पार्थिव पूजनं – स्तोत्र
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार


स्तोत्र में अष्टक, कवच, शतनाम, सहस्रनाम के साथ अन्यान्य अनेकों स्तोत्रों का संकलन किया गया है।
ब्राह्मण वरण सामग्री : जोड़ा धोती, गमछा आदि
नारियल (पानी वाला) : 1
दीप, बत्ती
पीली सरसों: 1 पुड़िया
अरबा चावल : 500 ग्राम
तिल – जौ : २५ ग्राम
चंदन (श्रीखण्ड-मलयागिरि आदि) : 1
कुंकुम, सिंदूर, भस्म, केसर
धूप : 100 ग्राम, धूना-गुग्गुल
कपूर : 25 ग्राम
घी – शक्कड़ : 500 ग्राम, मधु : 200 ग्राम
दूध – पञ्चामृत और अभिषेक के अनुसार, दही
पान, सुपारी, लौंग, इलायची
वस्त्र : धोती, गमछा भगवान को चढाने व ब्राह्मण वरण हेतु, साड़ी, साया, ब्लॉज पीस, चुनड़ी आदि पार्वती जी के लिये ।
शृंगार सामग्री : ऐना, कंघी, अलता, पैररंगा, केशपिन, बिंदी, मेंहदी, काजल, सुगन्धित तेल, लहठी इत्यादि
आभूषण (यथासंभव)
पीला कपड़ा, उजला कपड़ा आवश्यकतानुसार, कटिसूत्र (डांरकडोर), यज्ञोपवीत,
नैवेद्य (यथासंभव) : पञ्चमेवा (शुद्ध पञ्चमेवा) – मिसरी : 500 ग्राम, मिठाई, पकमान, पुआ, खीर, हलुवा, चूड़मा, केला एवं अन्य फल
आसन : स्वयं एवं ब्राह्मण के लिये शुद्ध आसन
भांग का गोला : पीसा हुआ
गंगा जल
फूल, माला, तुलसी, दूर्वा, शमीपत्र, बेलपत्र, आम का पल्लव, केला का पत्ता। जहां केला का पत्ता अनुपलब्ध हो वहां अन्य उपलब्ध अथवा भोज के पत्ते का प्रयोग किन्तु थर्मोकॉल प्लेट–दोने का प्रयोग न करें। पीतल थाली-कटोरी का प्रयोग करें।
विशेष सामग्रियों को पृथक कहा गया है। यहां ऐसा न समझा जाय कि कलशस्थापन सामग्री को नहीं लिया गया है किन्तु जिन सामग्रियों को मुख्यतः सप्तमृत्तिकादि; कलश स्थापन सामग्री समझा जाता है वो सभी अपद्रव्य होते हैं और पूजा में प्रयोग करना तो दूर की बात है स्पर्श के योग्य भी नहीं होते। इस विषय को पवित्रता अनुभाग में समझा जायेगा।
अष्टक
कवच
पूजा में मुख्य भाव ही होता है सामग्रियां गौण होती हैं, किन्तु भाव होने पर सामर्थ्यानुसार आवश्यक सामग्रियों का भी प्रबंध किया जाता है भले ही वो सबरी के बैर ही क्यों न हों, सुदामा के तण्डुल ही क्यों न हो। भाव पूर्वक सामर्थ्यानुसार उपलब्ध एक सामग्री भी भगवान भाव से ही ग्रहण कर लेते हैं किन्तु अहंकार पूर्वक, प्रदर्शन करने वालों आदि के सर्वस्व समर्पण को भी स्वीकार न करें।
इसलिये पूजा करनी तो चाहिये भाव से ही किन्तु पूजा में अर्पित होने वाली सामग्रियां भी सामर्थ्यानुसार उपलब्ध करने का प्रयास करना चाहिये। जब भाव की प्रबलता होती है तो जो सामग्रियां सबके लिये उपलब्ध न हो वो भी सहजता से उपलब्ध हो जाती है। पार्थिव (शिव) पूजन की विशेष सामग्रियों को इस प्रकार समझा जा सकता है :


शतनाम
वर्त्तमान युग में पवित्रता का अर्थ स्वच्छता मात्र समझना सामान्य बात हो गई है और यह मतिभ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार भ्रमित लोगों की बुद्धि के अनुसार हवन करने से वायुमंडल की शुद्धि होती है, यदि वायुमंडल को ही शुद्ध करना है तो मन्त्र और विधान की आवश्यकता कहां है फिर ? अर्थात इस प्रकार के भ्रामक तथ्य बड़े स्तरों पर प्रचारित किये जाते हैं और धार्मिक विषयों में वही लोग जो स्वयं भ्रमित हैं इस प्रकार के कुतर्क करके जो शास्त्रीय विधि से कर्मकांड करने वाले उन्हीं को पाठ पढ़ाया करते हैं। कर्मकांड और धर्म में किसी विषय की सिद्धि के लिये वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता ही नहीं है, ये विज्ञान (वर्त्तमान साइंस) से परे है और स्वयं विज्ञान ही आधार प्राप्त करता है।
पवित्रता के लिये यह आवश्यक होता है कि हमारा द्रव्य (धन), अन्न, गृह, वस्त्र, पात्र, देश (स्थान), सामग्री (प्रयुक्त होने वाले द्रव्य) आदि सभी पवित्र हों न कि केवल शरीर स्वच्छ हो। शास्त्रीय विधान का पालन करने से ही मन भी स्वच्छ होता है, न कि केवल कहने से। आज ढेरों कहने वाले हैं आन्तरिक शुद्धि किन्तु एक ओर आतंरिक शुद्धि की बात करते हैं और दूसरी ओर शास्त्रीय सिद्धांतों का खंडन करते रहते हैं।
बाह्याभ्यन्तर शुद्धि में शारीरिक और मानसिक दोनों शुद्धि की बात है और तर्क पर आधारित शुद्धि का महत्व नहीं है, शास्त्रीय विधान से शुद्धि करे यह आवश्यक है। तर्क पर आधारित शुद्धि में संसर्ग आदि दोषों को अस्वीकार किया जाता है जबकि शास्त्रीय शुद्धि में संसर्गादि भी विचार किया जाता है। शारीरिक शुद्धि खंड में प्रमुख तथ्य इस प्रकार समझे जा सकते हैं :


सहस्रनाम
वर्त्तमान युग में पवित्रता का अर्थ स्वच्छता मात्र समझना सामान्य बात हो गई है और यह मतिभ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार भ्रमित लोगों की बुद्धि के अनुसार हवन करने से वायुमंडल की शुद्धि होती है, यदि वायुमंडल को ही शुद्ध करना है तो मन्त्र और विधान की आवश्यकता कहां है फिर ? अर्थात इस प्रकार के भ्रामक तथ्य बड़े स्तरों पर प्रचारित किये जाते हैं और धार्मिक विषयों में वही लोग जो स्वयं भ्रमित हैं इस प्रकार के कुतर्क करके जो शास्त्रीय विधि से कर्मकांड करने वाले उन्हीं को पाठ पढ़ाया करते हैं। कर्मकांड और धर्म में किसी विषय की सिद्धि के लिये वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता ही नहीं है, ये विज्ञान (वर्त्तमान साइंस) से परे है और स्वयं विज्ञान ही आधार प्राप्त करता है।
पवित्रता के लिये यह आवश्यक होता है कि हमारा द्रव्य (धन), अन्न, गृह, वस्त्र, पात्र, देश (स्थान), सामग्री (प्रयुक्त होने वाले द्रव्य) आदि सभी पवित्र हों न कि केवल शरीर स्वच्छ हो। शास्त्रीय विधान का पालन करने से ही मन भी स्वच्छ होता है, न कि केवल कहने से। आज ढेरों कहने वाले हैं आन्तरिक शुद्धि किन्तु एक ओर आतंरिक शुद्धि की बात करते हैं और दूसरी ओर शास्त्रीय सिद्धांतों का खंडन करते रहते हैं।
बाह्याभ्यन्तर शुद्धि में शारीरिक और मानसिक दोनों शुद्धि की बात है और तर्क पर आधारित शुद्धि का महत्व नहीं है, शास्त्रीय विधान से शुद्धि करे यह आवश्यक है। तर्क पर आधारित शुद्धि में संसर्ग आदि दोषों को अस्वीकार किया जाता है जबकि शास्त्रीय शुद्धि में संसर्गादि भी विचार किया जाता है। शारीरिक शुद्धि खंड में प्रमुख तथ्य इस प्रकार समझे जा सकते हैं :


विविध स्तोत्र
वर्त्तमान युग में पवित्रता का अर्थ स्वच्छता मात्र समझना सामान्य बात हो गई है और यह मतिभ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार भ्रमित लोगों की बुद्धि के अनुसार हवन करने से वायुमंडल की शुद्धि होती है, यदि वायुमंडल को ही शुद्ध करना है तो मन्त्र और विधान की आवश्यकता कहां है फिर ? अर्थात इस प्रकार के भ्रामक तथ्य बड़े स्तरों पर प्रचारित किये जाते हैं और धार्मिक विषयों में वही लोग जो स्वयं भ्रमित हैं इस प्रकार के कुतर्क करके जो शास्त्रीय विधि से कर्मकांड करने वाले उन्हीं को पाठ पढ़ाया करते हैं। कर्मकांड और धर्म में किसी विषय की सिद्धि के लिये वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता ही नहीं है, ये विज्ञान (वर्त्तमान साइंस) से परे है और स्वयं विज्ञान ही आधार प्राप्त करता है।
पवित्रता के लिये यह आवश्यक होता है कि हमारा द्रव्य (धन), अन्न, गृह, वस्त्र, पात्र, देश (स्थान), सामग्री (प्रयुक्त होने वाले द्रव्य) आदि सभी पवित्र हों न कि केवल शरीर स्वच्छ हो। शास्त्रीय विधान का पालन करने से ही मन भी स्वच्छ होता है, न कि केवल कहने से। आज ढेरों कहने वाले हैं आन्तरिक शुद्धि किन्तु एक ओर आतंरिक शुद्धि की बात करते हैं और दूसरी ओर शास्त्रीय सिद्धांतों का खंडन करते रहते हैं।
बाह्याभ्यन्तर शुद्धि में शारीरिक और मानसिक दोनों शुद्धि की बात है और तर्क पर आधारित शुद्धि का महत्व नहीं है, शास्त्रीय विधान से शुद्धि करे यह आवश्यक है। तर्क पर आधारित शुद्धि में संसर्ग आदि दोषों को अस्वीकार किया जाता है जबकि शास्त्रीय शुद्धि में संसर्गादि भी विचार किया जाता है। शारीरिक शुद्धि खंड में प्रमुख तथ्य इस प्रकार समझे जा सकते हैं :


