के लिये कहे गए हैं किन्तु पुरोहित को ही देना है इसपर आने से पूर्व यहां अब अगला प्रश्न यह उत्पन्न हो जाता है कि यदि गरुडपुराण की कथा श्रवण ही न करे तो क्या अर्थात तब क्यों दे, तब तो नहीं देना चाहिये। तो आगे उसका भी प्रामाणिक उत्तर प्राप्त होता है जो यह सिद्ध करता है कि गरुडपुराण श्रवण वैकल्पिक नहीं है कि मन करे तो सुने और न करे तो न सुने अपितु अनिवार्य है :

इदं कर्म न कुर्वन्ति ये नास्तिकनराधमाः। तेषां जलमपेयं स्यात्सुरातुल्यं न संशयः॥
देवताः पितरश्चैव नैव पश्यन्ति तद्गृहं। भवन्ति तेषां कोपेन पुत्राः पौत्राश्च दुर्गताः॥
न श्रुतं गारुडं येन गयाश्राद्धं च नो कृतं। वृषोत्सर्गः कृतौ नैव न च मासिकवार्षिके॥
स कथं कथ्यते पुत्रः कथं मुच्येदृणत्रयात्। मातरं पितरं चैव कथं तारयितुं क्षमः ॥

अब यह सिद्ध हो गया कि गरुडपुराण श्रवण अनिवार्य है और वक्ता को भी सभी प्रकार के दान देने ही चाहिये। तब पुरोहित वाले प्रश्न पर आना होगा कि पुरोहित को ही क्यों ? क्योंकि प्रथम अधिकारी तो पुरोहित ही होता है यदि वर्त्तमान काल के दुष्प्रभाव को छोड़कर शास्त्रीय विमर्श करें। पुरोहित होने का तात्पर्य अज्ञानी (मूर्ख) होना नहीं अपितु विद्वान ब्राह्मण होना ही है, एवं आश्रित व निकटवर्ती विद्वान ब्राह्मण को छोड़कर दूरस्थ का ग्रहण करना अतिक्रमण दोष कहलाता है अर्थात पुरोहित का ही प्रथम अधिकार होता है और अविद्वान का त्याग करके विद्वान को ग्रहण करने में अतिक्रमण दोष नहीं होता है।

श्राद्ध में महापात्र को दान देने के पश्चात् पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है ?

वर्त्तमान में पुरोहितों के अविद्वान होने का कारण यह है कि पुरोहित वर्ग भी अपने बच्चों को डॉक्टर/इंजिनियर आदि ही बनाना चाहते हैं अथवा किसी न किसी नौकरी के लिये ही पढ़ाई कराते हैं, किन्तु वेदशास्त्र का ज्ञान नहीं देते। जो सफल हो जाता है वो तो इस वृत्ति से दूरस्थ हो जाता है क्योंकि उसकी आवश्यकता नहीं रहती किन्तु जो असफल हो जाये अर्थात कोई अन्य वृत्ति प्राप्त न कर पाये वह पुनः पौरोहित्य वृत्ति का आश्रय लेता है किन्तु शास्त्रज्ञान से रहित होता है।

किन्तु यहां एक दूसरा पक्ष भी है भले ही पुरोहित विद्वान न हों किन्तु सदैव विद्वान ही नहीं बुलाये जाते, जीवनपर्यन्त अनेकानेक कर्म ऐसे होते हैं जो पुरोहित ही संपन्न कराते हैं जैसे सत्यनारायण पूजा। इसी प्रकार समाज के मात्र धनीवर्ग ही विशेष विद्वान ब्राह्मण को आमंत्रित कर सकते हैं सभी लोग नहीं, समाज के अधिकांश यजमान वर्ग उस पुरोहित के ही आश्रित होते हैं और देश-काल-परिस्थिति के अनुसार धनाढ्यों को भी उसी पुरोहित का आश्रय लेकर रहना उचित है।

तीसरी बात यह भी है कि यजमानों का जो सामान्य व्यवहार होता है वो पुरोहित ही झेल सकता है, यदि विद्वान को पुरोहित बना भी लें तो वो पुरोहित व्यवहार (अधीनता) स्वीकार नहीं करेंगे और पुरोहित वही बन सकता है जो अधीनता/चाकरी (अनकही-व्यावहारिक) भी स्वीकार करे। इसी कारण यदि पुरोहित गरुडपुराण का पाठ मात्र करने में भी सक्षम न हो तो अन्य विद्वान को आमंत्रित किया जाता है किन्तु वो सदैव निर्वहन नहीं करेंगे इस कारण पुरोहित वही रहते हैं एवं कथावक्ता को अतिरिक्त दानादि प्रदान किया जाता है किन्तु मुख्य दान पुरोहित ही लेते हैं।

इस प्रकार यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया श्राद्ध में पुरोहित को भी पृथक दान क्यों दिया जाता है। तथापि यदि आपकी कोई अन्य शंका शेष हो तो वो भी प्रकट कर सकते हैं हम उसका समाधान करने का प्रयास अवश्य करेंगे। पुरोहित को दिया जाने वाला यह दान सामन्योत्सर्ग नाम से जाना जाता है जो गृह प्रांगण में किया जाता है। अब दूसरा प्रश्न :

प्राङ्गणकृत्य सामान्योत्सर्ग एकादशाह को करें या द्वादशाह को ?

इस प्रश्न का भी प्रामाणिक हल ही निकालेंगे न कि तर्क-कुतर्क मात्र से। यद्यपि देवकर्म में नियुक्त होने वाले पुरोहितवर्ग हों अथवा पितृकर्म में नियुक्त होने वाले महापात्र हों दोनों ब्राह्मण ही हैं। प्रामाणिक रूप से योग्यता (तप और ज्ञान की अधिकता) के आधार पर ब्राह्मण को नियुक्त करने का विधान है किन्तु श्राद्ध में नियुक्त होने वाले ब्राह्मण के लिये अर्थात श्राद्धभोजी ब्राह्मण के लिये बहुत सारे अवरोध भी कहे गए हैं, तप भी कहे गए हैं और इस कारण यह सामाजिक वर्गीकरण देखने को मिलता है।

मान लीजिये एक समाज में एक ही दिन श्राद्ध भी है और विवाह अथवा कुछ अन्य कार्य तो श्राद्धभोजी ब्राह्मण विवाहादि में उसदिन नियुक्त नहीं हो सकता अथवा आगे भी प्रायश्चित्तादि तप के बिना नियुक्त नहीं किया जा सकता। इस कारण पुरोहित वर्ग उनसे पृथक हो गए जो विवाहादि कार्य करें किंतु श्राद्धभोजी न बने। बहुत स्थानों पर पुरोहितवर्ग के ऊपर भी श्राद्धभोजी बनने का दबाव देखा जाता है एवं एकादशाह के दिन भी भोजन कराया जाता है यह यजमान के लिये ही हानिकारक है, क्योंकि यदि किसी दूसरे यजमान का उसी दिन विवाहादि हो तो वो पुरोहित वहां भी नियुक्त होंगे ही होंगे।

इस विषय में हम यहां ढेरों प्रमाण नहीं देंगे मात्र एक ही प्रमाण प्रस्तुत करेंगे और भिज्ञजन इसका आशय समझ लेंगे, भले ही इसके विषय में भी ढेरों प्रमाण उपलब्ध हैं :

पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्। श्राद्धकृच्छ्राद्धभुक् चैव सर्वमेतद्विवर्जयेत्॥
स्वाध्यायं कलहं चैव दिवा स्वप्नञ्च सर्वदा।
मत्स्यपुराण/१६/५६, पद्मपुराण/१/९/१२०

पाचकान्ने नवश्राद्धे सग्रहे चन्द्रसूर्ययोः । स्त्रीणां प्रथमगर्भेषु भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ अंगिरा स्मृति १०९

ब्रह्मौदने च सोमे च सीमन्तोन्नयने तथा । जातश्राद्धे नवश्राद्धे भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ अत्रि संहिता ३०३

नवश्राद्धे त्रिपक्षे च षण्मासे मासिकेऽब्दिके । पतन्ति पितरस्तस्य यो भुङ्क्तेऽनापदि द्विजः ॥
चान्द्रायणं नवश्राद्धे पराको मासिके तथा । त्रिपक्षे चैव कृच्छ्रः स्यात्षण्मासे कृच्छ्रमेव च ॥
आब्दिके पादकृच्छ्रे स्यादेकाहः पुनराब्दिके। ब्रह्मचर्यमनाधाय मासश्राद्धेषु पर्वसु ॥
द्वादशाहे त्रिपक्षेऽब्दे यस्तु भुङ्‌क्ते द्विजोत्तमः । पतन्ति पितरस्तरय ब्रह्मलोके गता अपि ॥
एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वा संचयने त्र्यहम्। उपोष्य विधिवद्विनः कूष्माण्डीं जुहुयाद्धृतम् ॥
अत्रि संहिता ३०७ – ३११

इस प्रकार समाज में व्यावहारिक विसंगति और दोष से बचने के लिये श्राद्ध में नियुक्त होने वाले महापात्र और श्राद्ध में नियुक्त नहीं होने वाले पुरोहित दोनों भिन्न-भिन्न ब्राह्मण वर्ग बन गए। ये तो भोजन की बात हुई प्रतिग्रह दोष की चर्चा तो शेष ही है। वर्तमान में महापात्र भी श्राद्ध भोजन (प्रेतान्न भोजन प्रतीकात्मक) से उपरत होते दिखते हैं किन्तु प्रतिग्रह दोष का क्या ?

प्रतिग्रहाच्छ्रुध्यति जाप्यहोमं न याजनं कर्म पुनन्ति वेदाः ॥ गरुडपुराण २/४२/२१

प्रतिग्रहेण ब्राह्मणानां ब्राह्मं तेजः प्रणश्यति ॥ विष्णु स्मृति ५७/७

प्रतिग्रहेण विप्राणां ब्राह्म्यं तेजो हि शाम्यति॥
स्कन्दपुराणम्/खण्डः १ (माहेश्वरखण्डः)/कौमारिकाखण्डः/६/७२

प्रतिग्रहेण तेजो हि विप्राणा शाम्यतेऽनघ। प्रतिग्रहं ये नेच्छेयुस्तेऽपि रक्ष्यास्त्वया नृप॥
महाभारतम/अनुशासनपर्व-१३/७०/२५

पावका इव दीप्यन्ते जपहोमैर्दिजोत्तमाः । प्रतिग्रहेण नश्यन्ति वारिणा इव पावकाः ॥
तान्प्रतिग्रहजान्दोषान्प्राणायामैर्द्विजोत्तमाः । उत्सादयन्ति विद्वांसो वायुर्मेघानिवाम्बरे ॥
अत्रि संहिता १४४ – १४५

श्राद्ध में नियुक्त होने वाले ब्राह्मण जो अन्यान्य कर्मों में नियुक्त नहीं हो सकते वो महापात्र वर्ग एक मात्र श्राद्ध में ही नियुक्त होते हैं और सपिंडीकरण पर्यन्त षोडश श्राद्ध में सम्पूर्ण अधिकार रखते हैं और वर्त्तमान में महापात्र हों अथवा पुरोहित किसी की भी योग्यता का विचार नहीं किया जा रहा है, कारण वही कि योग्य हों तो यजमान ही उनको न झेल पाये अर्थात यजमान भी अयोग्य ही होता है और अयोग्य के लिये योग्य उपलब्ध नहीं हो सकते।

चलो भोजन (प्रेतान्न/श्राद्ध) प्रतीकात्मक होने से एक बार उसका दोष नगण्य स्वीकार कर भी लें किन्तु प्रतिग्रह तो प्रतीकात्मक नहीं होता है अर्थात प्रतिग्रह दोष का तो निवारण अपेक्षित होता है। यह प्रतिग्रह दोष पुरोहित वर्ग में भी व्याप्त न हो यह भी विचारणीय है क्योंकि यदि पुरोहित वर्ग भी इस प्रतिग्रह दोष से युक्त हो जायें तो फिर बिना निवारण के वो अन्यान्य देवकर्मों के योग्य नहीं रहेंगे।

शिखा आदि से रहित, व्रात्यादि अनेकानेक दोषयुक्त व्यक्ति योग्य ब्राह्मण का यजमान बनने का अधिकार ही नहीं रखता। अस्तु इस व्यावहारिक समस्या या विसंगति का निराकरण नहीं है। क्योंकि वही पुरोहित यदि योग्य हो जायें तो उस यजमान के यहां अधिक दान-दक्षिणा-सम्मान आदि मिलने पर भी न जायें जिसके यहां अयोग्यता के कारण कम दान-दक्षिणा और अपमान होने पर भी जाते हैं। योग्य ब्राह्मण का यजमान वही बन सकता है जिसका कर्माधिकार सुरक्षित हो, पाप का प्रायश्चित्त करता हो।

यहां जो स्पष्ट हो रहा है वो यह कि पुरोहित वर्ग सपिण्डीकरण से पूर्व भोजन आदि भी न करें, वरण-दान लेने की तो बात करनी ही नहीं चाहिये, अर्थात श्राद्ध कर्म में किसी भी प्रकार सम्मिलित ही न हों, यद्यपि सम्मिलित हो जाते हैं। इसका भी कारण है कि पुरोहित वर्ग ही अधिक संख्या में उपलब्ध होते हैं एवं कर्मकांड का थोड़ा-बहुत ज्ञान भी पुरोहितों ने ही सुरक्षित रखा है, कर्मकांड संबंधी ज्ञान के विषय में महापात्र वर्ग जो है वो पुरोहित वर्ग से भी पीछे रहता है और इस कारण जो उपलब्ध हैं उनको सम्मिलित होना ही होगा, भले ही भोजन-दान आदि ग्रहण न करें।

किन्तु यहां सम्मिलित होने पर भोजन भी एक प्रकार से बाध्यकारी हो जाता है श्राद्ध में वही ब्राह्मण सम्मिलित हो सकते हैं जो भोजन करें, जो भोजन नहीं करेंगे वो सम्मिलित ही नहीं हो सकते। तो इस विषय में विकल्प ही रहता है कि श्राद्धकर्ता के हाथ से भोजन नहीं करते हैं बस।

विमर्श यहां पर आ गया है कि पुरोहित सपिंडीकरण से पूर्व दानादि क्यों नहीं ले सकते ? इसका क्या प्रमाण है?

सपिण्डने ततो वृत्ते पितृलोकं स गच्छति । तस्मात्पुत्त्रेण कर्तव्यं सपिण्डीकरणं पितुः ॥
संवत्सरे तु सम्पूर्णे कुर्यात्पिण्ड प्रवेशनम् । पिण्डप्रवेशविधिना तस्य नित्यं मृताह्निकम् ॥
निश्चितं पक्षिशार्दूल वर्षान्ते पिण्डमेलनम् । सहपिण्डे कृते प्रेतस्ततो याति परां गतिम् ॥
तन्नाम सम्परित्यज्य ततः पितृगणो भवेत्। त्रिपक्षे वापि षण्मासे मेलयेत्प्रपितामहैः ॥

ज्ञात्वा वृद्धिविवाहादि स्वगोत्रविहितानि च। विवाहं नैव कुर्वीत मृते च गृहमेधिनि ॥
भिक्षुर्भिक्षां न गृह्णाति यावत्कुर्यात्सपिण्डनम्। स्वगोत्रेऽप्यशुचिस्तावद्यावत्पिण्डं न मेलयेत् ॥
मेलनात्प्रेतशब्दस्तु निवर्तेत खगेश्वर ॥
गरुडपुराण/२/२६/७ – १२

गरुडपुराण (षोडषाध्यायी) के अध्याय १३ में कुछ इस प्रकार मिलता है -

मया तु प्रोच्यते तार्क्ष्यशास्त्रधर्मानुसारतः। चतुर्णामेव वर्णानां द्वादशाहे सपिण्डनम्‌॥
अनित्यत्वात्कलिधर्माणां पुंसां चैवायुषः क्षयात्‌ । अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहे प्रशस्यते॥
व्रतबन्धोत्सवादीनि व्रतस्योद्यापनानि च। विवाहादि भवेन्नैव मृते च गृहमेधिनि॥
भिक्षुर्भिक्षां न गृह्णाति हन्तकारो न गृह्यते। नित्यं नैमित्तिकं लुप्येद्यावत्पिण्डो न मेलितः॥ ३२॥
कर्मलोपात्प्रत्यवायी भवेत्तस्मात्सपिण्डनम्‌ । निरग्निकः साग्निको वा द्वादशाहे समाचरेत्‌॥
गरुडपुराण (षोडषाध्यायी) /१३/२९ – ३३

अस्थिक्षेपे गयाश्राद्धं श्राद्धञ्चापरपक्षिकम् । अब्दमध्ये न कुर्वीत सपिण्डीकरणं विना ॥
गरुडपुराण २/३४/११३

भिक्षुर्भिक्षां न गृह्णीयाद्यावन्न स्यात्सपिण्डनम् । स्वगोत्रेष्वशुचिस्तावद्यावत्पिण्डं न मेलयेत् ॥
आनन्त्यात्कुलधर्माणां पुंसां चैवायुषः क्षयात्। अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहे सपिण्डयेत् ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्डः १ (कृतयुगसन्तानः)/७३/१९ – २१

यहां अनेकों प्रमाणों द्वारा यह स्पष्ट होता है कि सपिण्डीकरण से पूर्व प्रेतकर्म के अतिरिक्त अन्यान्य सभी कर्म निषिद्ध होते हैं। इस प्रकार वो सभी कर्म निषिद्ध हो जाते हैं जिसमें पुरोहित ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। यह उपरोक्त प्रमाणों का निष्कर्ष है उसका विश्लेषण नहीं किया जा रहा है विद्वद्जन स्वयं ही चिंतन-मनन करें क्योंकि मनन शक्ति तो होनी ही चाहिये।

विवाहादि कर्म, गयाश्राद्ध, व्रतोत्सवादि के साथ ही अन्यान्य सभी नित्य-नैमित्तिक कर्मों का सपिण्डीकरण न होने पर बाध हो जाता है। ब्राह्मण (पुरोहित) भोजन, पुरोहित को दानादि की तो चर्चा ही क्या करें, अतिथिभोजन, भिक्षा आदि तक का भी बाध स्पष्ट हो रहा है। अस्तु पुरोहित वर्ग का भोजन, पुरोहित को दिया जाने वाला दान प्रमाणों द्वारा सपिण्डीकरण के पश्चात् को ही सिद्ध होता है, एकादशाह को नहीं। यद्यपि व्यवहार में बहुत स्थानों पर एकादशाह के दिन ही होते हैं।

अब यहां आगे एक प्रश्न पुनः उत्पन्न होता है कि यदि पुरोहित को दानादि नहीं कर सकते तो महापात्र को (एकादशाह को होने वाला दान) कैसे दे सकते हैं? यद्यपि ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि प्रेतकर्म (श्राद्ध) के अतिरिक्त अर्थात महापात्र की नियुक्ति जिसमें हुई हो उसके अतिरिक्त अन्य कर्मों का बाध होता है, प्रेतत्वनिवृत्यर्थ महापात्र को दान देने का नहीं और इसके प्रशस्त होने के बहुशः प्रमाण भी गरुडपुराण में ही प्राप्त होते हैं। हम यहां मत्स्यपुराणोक्त प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं :

सूतकान्ताद्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद्विलक्षणाम्। काञ्चनं पुरुषं तद्वत् फलवस्त्रसमन्विताम्॥
संपूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः। वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा॥
मत्स्यपुराण/१८/१२ – १४

अन्यान्य प्रमाण गरुडपुराण में वर्णित एकादशाह विधि में अवलोकनीय।

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि वर्त्तमान काल में सपिण्डीकरण द्वादशाह को ही प्रशस्त है किन्तु सपिण्डीकरण से पूर्व अन्य कर्म (जिसमें पुरोहित नियुक्त होते हों) का बाध हो जाता है और इस कारण एकादशाह को सामान्य उत्सर्ग (पुरोहित को दिया जाने वाला दान) निषिद्ध सिद्ध होता है एवं महापात्र को दिया जाने वाला दान एकादशाह को ही सिद्ध होता है।

इस प्रकार यहां संशोधित अपात्रक श्राद्ध विधि के मुख्य भाग प्रस्तुत किये गये। यह तो स्पष्ट किया ही जा चुका है कि यह प्रयोग हेतु नहीं है अपितु इसके माध्यम से खंडन, सुझाव आदि को आमंत्रित किया जा रहा है। अभी परिष्करण शेष भी है। विद्वद्जनों से प्रार्थना है कि जो भी मूर्खाचार्य-शास्त्रदस्यु आदि शब्द प्रयोग किया गया है वो न तो विद्वानों को लक्षित करता है और न ही सामान्य पुरोहितों को। अतः विद्वद्जन इसे स्वयं के प्रति ग्रहण न करें एवं सामान्य पुरोहित वर्ग भी स्वयं के प्रति ग्रहण न करे।

ये जिसके लिये प्रयोग किया गया है सभी समझ रहे होंगे इतनी दृष्टि सामान्य लोगों को भी होती है और ऊपर से ढेरों लक्षण भी लगभग बताये ही गये। मूर्खाचार्य भी स्वयं के प्रति लक्षित भाव से विदित हो जायेंगे और उनको स्पष्ट ही कह रहा हूँ कि यदि यह ज्ञात हो कि आप इन लक्षणों को धारण करते हैं तो कुपित होने की आवश्यकता नहीं सुधार करने की आवश्यकता है क्योंकि यदि सुधार नहीं करेंगे तो आगे और भी कठोर नीति का आश्रय लिया जायेगा।

एक और महत्वपूर्ण विषय यह भी है कि सरकारी नौकरी आदि करने वाले एवं अन्यान्य वृत्ति से जुड़े लोग मुख्यतः नौकरी करने वाले ही कर्मकांड में अनर्ह हैं एवं जो वर्त्तमान काल में विद्यमान हैं उनको ससम्मान विदा करने के लिये कृतसंकल्प हूँ किन्तु जो नवागंतुक होंगे उनको स्वतः ही इस कर्मकांड से विरक्त रहना होगा। यदि आपके पास अन्य वृत्ति है तो कर्मकांड वृत्ति से जुड़े व्यक्तियों की वृत्ति पर प्रहार करना व्यावहारिक दोष भी है एवं शास्त्र से भी आप अग्राह्य सिद्ध होते ही हैं। टीचर, प्रोफेसर आदि कुछ भी हों, वेद से ही क्यों न हों यदि आप सरकारी संस्थानों में कार्यरत हैं अथवा सेवानिवृत्त हो चुके हैं तो भी यदि सरकारी धन प्राप्त कर रहे हैं, उस स्थिति में कर्मकांड के लिये अनधिकारी हैं। यदि गुरुकुल में भी सेवाशुल्क ग्रहण करके पढ़ाने वाले अध्यापक हों तो उन्हें भृतकाध्यापक कहा गया है और अग्राह्य कहा गया है, सरकारी कर्मचारी की तो बात ही क्या करें ? ऐसे भृतकाध्यापक वेद-वेदांग के ज्ञाता हों तो भी मूर्ख पुरोहित के समक्ष अग्राह्य हैं, जबकि ये ज्ञाता होते हैं व्याकरण, ज्योतिष आदि मात्र किसी एकाध वेदांग के अथवा साहित्य आदि के। जो नये-नये आने वाले हैं (नौकरी करने वाले) वो सावधान हो जायें, आप कर्मकांड में नहीं आ सकते क्योंकि सेवकत्व दोष से युक्त हो जाते हैं। यदि धन प्राप्त हो ही रहा है तो वहीं शान्ति से रहें, सारा (विकार) किया धरा ऐसे लोगों का ही है।

ऐसे लोगों ने ही कर्मकांड को नष्ट-भ्रष्ट किया है अतः जो विद्यमान हैं उनको तो विदा होने का अवसर दिया जा रहा है किन्तु जो नये आ रहे हैं आ आने वाले हैं उनका प्रतिकार किया जायेगा और कर्मकांड से येन-केन-प्रकारेण बहिर्गत किया जायेगा। जिसकी वृत्ति है उसके लिये रहने दो उसमें चोरी करना बंद करो। औरों की क्या बात करूँ लगभग ३ दशकों से मैं कर्मकांडी हूँ और मैं स्वयं भी इन भृतकाध्यापकों से उत्पीड़ित हूँ, मेरा भी उत्पीड़न किया है, मेरी वृत्ति का भी हरण करते रहे हैं। बेगूसराय में इन भृतकाध्यापकों ने आतंक (कर्मकांड के विषय में) सा मचा रखा है और लगभग ३ दशकों से तो मैं भी देख रहा हूँ।

क्या किसी को ऐसा प्रतीत होता है कि ये भृतकाध्यापक इस प्रकार कहने मात्र से कर्मकांड वृत्ति का परित्याग कर देंगे ? असंभव है ये इतने से कभी नहीं मानेंगे किन्तु कुछ वृद्धों को ससम्मान विदा कर देना आवश्यक है। जो भी इसका अवलोकन कर रहे हैं आप इस विषय को विस्तार नहीं दे सके यदि मैं ससम्मान विदाई के लिये प्रतीक्षा कर सकता हूँ तो आपको भी एक दशक प्रतीक्षा करनी होगी। किसी भी भृतकाध्यापक को व्यावहारिक रूप से तत्काल कोई कुछ न कहे और यदि कोई इस विषय में कुछ संवाद-विवाद करेगा तो ये उसके स्वयं का दायित्व होगा।

मैं इस प्रकार के सभी दायित्वों का अस्वीकरण कर रहा हूँ। क्योंकि मैं एक दशक प्रतीक्षा की बात कर रहा हूँ। अस्तु इस विषय में न ही व्यक्तिगत रूप से और न ही सोशलमीडिया आदि प्रकार से अथवा अन्यान्य भी किसी प्रकार से इस विषय की चर्चा न करें यही विनती करता हूँ। यहां चर्चा करने का तात्पर्य या है कि जो भृतकाध्यापक स्वतः अवलोकन करेंगे वो स्वतः ही विचार करें, किसी को इस प्रकार की चर्चा करने का अवसर ही प्रदान न करें। यदि प्रमाण चाहिये तो इस आलेख का अवलोकन कर सकते हैं :- कर्मकाण्ड में ग्राह्याग्राह्य ब्राह्मण अर्थात पात्रापात्र विचार – प्रमाण संकलन

श्राद्ध में पुरोहित को भी दान क्यों ?

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति