सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें

मिथिला देशीय संशोधित श्राद्ध विधि

॥ मङ्गलाचरण ॥

यस्याङ्के च विभाति शैलसुतया
देवो जगत्कारणम्
विघ्नानां शमनं नमामि सततं
लम्बोदरं श्यामलम्।
सिद्धिं यः कुरुते स्मृतोऽपि सहसा
कार्येषु सर्वार्थदः
तं देवं गिरिधारि-मानस-चरं
विघ्नेशमुच्चैर्भजे ॥१॥
लक्ष्मीकान्तमजं निरस्तकुहकं
विश्वेश्वरं शाश्वतं,
ध्येयं योगिभिरादिपूरुषमहो
संसारसिन्धूत्तरम्।
दाता यः परमस्य सद्गतिविधेः
प्रह्लादकारी हरिः,
वन्दे तत्पदपङ्कजं हृतमलं
विष्णोः पवित्रं सदा ॥२॥
श्वेताब्जे विहरन्त्यगाध-मतिदा
वाग्देवता भारती,
गङ्गा या सुरदीर्घिका त्रिपथगा
पापान्धकार-च्छिदा।
वाणी-जाह्नवि-पाद-पद्मममलं
ध्यात्वा मुदा सर्वदा,
ग्रन्थस्यास्य सुसिद्धये हि मनसा
याचे प्रसीदन्तु मे ॥३॥
ये लोकाः पितरः स्वधा-रति-रताः
स्वर्गे स्थिताः सर्वदा
पुत्राणां शुभमङ्गलाशिषमुदा
कुर्वन्ति ते पावनम्।
श्राद्धेनात्र सुतर्पिताः प्रमुदिता
यच्छन्ति सायुज्यताम्
तान्वन्दे गिरिधारि-नामक-बुधः
श्रेष्ठान् पितॄन् सादरम् ॥४॥
श्राद्धं कर्म सुदुर्लभं कलि-मले
सम्मोहितैः मानवैः
पद्धत्या नियमेन सुष्ठु विधिना
सिद्धं भवेत्सर्वदा।
तस्माद् वै द्विज-तुष्टये च सुलभं
बोधं विधातुं मुदा
तन्वेऽहं सुविचारितं सुविमलं
श्राद्धस्य मार्गं परम् ॥५॥
मन्त्रौघस्य परम्परां सुविमलां
शास्त्रोक्तरीतिं पराम्,
दृष्ट्वा वेद-पुराण-वाक्य-निवहं
संग्रथ्य यत्नेन च।
"सिद्धं वै च सुसिद्ध-श्राद्ध-पद्धतिः"
नाम्ना कृता निर्मला,
सज्जनैः परिगृह्यतां हृदि सदा
कल्याण-सौख्यप्रदा ॥६॥
यावच्चन्द्र-दिवाकरौ च गगनं
गङ्गा-मही-मण्डलं
तावद् राजतु पद्धतिः सुविमला
सच्छास्त्र-सिद्धा भुवि।
गीर्वाणैः पितृभिश्च तुष्ट-मनसा
देयः शुभः सद्गुणः
नारायण-पदारविन्द-युगले
ग्रन्थो मयाऽयं कृतः ॥७॥

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें ?

मनीषिणां भूमिमूर्वीं मिथिलां रुद्रधारया।
वाचस्पत्येन सिक्तं यन्मूलं श्राद्धमपात्रकम्॥१॥
अरक्षिते शतषट्के दुष्टवातातपादिभिः।
क्षुधातृषार्ताः पितरः क्लिश्यन्तेफलवर्जिताः॥२॥
त्र्यशीत्यधिकद्विसहस्रे सिञ्चत्येवं सगिरधारी।
"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" हि दैव सहायादर्पितं॥३॥

श्राद्ध की विधि का जो तात्पर्य है सर्वप्रथम उसको समझना आवश्यक है क्योंकि बहुत लोग श्राद्ध की विधि का भी गलत अर्थ ही लगाते हैं और हमारे क्षेत्र में तो यह अर्थ ही लगाया जाता है कि द्वादशाह को एक-एक करके १४ मासिक किया जाना विधिपूर्वक श्राद्ध है, प्रातःकाल से आरम्भ करके सायंकाल तक ९ – १० घंटे तक करना विधिपूर्वक श्राद्ध है।

सर्वप्रथम इसी भ्रम का उन्मूलन करना आवश्यक है कि ये मूर्खों का मनगढंत विचार है। विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य आगे विस्तार से समझाया जायेगा किन्तु उसे समझने के लिये इस दुराग्रह का परित्याग आवश्यक है अथवा इसका प्रमाण ढूंढकर इसीको पुष्ट करें।

किन्तु यदि इसका कोई प्रमाण अप्राप्य है तो इस बात की गांठ बांधना दुराग्रह मात्र ही है जो मूर्खों द्वारा प्रचारित किया गया है।

विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य

“जहाँ विधि नहीं, वहाँ केवल औपचारिकता है, आध्यात्मिक लाभ नहीं।”

वास्तव में विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य श्राद्ध विषयक जो देश, काल, अधिकारी, सामग्री, शुद्धता, विहित-निषिद्ध आदि प्रकरण हैं उनका पालन करते हुए श्राद्ध क्रिया के मंत्रादि का उचित प्रयोग करते हुये पितरों के निमित्त उत्सर्ग-दानादि करना है।

किन्तु वर्तमान में हमें जो दिखता है उसमें न तो देश का विचार मिलता है न ही काल निर्धारण, अधिकारी विषयक विसंगतियां भी दिखने लगी हैं, सामग्री और शुद्धता समाप्त हो चुकी है, विहित-निषिद्ध का कुछ अंश है, मंत्रप्रयोग में मात्र व्याकरण-व्याकरण सुनने को मिलता है और वैयाकरण ऐसे उद्दण्ड हो गये कि वेदमंत्र प्रयोग का ककहरा भी नहीं जानते एवं शब्दों का उच्चारण करते-कराते हैं उसमें भी कहीं उचित संधि विच्छेद पूर्वक तो कहीं अनुचित इसका ज्वलंत उदाहरण आपको भी देखने-सुनने को मिलता ही होगा “मुतोषसो” विवाद। अरे धूर्तों मुतोषसो है ही नहीं “मधुनक्तमुतोषसो” है।

जो मधुनक्त ; मुतोषसो पढ़ाते हैं अथवा जो मधुनक्तं ; उतोषसो पढ़ाते हैं दोनों ही प्रज्ञाविहीन हैं किन्तु विवाद यही देखने को मिलता है।

इसी प्रकार तीन बार पितृगायत्री के स्थान पर एक बार और नौ बार के स्थान पर तीन बार पढ़ाते हैं अर्थात एक तिहाई पढ़ाते हैं और दो-तिहाई निगल जाते हैं। इसी प्रकार मधुमती ऋचा का मात्र एक अथवा दो बार पाठ करते हैं, आचमन विलुप्त है अर्थात् शुद्धि समाप्त, स्वंय और अपसव्य के स्थान पर निवीति कर देते हैं क्योंकि ज्ञात ही नहीं। किन्तु इतनी त्रुटियों के साथ मात्र एक विषय कि एक-एक मासिक करके किया तो विधिपूर्वक किया का दम्भ भरते हैं, अरे धूर्तों ऐसा विधान है ही नहीं और जिसे लगता हो वो इसका प्रमाण प्रस्तुत करें ।

इस प्रकार हम यदि श्राद्ध विधि को समझना चाहें तो हमें इन विषयों को समझना होगा :

  • अपात्रक विचार

  • श्राद्धदेश (स्थान)

  • श्राद्ध काल

  • श्राद्ध का अधिकार

  • अनुपनीत ब्राह्मण कर्त्ता के लिए पिण्ड विचार

  • श्राद्धकर्ता के लिये नियम

  • द्रव्य और शुद्धि

  • पात्र विचार

  • दर्भ विचार

  • क्रिया और मंत्रादि प्रयोग

  • वृषोत्सर्ग

  • उत्सर्ग सामग्री पर अधिकार

  • भोज का विचार

देशकालोचितश्रद्धा द्रव्यपात्रार्हणानि च । सम्यग्भवन्ति नैतानि विस्तरात्स्वजनार्पणात् ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण/७/१५/४

उपरोक्त तथ्य की पुष्टि शास्त्रों से भी होती है अर्थात प्रामाणिक तथ्य हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में विधिपूर्वक को सम्यक् कथन से स्पष्ट किया गया है एवं विस्तार (भोजादि का) करना निषिद्ध बताया गया है। हम यहां क्रमशः सभी विषयों को संक्षेप में यहां समझने का प्रयास करेंगे। विस्तृत विचार तो पृथक-पृथक आलेखों में बहुशः प्रमाणों के साथ किये जायेंगे अस्तु यहां प्रमाण भी अल्प मात्रा में ही प्रस्तुत करेंगे। इनमें से यहां “क्रिया और मंत्रादि प्रयोग” भाग की चर्चा अधिक करेंगे।

बाप-दादा चिल्लाने वालों को स्पष्ट सन्देश दिया जाता है कि इस विषय में भूल से भी बाप-दादा का नाम मत लेना। चोर अपनी चोरी को बाप-दादा के नाम पर बचना चाहे तो नहीं बच सकता। बाप-दादा नाम पर तुम्हारे पास ऐसे लोगों के नाम होंगे जिनका कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकोगे, किन्तु मेरे पास महामहोपाध्याय रुद्रधर झा (१४वीं शताब्दि) और वाचस्पति मिश्र (१५वीं शताब्दि) का नाम है जो अपात्रक श्राद्ध की गंगोत्री और यमुनोत्री हैं।

एक पद्धतिकार के रूप में यदि स्वीकार करूँ तो वो मेरे पूर्व पद्धतिकार हैं एवं मैं परवर्ती हूँ, मध्य में कुछ विकृति उत्पन्न करने वाले भी हैं जिनके मत का मैं खंडन कर रहा हूँ। बाप-दादा, गुरु या श्रेष्ठ जनों से भी सद्गुण ही ग्रहण करना चाहिये दुर्गुण नहीं। दुर्गुणों को ग्रहण करके विकृतियों को अंगीकार करके बाप-दादा कहने से बचाव नहीं हो सकता।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

अपात्रक विचार

पितुर्नियुक्ताः पितरो भवंति
क्रियासु दैवीषु भवंति देवाः।
द्विजोत्तमा हस्तनिषक्ततोयास्-
तेनैव देहेन भवंति देवाः ॥
षट्कर्मतत्त्वाभिरतेषु नित्यं
विप्रेषु वेदार्थकुतूहलेषु।
न तेषु भक्त्या प्रविशंति घोरं
महाभयं प्रेतभवं कदाचित् ॥
यद्ब्राह्मणाः स्तुत्यतमा वदन्ति
तद्देवता कर्मभिराचरंति ।
तुष्टेषु तुष्टाः सततं भवन्ति
प्रत्यक्षदेवेषु परोक्षदेवाः ॥

स्कन्दपुराण/७/प्रभासक्षेत्र माहात्म्य/२२/६९ – ७१

अपात्रक विचार में मुख्य विसंगति जो है वो वर्त्तमान में उपलब्ध पद्धतिकारों द्वारा उत्पन्न किया गया है क्योंकि यदि हम मुख्य रूप से पूर्वाचार्य में एक प्रमुख नाम जानना चाहें तो वो वाचस्पति मिश्र हैं। जो भी पद्धतियां विद्यमान हैं उनमें न चाहकर भी इनका उल्लेख करने को पद्धतिकार बाध्य दिखे। जहां अपनी पुष्टि की आवश्यकता हुई वहां इनके नाम को उद्धृत किया और जहां विरुद्ध करना चाहे भले ही वो शास्त्रविरुद्ध भी क्यों न हो तो स्वेच्छा से किया जिससे वर्त्तमानोपलब्ध अपात्रक श्राद्ध पद्धतियां न तो अपात्रक हैं और न ही सपात्रक।

विद्यातपोभ्यां संयुक्तः शान्तः शुचिरलम्पटः । अलुब्धाह्लादनिष्पापा भूदेवा नात्र संशयः ॥
पात्रीभूताश्च विज्ञेया विप्रास्ते नात्र संशयः । तेभ्यो दत्तमनन्तं हि इत्याह भगवान्यमः ॥
बृहद्यम स्मृति ४/५३-५४

वाचस्पति मिश्र से प्राप्त श्राद्धविधि तो पूर्णतः अपात्रक है, किन्तु दान में इसका पालन नहीं किया गया। संभवतः समकालीन प्रतिग्रहाधिकारवश प्रतिग्रह में तो कुशोदक स्वीकार किया गया किन्तु श्राद्ध की अन्य विधियों से लेकर दक्षिणा तक भी अपात्रक ही मिलता है। यदि आप वाचस्पति का अवलोकन करें तो श्राद्ध दक्षिणा में आपको “यथानामगोत्राय” प्राप्त होगा, मेरे पास उपलब्ध है और इसी के आधार पर मैं कह रहा हूँ।

परवर्तियों ने शोधन-विस्तार तो नहीं किया किन्तु विकृत करके उनके ही नाम का लाभ भी प्राप्त किया। हमें तो ऐसा लगता है कि उनकी ही कृति में उनका नाम बाध्यता के कारण दिया गया अन्यथा उसे भी मिटा देते। “पितृभक्तितरङ्गिणी” में आप “यथानामगोत्राय” अवलोकन कर सकते हैं और सोचिये कब १४९० ई० से पूर्व तो आज की उपलब्ध पद्धतियों में “……….. गोत्राय ………. शर्मणे ब्राह्मणाय” कहां से आ गया ? निश्चित रूप से परवर्तियों ने विसंगति उत्पन्न किया एक ओर उनके नाम का आश्रय भी ग्रहण करते रहे और दूसरी ओर विसंगति भी उत्पन्न करते रहे।

हम पुनः इस विसंगति का ही निस्तारण करने जा रहे हैं एवं अन्य अपेक्षित संशोधन भी। संशोधन-परिष्करण घोषित करने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलम्बन तो लिया जायेगा किन्तु आवश्यकतानुसार संशोधित भी किया जायेगा। इस संशोधन का तात्पर्य उनके काल में जो संशोधन आरम्भ हुआ था, उन्होंने जो कालानुसार विस्तार दिया था उसी को गति प्रदान करते हुये वर्त्तमान काल के अनुसार और विस्तार किया जायेगा; विकृत नहीं।

जैसे उस काल में श्राद्ध की अर्हता से तो रहित हो गये थे तभी अपात्रक किया गया किन्तु प्रतिग्रह की अर्हता रही होगी इस कारण प्रतिग्रह में अनधिकारी नहीं माना गया। वर्त्तमान काल में प्रतिग्रह संबंधी अर्हता भी नष्ट हो चुकी है इस कारण इसका भी संशोधन किया जायेगा साथ ही अपात्रक होने पर श्राद्ध (आद्य) के मध्य में छत्रोपानद् दान संगत नहीं है, दक्षिणा पूर्व गोदान तो प्राप्त ही नहीं होता अर्थात ये गोदान तो विद्वद्जनों द्वारा अनुमोदित भी नहीं है।

यदि श्राद्ध के मध्य में दान को स्वीकार किया जाय तो शय्यादान भी भोजनोपरांत होना चाहिये किन्तु वो प्रारम्भ में ही है। दान-विषयक विसंगतियों का निस्तारण अपेक्षित है क्योंकि वर्त्तमान में जो उपलब्ध हैं वो प्रतिग्रहाधिकार भी नहीं रखते।

श्राद्ध में अपात्रकत्व सिद्धि : आगे विभिन्न श्राद्धों में भोजन करने वालों के लिये प्रायश्चित्त वर्णित है अर्थात जो पात्र श्राद्ध में नियुक्त होते हैं उनको प्रायश्चित्त भी श्राद्धानुसार करना आवश्यक होता है। जिस काल में प्रायश्चित्त का लोप देखा गया उस काल में नियुक्ति के अधिकार का भी लोप सिद्ध किया गया। यही अपात्रक श्राद्ध की सिद्धि का मूल मंत्र है एवं इसके साथ ही ज्ञान-तप का विचार भी समाहित है।

भुक्तं चेन्मासिकश्राद्धं प्राजापत्येन शुध्यति
अष्टकां हि ततो भुक्त्वा पूर्वोकेन विशुध्यति
एकोद्दिष्टं ततो भुक्त्वा तत्र चान्द्रायणं चरेत्
अतिकृच्छ्रं चरेद् विद्वान् भुक्त्वा नक्षत्रभोजनम्
कृच्छ्रातिकृच्छ्रं षण्मासे त्रिपक्षे तप्तमेव च
तथा संवत्सरे श्राद्धे सपिण्डे तु तथैव च
बलिं नारायणं भुक्त्वा कृच्छ्रमेकं चरेद् बुधः
अशक्तौ तु तथा सर्वं कृच्छ्रमेकं चरेद् बुधः
अथवापि त्रिरात्रं स्यादेकाहं वापि दुर्बलम्
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धगेहं न गच्छति
इत्याग्निवेश्यगृह्यसूत्रे तृतीयप्रश्ने द्वादशोऽध्याये

अपात्रे ह्यपि यद्दत्तं दहत्यासप्तमं कुलम् । हव्यं देवा न गृह्णन्ति कव्यं च पितरस्तथा ॥
अत्रि संहिता १५२

प्रतिग्रह में अपात्रकत्व सिद्धि : किन्तु जिस काल में श्राद्ध हेतु नियुक्ति खंडित हुआ उस काल में प्रतिग्रह खंडित नहीं हुआ, इसका तात्पर्य है दोनों के लिये भिन्न विधान हैं। यद्यपि कुछ विशेष प्रतिग्रह में भी प्रायश्चित्त प्राप्त होता है किन्तु ज्ञान-तप से युक्त ब्राह्मण जो षट्कर्म में निरत हो वह प्रतिग्रहाधिकार रखता है। प्रतिग्रहाधिकार में मुख्य भाग ज्ञान एवं संध्या (गायत्री जप) है जो प्रतिग्रह के दोष का नाश कर देता है।

वेदविच्चापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम् । विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ॥
मनुस्मृति/३/१७९

यथा वातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान् । तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः ॥
मनुस्मृति/१२/१०१, वशिष्ठ स्मृति २७/२

श्राद्ध में नियुक्ति जिस काल में खंडित हुई उस काल में प्रतिग्रह का अधिकार सिद्ध हुआ जिस कारण वाचस्पति मिश्र ने भी कुशोदकपूर्वक विधान किया किन्तु अब यदि वर्त्तमान काल में विचार करते हैं तो ज्ञात होता है कि प्रतिग्रहाधिकार भी नष्ट हो चुका है। अस्तु जिस प्रकार पात्रत्वाधिकार नष्ट होने से पूर्वकाल के आचार्यों ने अपात्रक श्राद्ध का विधान किया उसी विषय को विस्तार देते हुये वर्त्तमान काल में प्रतिग्रहाधिकार खंडित होने के कारण इसका समापन भी अपेक्षित है। यहां वाचस्पतिमिश्रादि द्वारा ग्राहकता का खंडन न करके उक्त मार्ग का ही अवलम्बन लिया जा रहा है।

निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् । अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥

विष्णुधर्मोत्तरपुराण/२/७३/६६

विधिहिने तथाऽपात्रे यो ददाति प्रतिग्रहम् । न केवलं हि तद्दानं शेषमप्यस्य नश्यति॥

दक्षस्मृति/३/२९

नष्टशौचे व्रतभ्रष्टे विप्रे वेदविवर्जिते । दीयमानं रुदत्यन्नं किं मया दुष्कृतं कृतम् ॥
वेदपूर्णमुखं विप्रं सुभुक्तमपि भोजयेत् । न च मूर्खं निराहारं षड्रात्रं चोपवासिनम् ॥
वेदव्यास स्मृति ४/५३ – ५४

नापात्रे विदुषा किञ्चिदात्मनः श्रेय इच्छता । अपात्रे जातु गौर्दत्ता दातारं नरकं नयेत् ॥
कुलैकविंशतियुतं ग्रहीतारं च पातयेत् । देहान्तरं परिप्राप्य स्वहस्तेन कृतं च यत् ॥
गरुडपुराणम्/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/१४/६ – ७

पात्रे दानं प्रदातव्यं कृत्वा यज्ञवरं द्विजाः । नापात्रे दीयते किंचिद्दत्तं न तु सुखावहम् ॥
स्कन्दपुराण/खण्डः ३ (ब्रह्मखण्डः)/धर्मारण्य खण्डः/३३/२

आमपात्रे यथा न्यस्तं क्षीरं दधि घृतं मधु । विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्च पात्रं रसाश्च ते ॥
एवं गां च हिरण्यं च वस्त्रमश्वं महीं तिलान् । अविद्वान्प्रतिगृह्णानो भस्मी भवति दारुवत् ॥
वशिष्ठ स्मृति ६/२९ – ३०

निधाय वा दर्भबटुनासनेषु समाहितः । मैषासुप्रैषसंयुक्तं विधानं प्रतिपादयेत् ॥
देवल

सुपात्रं मनसां ध्यात्वा दानं दत्वा कुशोपरि। दाता दानफलं भुंक्ते ग्रहीता न हि दोषभाक् ॥
स्मृत्यंतर

ब्राह्मणानामसंपत्तौ कृत्वा दर्भमयान्द्विजान्। श्राद्धं कृत्वा विधानेन पश्चाद्विप्रे प्रदापयेत् ॥

अपात्र को दिया गया दान दाता को भी नरक का भागी बनाता है। वाचस्पति मिश्र ने भी यदि कुशोदक पूर्वक दान स्वीकार किया था तो इसका कारण यह है कि आवाहन (प्रेत) के अभाव से पात्रत्व का अभाव सिद्ध होने पर अपात्रक श्राद्ध का उन्होंने विधान किया किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि प्रतिग्रहाधिकार भी नष्ट हो गया। उस काल में प्रतिग्रहाधिकार की उपस्थिति होने के कारण उन्होंने कुशोदक पूर्वक दान-प्रतिग्रह विहित माना क्योंकि उस काल में तो अग्निहोत्री भी थे। यदि वर्त्तमान काल की बात करें तो त्रिकाल संध्या की क्या कहें शौचाचार भी नष्ट हो गया है, स्नान मात्र भी सकाल-सविधि नहीं किया जाता।

ऐसी स्थिति में प्रतिग्रहाधिकार भी नष्ट हो चुका है इस कारण कुशोदक पूर्वक दान को भी संशोधित किया जा रहा है। यह इसलिये किया जा रहा है कि ऐसा ही शास्त्र से सिद्ध हो रहा है। यहां अनुकरण के साथ संशोधन को भी स्वीकार करना होगा, अनुकरण किया जा रहा है किन्तु जो विषय संशोधन योग्य है "सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" में उसका संशोधन भी किया जा रहा है कारण कि कुशोदक पूर्वक अयोग्य को दान देने से दाता भी नरकगामी बनेगा।

पूज्याधिकार : जिस प्रकार पात्राधिकार, प्रतिग्रहाधिकार का विचार किया गया उसी प्रकार पूज्याधिकार का विचार भी अपेक्षित है क्योंकि यदि वृषोत्सर्ग किया जायेगा तो द्विजदंपत्ति पूजन प्रकरण में पूजा की जायेगी। पूज्याधिकार नष्ट नहीं होता “येषु देशेषु ये द्विजाः” पूजन-अनुष्ठान-यज्ञ-कथा आदि में पूजा विहित है और इसका नाश नहीं होता। वृत्तिवश भी जो उपस्थित होते हैं वो पूज्याधिकारी होते हैं।

अचीर्णिव्रतवेदा ये विकर्मफलमाश्रिताः। ब्राह्मणा नाममात्रेण तेऽपि पूज्या युधिष्ठिर॥
महाभारत/आश्वमेधिकपर्व (१४)/९९/२८

अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥
मनु स्मृति/९/३१७

चूँकि पूज्याधिकार नष्ट ही नहीं होता इस कारण "द्विज-दंपत्ति पूजन" उचित सिद्ध होता है और उसे स्वीकार किया जा रहा है। केवल इतना अवश्य ध्यातव्य है कि जिस "द्विज-दंपत्ति" का पूजन किया जाये वो कम से कम वस्त्राभूषण से द्विज दिखें, क्षौरादि करके उपस्थित हों।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

श्राद्धदेश (स्थान)

श्राद्ध देश का तात्पर्य है कि श्राद्ध करने योग्य स्थल, तीर्थ आदि का विचार एवं निषिद्ध स्थान का ज्ञान। चूंकि हम षोडश श्राद्ध विषयक चर्चा करने जा रहे हैं तो इसमें भी अनेक विषय विचारणीय है : यथा स्वयं की भूमि में श्राद्ध करना, भूमि पर ही श्राद्ध करना, शांत स्थान में श्राद्ध करना, वृक्ष-जलाशयादि का विचार करना, गोपनीयता का ध्यान रखना आदि।

अन्य के भूमि-घर में श्राद्ध का निषेध है किन्तु वर्त्तमान काल में सबके पास श्राद्ध हेतु अपनी भूमि उपलब्ध नहीं है किन्तु किसी वंश-कुल के लिये सामूहिक रूप से भूमि निर्धारित किया जाता है। यहां विसंगति यह आ जाती है कि वो स्थान (निजी) जिस कुल के लोगों ने निर्धारित किया अन्यान्य कुल-जाति के व्यक्ति भी उसे अपने लिये उचित समझ लेते हैं, अभाव में तो किया जा सकता है किन्तु यदि अभाव न हो तो न ही करें।

अभाव में करने पर भूस्वामि पितरों के भाग का निर्धारण किया जाता है, किन्तु अब यह सामान्य व्यवस्था सी हो गयी है यदि अपनी भूमि पर भी करते हैं तो भूस्वामि भाग निर्धारित कर देते हैं। श्राद्धभूमि दक्षिणप्लव हो यह भी आवश्यक कहा गया है, किन्तु इसका तनिक भी विचार व्यवहार में करते नहीं मिलते, उत्तरप्लव (विपरीत) में भी करते दिखते हैं।

पुनः श्राद्ध के लिये भूमि पर ही हो यह ध्यान रखना भी आवश्यक है ताकि मंडल आदि किया जा सके। शांत स्थान का तात्पर्य है कि एकांत भी हो जो कि लोग भूलते जा रहे हैं अब प्रदर्शन का भाव बढ़ता जा रहा है और सड़कों के निकट जहां तनिक भी शांति नहीं होती श्राद्ध करते हैं। श्राद्ध हेतु जलाशय के निकट अनेकों वृक्षादि का वर्णन प्राप्त होता है। यहां यह भी पुनः ध्यान रखना आवश्यक है कि वृक्ष के मूल में तो चबूतरा बना दिया जाता है तो श्राद्ध चबूतरे पर न करके भूमि पर ही करें।

तीर्थादि में एकांतादि विषयक अन्यान्य नियमों का अभाव हो जाता है अर्थात विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।

तिलैः सर्षपैर्वा यातुधानान्विसर्जयेत्॥ संवृते च श्राद्धं कुर्यात्॥ न रजस्वलां पश्येत्॥ न श्वानं॥ न विड्वराहं॥ न ग्रामकुक्कुटं॥ प्रयत्नात्श्राद्धं अजस्य दर्शयेत्॥ अश्नीयुर्ब्राह्मणाश्च वाग्यताः॥ न वेष्टितशिरसः॥ न सोपानत्काः॥ न पीठोपहितपादाः॥ न हीनाङ्गा अधिकाङ्गाः श्राद्धं पश्येयुः॥ न शूद्राः॥ न पतिताः॥ न महारोगिणः ॥
विष्णुस्मृति/८१/४ – १८

श्राद्ध में गोपनीयता बहुत ही आवश्यक है और इस कारण भी एकांत स्थान होना चाहिये। बहुत सारे लोग तो मंडप बनाते भी नहीं और यदि बनाते भी हैं तो इतना संकीर्ण कि उसमें कठिनाई से सपिंडीकरण हो पाता है, मासिक श्राद्ध तो संभव ही नहीं होता अर्थात मंडप से बाहर ही किया जाता है। श्राद्धस्थला में भी म्लेच्छ, चाण्डाल, पतितादि का आगमन भी निषिद्ध है। श्वान-सूकर-काक-उलूक-कुक्कुट आदि का आगमन तो छोड़िये दृष्टि का भी निषेध है।

ऐसे में उतने भाग को साइडर आदि द्वारा घेरा जाना चाहिये क्योंकि श्राद्ध के पाक पर श्वान-सूकर-काक-उलूक- कुक्कुट-पतितादि की दृष्टि भी नहीं पड़नी चाहिये। इसी प्रकार एक नया दोष सोशल मीडिया पर प्रदर्शन का बढ़ता जा रहा है जो किसी भी प्रकार उचित नहीं है एवं गोपनीयता भंग करने वाला है; इस कारण इससे बचना चाहिये।

धातृबिल्ववटाऽश्वत्थ मुनि चैत्य गजान्विताः। श्राद्धं छायासु कर्तव्यं प्रसादादौ महावने॥ प्रजापति

गोमयेनानुलिप्ते तु दक्षिणाप्लवनस्थले। श्राद्धं समारभेद्भक्त्या गोष्ठे वा जलसन्निधौ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/८७

अटव्यः पर्व्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च । सर्व्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तेषु परिग्रहः ॥
तस्मात् श्राद्धानि देयानि पुण्येष्वायतनेषु च । नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ तु प्रयत्नतः ॥
उपह्वरनितम्बेषु तथा पर्वतसानुषु । गोमयेनोपलिप्तेषु विविक्तेषु गृहेषु च ॥

दक्षिणाप्रवणे देशे तीर्थादौ वा गृहेऽथवा । भूसंस्कारादिसंयुके श्राद्धं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥
गोगजाश्वादिपृष्ठेषु कृत्रिमायां तथा भुवि । न कुर्याच्छ्राद्धमेतेषु परक्यासु च भूमिषु ॥

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

श्राद्ध काल

श्राद्ध काल की बात करें तो इसमें दो प्रकार से विचार होता है एक तो विविध तिथि, नक्षत्र, ग्रहणादि अवसर संबंधी जिसकी चर्चा यहां नहीं करेंगे एवं द्वितीय श्राद्ध के दिन किस समय करें अर्थात दिन के किस भाग में करें।

अनेकानेक श्राद्धों के लिये अनेक विधान है जैसे नान्दी श्राद्ध के लिये पूर्वाह्न, एकोद्दिष्ट के लिये मध्याह्न, पार्वण के लिये अपराह्ण इस प्रकार से निर्धारण किया गया है। इसी विषय में कुतप काल को भी विशेष महत्व प्रदान किया गया है जो कि दिवस का अष्टम मुहूर्त होता है। इस विषय को समझने हेतु प्रथम तो दिन के भागों को जानना-समझना आवश्यक हो जाता है एवं यह अतिमहत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांशतः श्राद्ध में काल का उल्लंघन ही देखने को मिलता है।

मुहूर्तत्रितयं प्रातः तावानेव च सङ्गवः। मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्स्यादपराह्णोपि तादृशः ॥
सायाह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु सर्वकर्म बहिष्कृतः ॥

अह्नो मुहूर्ता विख्याता दशपञ्च च सर्वदा। तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतपस्मृतः ॥
प्रारभ्यकुरुते श्राद्धं कुर्यादारौहिणं बुधः। विधिज्ञोविधिमास्थाय रौहिणं न तु लङ्घयेत् ॥
ऊर्ध्वं मुहूर्तं कुतुपाद्यन्मुहूर्तचतुष्टयं। मुहूर्त पञ्चकं ह्येतत्स्वधाभवनमिष्यते ॥

आमश्राद्धं तु पूर्वाह्णे एकोद्दिष्टं तु मध्यमे। पार्वणंचापराह्णे तु प्रातर्वृद्धि निमित्तकं ॥

नान्दीमुख श्राद्ध के अतिरिक्त अन्यान्य श्राद्धों के लिये जो विधान है वो दिन के अष्टम मुहूर्त (कुतप) से लेकर अगले चार मुहूर्तों तक अर्थात बारहवें मुहूर्त तक के मुहूर्त पञ्चक को स्वधाभवन कहा गया है और दिन में कुल १५ मुहूर्त होते हैं अर्थात उसके पश्चात् के तीन मुहूर्त जो कि सायाह्न होते हैं उसका निषेध किया गया है एवं सूर्योदय से ७ मुहूर्त तक के भाग का भी निषेध है जिसमें विशेष रूप से प्रातः का निषेध है अर्थात ३ मुहूर्त तो पूर्णतः निषिद्ध है।

उसमें से भी एकोद्दिष्ट हेतु अष्टम कुतप और नवम रौहिण का ही विशेष महत्व है। इस प्रकार एकादशाह और द्वादशाह में जो षोडश श्राद्ध किया जाता है उसके उचित काल का निर्धारण करें तो इन बिंदुओं में स्पष्ट होता है :

  • एकादशाह को आद्य श्राद्ध (संशोधित आद्य श्राद्ध विधि – वाजसनेयी) अर्थात एकोद्दिष्ट होता है और एकोद्दिष्ट का उचित काल अष्टम और नवम मुहूर्त है, विशेष परिस्थिति में अथवा बिलम्ब होने पर द्वादश मुहूर्त तक किया जा सकता है।

  • द्वादशाह को १४/१५ मासिक (संशोधित अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि – वाजसनेयी) और सपिंडीकरण श्राद्ध (संशोधित अपात्रक सपिंडीकरण श्राद्ध विधि – वाजसनेयी) होते हैं जिसके लिये अधिकतम समय की आवश्यकता होगी अर्थात मुहूर्त पञ्चक को ग्रहण किया जायेगा। पांच मुहूर्त का तात्पर्य लगभग ४ घंटे होते हैं अर्थात ४ घंटों में ही होना चाहिये।

  • द्वादशाह हेतु ४ घंटा भी अल्प ही प्रतीत होता है किन्तु यह अल्पज्ञों की सोच है, तथापि इसमें सप्तम मुहूर्त को भी ग्रहण किया जा सकता है जिस कारण 48 मिनट लगभग और बढ़ जायेंगे अर्थात लगभग पौने पांच घंटे। इतने काल में भलीभांति द्वादशाह का श्राद्ध भी विधिवत संपन्न हो सकता है यदि मूर्ख व्यक्ति न करा रहा हो तो। लगभग एक-डेढ़ घंटे में मासिक श्राद्ध, आधे घंटे में स्नानादि व सपिण्डीव्यवस्थापन, पुनः लगभग २ घंटे में सपिण्डीकरण श्राद्ध।

प्रथम पक्ष तो यह है कि विहित काल से पूर्व कर्म किया ही नहीं जा सकता और द्वितीय पक्ष यह भी है कि विहित काल में ही कर्म करे, विशेष परिस्थिति (प्रमादादि) में आरम्भ तो करे ही करे फिर समापन आगे किया जा सकता है, विघ्नादि के कारण बिलम्ब होने पर विहित काल के पश्चात् भी कर्म किया जा सकता है किन्तु मतिपूर्वक विहित काल का परित्याग करना कर्म को निष्फल करना है। विहितकाल के पश्चात् किये जाने वाले कर्म को इसी भाव में निष्फल कहा गया है।

कालातीतं तु यत्कुर्याच्छ्राद्धं होमं जपं तथा। व्यर्थीभवति तत्सर्वं अमृते तु विषं यथा ॥
शातातप उद्धृत (स्मृतिचन्द्रिका श्राद्धकाण्ड)

एकादशाह को जो मध्याह्न में दान और सायाह्न में एकोद्दिष्ट करते हैं एवं द्वादशाह को विधिपूर्वक कहकर एक-एक मासिक करते हुये पूर्वाह्ण से सायाह्न और रात्रि पर्यन्त जो सपिण्डन करते हैं वो दोनों ही मतिपूर्वक विहित काल का परित्याग कहलायेगा न कि प्रमाद या विघ्न। क्योंकि यदि विहित काल में करना चाहें तो संभव है।

यहां अब व्यवहार की दो चुनौतियों को समझना अपेक्षित है वो यह कि एकादशाह के दिन आद्यश्राद्ध भी जहां एकोद्दिष्ट मात्र करना है वो लगभग सायाह्न में किया जाता है अर्थात निषिद्ध काल में किया जाता है। श्राद्ध के काल में मात्र उत्सर्गादि का आरम्भ किया जाता है जबकि उत्सर्ग पूर्व ही कर लेना चाहिये। एकादशाह का एकोद्दिष्ट मध्याह्न काल में ही होना विधिपूर्वक कहलायेगा, सायाह्न में होना नहीं। इसी प्रकार द्वादशाह को एक-एक करके १४/१५ मासिक श्राद्ध करना आवश्यक नहीं है और ऐसा करने से कलविधान का पालन नहीं होता अपितु पूर्वाह्ण में आरम्भ करके सायाह्न तक करते रहते हैं जो विधि का उल्लंघन है, विधि का पालन नहीं।

यदि विधिपूर्वक करना चाहें तो उचित काल में ही करना होगा और इस प्रकार एक-एक करके करना संभव नहीं अर्थात तंत्र से एक ही बार में सभी (१४/१५) मासिक श्राद्ध करे तदनंतर सपिण्डीकरण करे। एक-एक मासिक करके श्राद्ध करना अपण्डितों का विचार है, क्योंकि एक-एक मासिक करने पर ढेरों विधियों का उल्लंघन ही किया जाता है, जिसमें से एक तो यहां स्पष्ट हो गया है शेष आगे स्पष्ट होंगे।

सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः । पञ्चैतान्विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥
मनु स्मृति/३/१२६

क्रिया, देश, काल, शौच और ब्राह्मणसंपदा; इन पांचों का विस्तार करने से हनन हो जाता है। ये पांचों ही निर्धारित मात्रा से अधिक न करे। श्राद्ध में क्रिया और काल पूर्णतः निर्धारित हैं और इनका विस्तार करना अनुचित है। स्वधाभवन मुख्य काल है जिसका तात्पर्य ४ घंटा (लगभग) है और अधिकतम मध्याह्न व अपराह्न ग्रहण किया जा सकता है जिसका तात्पर्य ६ घंटा (लगभग) है।

अब यदि पूर्वाह्न से सायाह्न तक श्राद्ध करें तो काल का विस्तार होगा। एक-एक करके मासिक श्राद्ध करें तो क्रिया का विस्तार होगा क्योंकि सभी मासिक एक बार में ही होने चाहिये और क्रिया विस्तार होने से वह नाशक हो जाता है। एक-एक करके मासिक श्राद्ध करने से क्रिया का विस्तार तो होता है किन्तु क्रिया का लोप भी होता है जो नाश सिद्ध भी करता है एवं इसकी चर्चा कर चुके हैं।

विधिपूर्वक श्राद्ध करने के लिये कर्मकाल का निर्धारण भी अनिवार्य है और निर्धारित कर्मकाल में श्राद्ध संपन्न करना आवश्यक है तथापि प्रमादादिवश विलम्ब की भी मान्यता दी गयी है। किन्तु विलम्ब की मान्यता होने से विलम्ब होना तो प्रशस्त सिद्ध होता है किन्तु कर्मकाल से पूर्व आरम्भ करने की सिद्धि नहीं होती।

महामहोपाध्याय पंडित रुद्रधर झा स्पष्ट रूप से कहते हैं कि श्राद्ध निषेद्धेत्तर काल से भिन्न काल अर्थात पूर्वाह्ण और संध्या का त्याग करके श्राद्ध करे। मैं तो उस पूर्वाचार्य (बाप-दादा) की बात कर रहा हूँ जिसके वचन लिखित रूप में उपलब्ध हैं। तुम किस बाप-दादा की बात कर रहे हो कोई लिखित सिद्धि है कि निषिद्ध काल में श्राद्ध किया जा सकता है ?

महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र एक स्थान पर अपकृष्ट प्रेतषोडशी को अपात्रक सिद्ध करते हैं, निःसंदेह यहां रुद्रधरीय "श्राद्ध विवेक" में जो आद्य श्राद्ध सपात्रक है एवं मासिक अपात्रक है पुनः सपिंडीकरण में श्राद्धचतुष्टय तो अपात्रक किन्तु प्रेतश्राद्ध सपात्रक है इसको खंडित करते हैं एवं सम्पूर्ण प्रेतकर्म को अपात्रक विधि से ही करने का निष्कर्ष भी प्रदान करते हैं। यहां उन्होंने निष्कर्ष में यह कहा है कि -

अपात्रके च कर्मणि बहुतराङ्गहानिस्तस्मात्प्रेतषोडशी सपात्रकैव कार्या । एवमेव सोपान लिखनमपीति केचित । तत्रोच्यते - सोपनकृतो हि प्रभाकराः, ते तु स्वसिद्धान्तावष्टम्भेन निबद्धनन्तु नाम किन्तु तन्मतं मुनिवचनविरुद्धम् । तथाहि - एकाहे द्वादशाथवेति तावन्मुनिवाक्यम् । तच्चतुर्दशानां साग्निकानां तथा सपिण्डीकरणस्य च सपात्रकत्वे सर्वथा न घटते, नह्येतावान् श्राद्धप्रयोगराशिः सपात्रको रोहिणसमाप्तिपर्यन्तेन केनापि कर्तुं शक्यते तस्मात्तत्रापात्रकत्वे सर्वत्रापात्रकतैवास्तु नत्वाद्यश्राद्ध सपात्रकत्वमन्यत्रापात्रकत्वमित्वर्द्ध जरती युज्यत इति । - महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र

वाचस्पति मिश्र ने उस काल में सग्निकों हेतु सपात्रक विधि को सर्वथा अस्वीकार किया इस तर्क के साथ कि ऐसा घटित ही नहीं हो सकता। यदि एक दिन में रौहिण पर्यन्त १४ मासिक और सपिंडीकरण रौहिण पर्यन्त सपात्रक विधि से घटित नहीं हो सकता अपात्रक ही किया जा सकता है (ध्यातव्य यह है कि तंत्र से मासिक करने पर भी सपात्रक विधि से नहीं हो सकता) और इसी आधार पर अपकृष्ट श्राद्ध विधि में अपात्रक ही किया जा सकेगा।

इस तथ्य का भी खंडन करते हैं कि आद्य श्राद्ध सपात्रक करके शेष मासिक अपात्रक करे इसमें उन्होंने आद्य को भी अपात्रक विधि से ही एकरूपता स्थापित करने का पक्ष लिया। आज मैं भी उन्हीं का अनुकरण करते हुये कहता हूँ कि "द्वादशाह को विहित काल में अथवा निषिद्ध काल से भिन्न काल में (पूर्वाह्ण और सायाह्न का त्याग करके) यदि किया जाय तो किसी के नाना भी एक-एक करके नहीं करा सकते क्योंकि संभव नहीं है। यदि कोई निषिद्धवेला का त्याग करते हुये विधि-मंत्रादि का त्याग किये बिना एक-एक मासिक व सपिण्डीकरण श्राद्ध करा सकता है तो करने और कराने वाला दोनों ही निश्चितरूपेण मनुष्य नहीं होगा।

यदि कर्त्ता स्वयं ही पंडित हो अर्थात स्वयं ही करे और अभ्यस्त भी हो तो उसे एक मासिक में विधिपूर्वक मंत्रादि का लोप किये बिना करने पर न्यूनतम २० मिनट लगेगा। इस प्रकार भी लगभग ५ घंटे से अधिक लगेंगे यदि हस्त-पाद प्रक्षालन पूर्वक करे तो। फिर स्नान करके सपिंडीकरण कब करेगा निषिद्धवेला में ही करेगा न ! इस कारण यदि निषिद्धवेला का त्याग यदि करना चाहे तो तंत्र से ही मासिक श्राद्ध किया जा सकता है। मैं उन लोगों की बात नहीं कर रहा हूँ जो विधि और मंत्रों का लोप करके १५ मिनट या उससे भी कम में एक मासिक करा देते हैं और तीसमारखाँ होने का डंका पीटते हैं।

श्राद्धकाल विचार में ही एक और मुख्य विषय आगे की क्रियाओं का काल से भी संबंधित है जैसे प्रांगण कृत्य, भोजन आदि। आगे की जो क्रियायें होती हैं वो भी दिन में ही कहे गए हैं।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

श्राद्ध का अधिकार

यदि अधिकार की बात करें तो इसमें भी दो विषय समाहित हैं प्रथम तो मृतक के श्राद्ध का अधिकारी अर्थात जिसे करना चाहिये और द्वितीय यह कि जो श्राद्ध करना चाहे उसे श्राद्ध का अधिकार अर्थात कर्माधिकार है अथवा नहीं ? कर्माधिकार संबंधी चर्चा तो पीछे अनेकों आलेखों में कर चुके हैं यहां श्राद्ध के अधिकारी को ही संक्षेप में समझते हैं।

पुत्त्रः पौत्त्रः प्रपौत्त्रो वा भ्राता वा भ्रातृसन्ततिः। सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रियार्हा नृप जायते॥
तेषामभावे सर्व्वेषां समानोदकसन्ततिः। मातृपक्षस्य पिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा॥
कुलद्वयेऽपि चोत्सन्ने स्त्रीभिः कार्य्या क्रिया नृप। संघातान्तर्गतैर्व्वापि कार्य्याः प्रेतस्य याः क्रियाः॥
पितृमातृसपिण्डैस्तु समानसलिलैस्तथा। संघातान्तर्गतैश्चैव राज्ञा वा धनहारिणा॥
पूर्व्वाः क्रियास्तु कर्त्तव्याः पुत्त्राद्यैरेव चोत्तराः। दौहित्रैर्व्वा नरश्रेष्ठ कार्य्यास्तत्तनयैस्तथा ॥

पुत्रः पौत्रश्च तज्जश्च पुत्रिकापुत्र एव च। पत्नी भ्राता च तज्जश्च पिता माता स्नुषा तथा ॥
भगिनी भागिनेयश्च सपिण्डो धनहार्यपि। पूर्वपूर्वविनाशे स्युरुत्तरोत्तर पिंडदाः ॥

यहां एक अधिकारी के विषय में एक तथ्य को ही स्पष्ट करना अधिक महत्वपूर्ण है और वो है दौहित्र एवं भ्राता अथवा भ्रातृज्य के मध्य का अधिकार संबंधी विवाद। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि के होने पर तो जो जीवित हो उसीका उत्तरोत्तर अधिकार होता है। किन्तु इनका अभाव होने पर दौहित्र व भ्राता-भ्रातृज्य, सपिण्ड, सगोत्र आदि का उत्तरोत्तर अधिकार संबंधि विवाद उत्पन्न होता है। उक्त विषय में पुत्रिकापुत्र (दौहित्र) पूर्वाधिकारी होता है, तदन्तर भ्राता-भ्रातृज्य आदि का अधिकार होता है।

औरसः क्षेत्रजश्चैव पुत्रिकापुत्र एव च । कानीनश्च सहोढश्च गूढोत्पन्नस्तथैव च ॥
पौनर्भवोऽपविद्धश्च लब्धः क्रीतः कृतस्तथा । स्वयं चोपगतः पुत्रा द्वादशैते उदाहृताः ॥
तेषां षड्बन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः । पूर्वः पूर्वः स्मृतः श्रेयाज्जघन्यो यो य उत्तरः ॥
क्रमाद्ध्येते प्रपद्येरन्मृते पितरि तद्धनम् । ज्यायसो ज्यायसोऽभावे जघन्यस्तदवाप्नुयात् ॥
पुत्राभावे तु दुहिता तुल्यसंतानदर्शनात् । पुत्रश्च दुहिता चोक्तौ पितुः संतानकारकौ ॥
अभावे तु दुहितॄणां सकुल्या बान्धवास्ततः । ततः सजात्याः सर्वेषां अभावे राजगामि तत् ॥
नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/दायभागः(१३)/४३ – ४८

उपरोक्त के अभाव में भी बहन, भागिनेय का अधिकार प्रथम होता है और सपिण्ड का उत्तर और उसके अभाव में भी धनहारी का अधिकार होता है।

श्राद्धाधिकार के विषय में एक महत्वपूर्ण विषय यह भी है कि पुत्र यदि असंस्कृत हो किन्तु ३ वर्ष से अधिक आयु हो तो असंकृत होने पर भी पुत्र को श्रद्धाधिकार प्राप्त है एवं विविपूर्वक विवाहिता से उत्पन्न दौहित्र को भी असंस्कृत होने पर भी श्राद्धाधिकार है। इसके अतिरिक्त अन्य हेतु अधिकार नहीं है अर्थात इनसे इतर का श्राद्धाधिकार होते हुये संस्कृत होना भी अनिवार्य है, असंस्कृत होने पर अर्ह नहीं अर्थात उत्तरोत्तर विचार करते हुये जो संस्कृत हो वह श्राद्धाधिकारी होगा।

नाभिव्याहारयेद्ब्रह्म यावन्मौञ्जी निबध्यते । मन्त्राननुपनीतोऽपि पठेदेवैक औरसः ॥
अनुपेतोऽपि कुर्वीत मन्त्रवत्पैतृमेधिकम् । यद्यसौ कृतचूडः स्याद्यदि स्याच्च त्रिवत्सरः ॥
सुमंतु

पित्रोरनुपनीतोऽपि विदध्यादौरसः सुतः । और्ध्वदेहिकमन्ये तु संस्कृताः श्राद्धकारिणः॥ – स्कंदपुराण
श्राद्धं कुर्य्यादवश्यं तु प्रमीतपितृकोद्विजः । व्रतस्थो वाऽव्रतस्थो वा एकएव भवेद्यदि ॥ – वृद्धमनु

वर्त्तमान काल में श्राद्धाधिकार संबंधी व्यवहार प्रमाणविरुद्ध देखने को मिल रहा है जिसमें असंस्कृत निषेध वचन का उल्लंघन होता है अर्थात पुत्रेत्तर/दौहित्रेत्तर असंस्कृत व्यक्ति से भी दाह, श्राद्ध कराया जा रहा है। इस शास्त्रविरुद्ध व्यवहार को कर्मकांडियों की अल्पज्ञता ही कहा जा सकता है, अन्यथा शास्त्रविरुद्ध सिद्ध होगा। इस विषय पर भी गंभीरता पूर्वक चिंतन करने की आवश्यकता है।

श्राद्धाधिकारी होने के जो वचन हैं उसमें संस्कृत होना अनिवार्य शर्त की भांति स्वीकारना होगा अर्थात यदि प्रथम अधिकारी असंस्कृत है तो वह अधिकारी होते हुये भी अनर्ह है और द्वितीय अधिकारी का विचार करना चाहिये। इस अर्ह नियम में औरस पुत्र और दौहित्र अपवाद है अर्थात वह असंस्कृत होने पर भी श्राद्धाधिकारी होगा।

तदुपरांत इस विषय में एक अन्य तथ्य भी प्रकट होता है कि असंस्कृत व्यक्ति (पुत्रेत्तर) जो भी होता है वह जीवितपितृक होता है और जीवितपितृक भी श्राद्ध का अनधिकारी होता है। इसके कुछ अपवाद भी हैं –

  • माता, मातामह, मातामही के मृत्यु होने पर मृतक श्राद्ध में असंस्कृत होने व जीवितपितृक होने पर भी अधिकार होता है, किन्तु पितामह में अधिकार नहीं होता।

  • स्वयं के द्वितीय विवाह, पुत्र के जातकर्म, उपनयनादि में; पिता जिसको पिण्ड देने का अधिकारी होता है उसके लिये जीवितपितृक को भी पिंडरहित/आमान्न (वृद्धिश्राद्ध) का अधिकार होता है।

  • यदि पिता सन्यासी, उन्मत्त, पतित, मूक-बधिरादि हो तो पितामहादि के श्राद्ध में जीवितपितृक पौत्र का भी अधिकार होता है।

  • असंस्कृत और कनिष्ठ भ्राता को कन्यादान का अधिकार नहीं होता अर्थात नहीं कर सकता किन्तु कोई अन्य व्यक्ति भी यदि कन्यादान करे तो भी वृद्धिश्राद्ध का अधिकार कनिष्ठ और असंस्कृत हो तो भी भ्राता को ही होता है यदि वह ३ वर्ष से अधिक का हो। अन्य कोई भी व्यक्ति उसके श्राद्धाधिकार का हरण नहीं कर सकता यदि उसका पिता मृत है और उसकी आयु ३ वर्ष से अधिक है।

अनुपनीत ब्राह्मण कर्त्ता हेतु पिण्ड द्रव्य

अनुपनीत कर्त्ता के विषय में मुख्य रूप से ४ प्रश्न आते हैं :

  1. वेद पाठ कर सकता है अथवा नहीं?

  2. वेद श्रवण कर सकता है अथवा नहीं?

  3. स्वधा प्रयोग कर सकता है अथवा नहीं?

  4. सिद्धान्न प्रयोग कर सकता है अथवा नहीं?

इस विषय का यहां प्रामाणिक उत्तर नहीं दिया जायेगा किन्तु प्रामाणिक उत्तर जो जानना चाहें उनके लिये आलेख प्रकाशित है और उसका लिंक यहां दिया जा रहा है : असंस्कृत कर्त्ता के लिये पिण्ड द्रव्य - https://karmkandvidhi.in/pind-ke-dravya/

प्रथम उत्तर : अनुपनीत वेदमंत्र प्रयोग का अधिकारी नहीं होता ।

द्वितीय उत्तर : “त्रयी न श्रुतिगोचराः” से स्त्री हेतु भी स्वतंत्र रूप से निषिद्ध है, पतिसंयोग में नहीं। शूद्र के लिये भी श्मशान, सभा, राजकीयोत्वत्सवादि में छूट है, द्विजबंधू जब तक रहे तभी तक। अनुपनीत द्विजाति के लिये निषिद्ध नहीं है। अनेकानेक संस्कार, शांतिकादि कर्म किया जाता है जिसमें वह श्रुतिगोचर सिद्ध होता है। अर्थात द्विजाति का अनुपनीत बालक भी श्रवणाधिकार रखता है। और स्पष्ट प्रमाण भी है कि मंत्र कोई अन्य पढ़े अर्थत वह केवल श्रवण करेगा।

तृतीय उत्तर : स्वधा प्रयोग का स्पष्ट प्रमाण है कि असंस्कृत द्विज बालक पितृकर्म में प्रयोग कर सकता है।

चतुर्थ उत्तर : सिद्धान्न प्रयोग तो उपरोक्त प्रश्नों से गौण महत्व रखता है, जब उपरोक्त अधिकार वैकल्पिक रूप से प्राप्त हो रहे हैं और "जन्मना जायते शूद्रः" का तात्पर्य मात्र मंत्रप्रयोग (अध्ययन, पाठ, जप) में उपनीत होकर ही अधिकारी बनता है इस भाव से है, अनुपनीत शूद्रवत मंत्रप्रयोग का अनधिकारी होता है किन्तु श्रवण में नहीं। ब्राह्मण का अनुपनीत बालक भी सम्मान का ही अधिकारी होता है "जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः" जन्म से ब्राह्मण ही होता है शूद्र नहीं। यही भाव अन्य द्विजाति हेतु भी ग्राह्य होगा। यदि "जन्मना जायते शूद्रः" मात्र से निषेध किया जाय तो "जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः" का क्या होगा ? अर्थात इससे निर्णय होगा ही नहीं और यदि इससे ही निर्णय करना हो तो "जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः" पक्ष ही प्रबल है। जैसे शूद्र हेतु सदैव आम ही कहा गया है और द्विजाति हेतु विकल्प कहा गया है एवं मासिकादि - सपिण्डन पर्यन्त तो निषेध ही किया गया है, यदि यह निषेध अनुपनीतों के लिये मान्य न हो तो इसको पृथक करके आज्ञा होनी चाहिये अथवा स्वतंत्र रूप से निषेध वचन होना चाहिये। न ही नियम में अपवाद कहा गया है और न ही स्वतंत्र रूप से निषेध किया गया है अस्तु सामान्य नियम ही मान्य होगा अर्थात सिद्धान्न का अधिकारी होगा।

इसी विषय को तार्किक रूप से इस प्रकार समझाया जायेगा कि यदि आप "जन्मना जायते शूद्रः" ग्रहण करेंगे तो क्या उसका सिद्धान्न ग्रहण करेंगे अथवा नहीं, अपने बालक का (स्पर्श किया हुआ) ग्रहण करेंगे अथवा नहीं। यदि द्विजाति अनुपनीत स्पर्श किये सिद्धान्न को ग्रहण कर सकते हैं तो उसे सिद्धान्न का अधिकार है। सिद्धान्न की मुख्य आवश्यकता क्या है ? पिण्ड अथवा ब्राह्मण भोजन ?

सिद्धान्न का मुख्य प्रयोजन ब्राह्मण भोजन ही है, पिण्डरहित श्राद्ध में भी ब्राह्मण भोजन होगा और प्रश्न का तार्किक रूप से इसी प्रकार विचार किया जा सकता है कि यदि ब्राह्मण हेतु कर्त्ता का सिद्धान्न निषिद्ध न हो तो सिद्धान्न प्रयोग होगा एवं आपात में; अभाव में अथवा विशेष रूप से वर्णित श्राद्ध में ही आम प्रयोग होगा। द्विजाति में भी सिद्धान्न तो केवल ब्राह्मण बालक का ही ग्राह्य होगा, अन्य उपनीत हों तो भी ग्राह्य नहीं होगा अस्तु द्विजाति में भी ब्राह्मणेत्तर हेतु पायस प्रमुख होगा। जल और दुग्ध के भेद से भात एवं पायस में अन्तर होता है अथवा कहीं न कहीं खोआ भी पायस भाव ही ग्रहण करता है ।

इस प्रकार ब्राह्मण हेतु सिद्धान्न अग्राह्य होने पर आम होगा और पिण्ड द्रव्य में अन्य विकल्प ग्रहण किया जायेगा जैसे : सक्तु, पिष्ट, पायस आदि। वो इस कारण कि सिद्धान्न अग्राह्य होने पर पाक ही नहीं होगा आम अथवा हेम होगा। यदि पाक (पायस) होगा भी तो घर में ही बनेगा और ये शूद्र (पिण्ड द्रव्य) के लिये भी प्रशस्त है। किन्तु ब्राह्मण के असंस्कृत बालक का सिद्धान्न ब्राह्मण हेतु अग्राह्य नहीं है इस कारण असंस्कृत ब्राह्मण कर्ता भी षोडश श्राद्ध में सिद्धान्न प्रयोग करने का अधिकार रखते हैं किन्तु यह मात्र पितृकर्म हेतु है। हवन-यज्ञ में हविष्याधिकार की सिद्धि नहीं होती।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

श्राद्धकर्ता के लिये नियम

यद्यपि श्राद्धकर्ता हेतु ही नहीं श्राद्धभोक्ता हेतु भी ढेरों नियम कहे गए हैं किन्तु यहां हम श्राद्धकर्त्ता हेतु कुछ महत्वपूर्ण नियमों को समझने का प्रयास करेंगे :

श्राद्धकर्त्ता और भोक्ता दोनों के लिये ही कुछ विशेष निषेध प्राप्त होता है : पुनर्भोजन अर्थात दुबारा भोजन करना और यह दोष ब्राह्मणों में अधिक देखने को मिलता है एक बार ब्राह्मण भोजन में सम्मिलत हो जाते हैं और दूसरी बार पुनः घर में बना विशेष भोजन करते हैं। यान पर चढ़ना, यात्रा करना, भार वहन करना और परिश्रम करना, कलह करना, मैथुन, हिंसा, दिन में शयन आदि।

पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्। श्राद्धकृच्छ्राद्धभुग्यो वा सर्वमेतद्विवर्जयेत्।
स्वाध्यायं कलहं चैव दिवास्वापं च सर्वदा ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/११९-१२०

श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों का यथान्याय पूजन सत्कार न करना भी पाप कहा गया है। ब्राह्मणों के साथ अन्यान्य व्यक्तियों को भोजन कराना ब्राह्मण की अवज्ञा है और ऐसे पाप हेतु अतिकृच्छ्र प्रायश्चित्त भी कहा गया है। ब्राह्मणों के साथ यदि हम किसी अन्य को भोजन कराते हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणभोजन का महत्व नहीं समझते और अवज्ञा कर रहे हैं।

श्राद्ध कर्ता हेतु जो सबसे बड़ा तथ्य भोजन विषय है और विसंगति देखने को मिलती है वो यह कि अपात्रक श्राद्ध होने के कारण ब्राह्मण भोजन श्राद्ध के पश्चात् होता है एवं घर में कलश पूजन के पश्चात् पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण का। तो वहां पर श्राद्ध कर्ता और नापित-मालाकार आदि भी ब्राह्मण के साथ ही भोजन करते हैं जो अनुचित है कई स्थानों पर कुछ पुजारी-महंथ आदि को भी ब्राह्मण के साथ भोजन कराया जाता है और यह भी अनुचित है। श्राद्धकर्त्ता तो ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें विदा करके तब भोजन करेगा ऐसा स्पष्ट विधान है न कि ब्राह्मण के साथ।

इसी कड़ी में ब्राह्मण भोजन में ब्राह्मणों में भी अपांक्तेय की व्यवस्था है कि जो ब्राह्मण नीचकर्मा, पापाचारी आदि हो वह अपांक्तेय होता है अर्थात भोजन कराने का अधिकारी नहीं होता और यदि कराया भी जाय तो मुख्य ब्राह्मण भोजन में न कराकर पृथक से कराये। फिर यहां नापित-मालाकार आदि को ब्राह्मण के साथ भोजन कराना शास्त्राज्ञा का उल्लंघन है। घर में शूद्रों को भोजन कराने का ही निषेध है उसमें भी ब्राह्मण के साथ निसंदेह दोषदायक है।

रही बात कुछ पुजारी-महंथ आदि को भोजन कराने की तो ये संत-साधु आदि की श्रेणी में आते हैं और ब्राह्मणभोजन में इनके भोजन की गणना नहीं होती है। यद्यपि इनके भोजन का भी महत्व है किन्तु ब्राह्मणभोजन में सम्मिलित नहीं किये जा सकते। इसी प्रकार नाती, भांजे, जामाता, बहनोई आदि। इनमें दौहित्र (नाती) का विशेष महत्व है विशेषरूप से श्राद्ध में किन्तु स्वतंत्र रूप से है और इनके साथ श्राद्धकर्त्ता भोजन करेगा न कि ब्राह्मणों के साथ इन सबका भोजन होगा। कुल मिलाकर ब्राह्मणभोजन में केवल और केवल ब्राह्मणों का ही भोजन हो सकता है।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

द्रव्य और शुद्धि

द्रव्यशुद्धि कहने से दो भाव प्रकट होते हैं एक तो धन जो प्रयुक्त होगा उसकी शुद्धि और द्वितीय श्राद्ध में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों की शुद्धि और दोनों ही महत्वपूर्ण है। किसी भी धर्माचरण में द्रव्यशुद्धि अनिवार्य है अर्थात न्यायोपार्जित धन से ही धर्मकृत्य करे यह आवश्यक है। एवं इसके साथ ही किसी भी धर्मकृत्य में प्रयुक्त होने वाली सामग्री भी शुद्ध हो यह भी अनिवार्य है।

द्रव्य शुद्धि में जो भी द्रव्य प्रयोग किये जाते हैं सबकी शुद्धि आती है और शुद्धि का तात्पर्य मात्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शुद्धि नहीं है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शुद्धि मात्र को पर्याप्त माना जाय तो पिण्ड हेतु जिस भात की आवश्यकता होती है वह कर्त्ता/पाचक को स्वयं बनाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। भात ही चाहिये न होटल से भी मंगाया जा सकता है जैसे दही-घी आदि मंगाते हैं। भात ही नहीं दूध, दही, घी आदि भी डेयरी आदि से क्रय किया हुआ नहीं होना चाहिये अपितु शुद्ध है यह परीक्षित होना चाहिये। यदि घर का दूध है तो घी भी घर का ही हो, दूध घर का नहीं है तो भी दही घर में ही जमाना चाहिये।

वर्त्तमान में तो बेंती आदि का निर्माण भी हलवाई से कराया जाने लगा है जो अनुचित है। भात में तो चाण्डाल, श्वान आदि की दृष्टि भी नहीं पड़नी चाहिये। इसी प्रकार द्रव्यशुद्धि में शास्त्रान्वेषण करके उसका पालन करना चाहिये।

जब हम धर्माचरण की बात करते हैं तो इसमें जो शुद्धि विधान है वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कई गुणा अधिक सूक्ष्म है। यदि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करने लगें तो उसका ह्रास हो जायेगा। यह चर्चा इस लिये आवश्यक है क्योंकि वर्त्तमान काल में वैज्ञानिकता का एक अंधकारमय आवरण चढ़ाया जा रहा है। ध्यान रखें धर्म और धर्माचरण, कर्मकांड आदि का निर्णय शास्त्र से होता है साइंस से नहीं। इसलिये द्रव्य, शुद्धि आदि विषयों में तो रत्तीभर भी वैज्ञानिक सोच का स्थान नहीं है क्योंकि ये उसका विषय ही नहीं है।

सोचिये वैज्ञानिक सोच के अनुसार बोतल का पानी सही है किन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से नदी, तालाब, कुंआ आदि का जल शुद्ध है न कि बोतल का। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ब्रांडेड कंपनियों के घी, तेल, मधु आदि शुद्ध हैं किन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से अशुद्ध हैं।

श्राद्ध में पूड़ी-मिठाई आदि (गन्धादि) में प्रयोग करना अनुचित है उसमें शुद्धि विधान का पालन नहीं किया जाता है। डेयरी के दूध-दही-घृत आदि भी निषिद्ध हैं। दान की सभी वस्तुयें उपयोगी और टिकाऊ हो इसका विशेष परिक्षण करके ही दान करे क्योंकि कई बार ऐसे लाईट भी देखने को मिलते हैं जो जलाते समय ही टूट जाते हैं या छाता खोलते समय ही टूट जाता है। पुस्तक में वेद-पुराण आदि सामर्थ्यानुसार करे न कि ऐसी पुस्तक जिसको कभी खोलकर पढ़ा ही न जाये।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

पञ्चगव्य के तीन प्रयोग

पञ्चगव्य निर्माण, प्राशन, प्रोक्षण आदि भी करे। पंचगव्य निर्माण होने पर उसके तीन प्रयोग होते हैं - प्राशन, प्रोक्षण (उपलेपन) और स्नान। किन्तु किसे पंचगव्य प्रदान करना है किसे नहीं यह विवेक ब्राह्मण को होना चाहिये। कुछ लोगों के मन में ऐसा भाव भी आता है कि श्राद्ध की पद्धति में ऐसा यदि नहीं लिखा है तो नहीं होगा और पंचगव्य प्राशन पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं, निस्संदेह यह शास्त्रज्ञान का अभाव ही है।

आज के समय में ऐसा कौन है जो धर्माचरण से युक्त है और पापरत नहीं है, अर्थात सबके लिये किसी भी कर्म में प्रवृत्त होने से पूर्व पाप का निवारण करके कर्माधिकार प्राप्ति अनिवार्य है। एकादशाह करने के पश्चात् द्वादशाह के आरम्भ होने से पूर्व भी ढेरों पाप हो जाता है। कर्म में ही कई बार ब्राह्मणाज्ञा का उल्लंघन, ब्राह्मण से बकवास आदि तक भी कर लेता है, यह भी पाप ही है।

स्वयं यदि पूर्ण संयमित रहे तो भी संसर्ग का क्या करेगा भीड़ ही तो जुटाते हैं और उसमें मद्यपों (महापापी) की बड़ी संख्या होती है उससे संसर्ग करते हैं तो पांचवां महापाप महापापियों से संसर्ग से ही उत्पन्न होता है। यह संकेत आवश्यक था क्योंकि दम्भियों को तो प्रकाशित पद्धति से अधिक का ज्ञान ही नहीं होता और यदि प्रकाशित पुस्तक के अनुसार स्वयं भी कुछ नहीं करते, मात्र किसी और के लिये पुस्तक में कहां लिखा है प्रश्न करते हैं।

पञ्चगव्य प्रयोग में सावधानी : कुछ भी कहा जाय और उसके विषय में सावधान न किया जाय तो समस्या ही उत्पन्न होती है। वर्त्तमान समय में कोई भी ऐसा व्यक्ति मिलना कठिन है जो एक दिन भी पाप किये बिना बिता सके अर्थात पापकर्म से विरक्त हो। दुर्दशा यह है कि धर्म करने चलते हैं और वहां भी पाप करके आते हैं, दोष लेकर आते हैं। श्राद्ध में ही जितने भी सम्मिलित होते हैं चाहे वो कराने वाले हों अथवा करने वाले क्या कोई कह सकता है कि मैं शास्त्र का पालन करते हुये करता या कराता हूँ। यदि आपके मन में ऐसा विचार आये तो आगे प्रामाणिक तथ्यों से श्राद्ध विधि स्पष्ट है स्वयं विचार कर सकते हैं। इस अवस्था में पञ्चगव्य प्रयोग का भी भार ब्राह्मणों के ऊपर ही आ जायेगा। कदापि नहीं कर सकते, केवल यजमान को निर्देश देंगे, यजमान बनाने के लिये कह दे तो उसका दोष समाप्त नहीं होगा उसने और दोष कर लिया।

समंत्र पञ्चगव्य निर्माण होगा या नहीं ये भी ब्राह्मण ही निर्णय करेंगे, यजमान यह भी नहीं कह सकता है मैं निर्माण कर लेता हूँ आप मन्त्र पढ़ दीजिये। अधिकारी यजमान मन्त्र ज्ञात होने पर भी ब्राह्मण से अनुमति लेकर निर्माण करेगा एवं अनधिकारी यजमान ब्राह्मण को ही निर्मित करने का निर्देश देगा। अनधिकारियों के लिये मन्त्रप्रयोग का निषेध है एवं ये अनधिकारी लक्षण शास्त्रीय व व्यवहार दोनों के सम्मिश्रण पर आधारित है। शूद्र-स्त्री आदि के लिये पंचगव्य का निषेध किया गया है और कहीं-कहीं अमंत्रक प्रयोग कहा गया है।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

पात्र विचार

पात्र विचार में भी दो विषय होते हैं एक तो द्रव्यों का पात्र जिसमें मुख्य रूप से अर्घ्यपात्र आता है एवं द्वितीय महापात्र (ब्राह्मण) संबंधी विचार। इस विषय को भी सामान्य नहीं समझा जाना चाहिये क्योंकि अर्घ्यपात्र विषयक चर्चा भी विस्तृत है एवं ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण (पात्र) विषयक चर्चा भी बहुत ही विस्तृत है। अर्घ्य पात्र हेतु तो सामान्यतः पत्रों का ही प्रयोग सामान्यजनों के लिये उचित है जिसमें ढेरों पत्रों का प्रयोग कहा गया है और विहित पत्रों में से किसी भी पत्र का प्रयोग जिस क्षेत्र में किया जाता है वही उपर्युक्त है किन्तु यहां एक अन्य तथ्य भी है वो है अतिलघु भोजन पात्र, लोहे अथवा प्लास्टिक आदि के गिलास का प्रयोग, जलपात्र में अताम्र पात्र आदि का प्रयोग। इनसे बचना चाहिये :

  • भोजन पात्र अत्यंत लघु न हो कि उसपर श्राद्ध की क्रियायें भी सही से न की जा सके, किञ्चित अन्न परोसने पर भी गिर जाये।

  • यदि दुग्धधारा आदि भी प्रदान कर रहे हैं तो उसमें भी विहित पत्रों का ही प्रयोग करें न कि लोहे-प्लास्टिक आदि के गिलास का।

  • आचमन आदि के लिये जिस जलपात्र का प्रयोग करते हैं वह ताम्र का ही प्रशस्त होता है।

  • परिवेषण में एक-हाथ से परोसना भी निषिद्ध है एवं घृत-व्यंजनादि का हाथ से परोसना भी निषिद्ध है।

  • अन्न (पाक का अन्न) उष्ण होना अनिवार्य कहा गया है।

यथा वातबलो वह्निर्दहत्त्यार्द्रानपि द्रुमान् । तथा दहति वेदाग्निः कर्मजं दोषमात्मनः॥
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्भुञ्जानोऽपि यत्तस्ततः । ऋग्वेदं धारयन्विप्रो नैनः प्राप्नोति किंचन ॥
न वेदबलमाश्रित्य पापकर्मरतिर्भवेत् । अज्ञानाच्च प्रमादाच्च दह्यते कर्म नेतरत् ॥
वशिष्ठ स्मृति २७/२ – ४

इसी प्रकार यदि ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण (पात्र) का विचार करें तो उसके लिये पृथक से प्रमाणों का संग्रह किया गया है। वर्त्तमान काल में पात्र की अनुपलब्धता के कारण ही अपात्रक श्राद्ध किया जाता है किन्तु जो उपस्थित होते हैं उनको भी अयोग्यता की सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते देखा जाता है यथा : तिलकविहीनता, म्लेच्छ स्वरूप (वस्त्रादि से), शिखा विहीनता, सेवकत्व की प्रवृत्ति, मन्त्र पाठ में अक्षमता, लोभाधिक्यता आदि।

एकादशाह के दिन सायाह्न में एकोद्दिष्ट होने का एक कारण यह भी है कि मतिपूर्वक विलम्ब किया जाता है जिससे सायंकाल अथवा रात्रि में भोजन करें, यदि मध्याह्न में ही एकोद्दिष्ट हो जाये तो उसी समय भोजन भी करना होगा और पुनर्भोजन निषिद्ध होने से क्षुधाबाधा न हो। पात्र में सेवकत्व की प्रवृत्ति ही यजमान को प्रसन्न करने वाली होती है जबकि पात्र पूज्य होते हैं, स्थिति तो यहां तक हो गयी है कि बहुत जगह यजमान का आसन भी पात्र ही लगाते दिखते हैं। लोभाधिक्यता का ही दुष्परिणाम है कि श्राद्ध में प्रयुक्त सामग्री अग्राह्यों को भी प्राप्त होता है अर्थात प्रत्यक्ष हानि भी होती है।

श्राद्ध में प्रेत का सम्पूर्ण भाग पात्र (महापात्र) का होता है अर्थात आद्यश्राद्ध से लेकर मासिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण में प्रेतश्राद्ध तक का और विश्वेदेव व त्रिक (पितरों) का भाग पुरोहित का होता है। किन्तु विवाद ऐसा होता है कि बंदरबांट किया जाता है एवं यह नापित-मालाकार आदि भी हड़प लेता है जो अशास्त्रीय है। इस बंदरबांट को तो सभी समस्या समझते हैं किन्तु स्वभाग का ज्ञान न होने से विवाद भी स्वयं ही करते हैं।

पुरोहित को प्रेतभाग नहीं ग्रहण करना चाहिये किन्तु ग्रहण करते हैं यही विवाद का कारण है, यदि पुरोहित विवाद करते हैं तो नापित-मालाकार आदि भी साथ में आ जाता है और वह भी अनधिकृत रूप से एक बड़ा भाग ले जाता है जिसकी पूर्ति हेतु पुनः पंचदेवता, विष्णु, तर्पण आदि में एकोद्दिष्ट की भांति ही सामग्री प्रयुक्त किया जाने लगा है जिससे की क्षतिपूर्ति हो जाये। इस भाग को इस प्रकार समझा जाना चाहिये :

  • पात्र (महापात्र) का भाग : आद्यश्राद्ध, मासिक श्राद्ध, सपिण्डीकरण में प्रेतश्राद्ध का भाग व सपिंडीकरण के पश्चात् में कथावाचक हेतु किया जाने वाला दान।

  • पुरोहित : विश्वेदेव और पितर (त्रिक) का भाग व आद्यश्राद्ध में प्रेतोद्देशित दान।

  • नापित व मालाकार : कर्त्ता का धारण किया वस्त्रादि। इसके अतिरिक्त पारिश्रमिक ग्रहण करते ही हैं, श्राद्ध में किसी भी सामग्री अथवा दान सामग्री पर नापित, मालाकार का कोई भी अधिकार नहीं होता है। यदि यजमान देना चाहे तो बिना मंत्रप्रयोग के, बिना उत्सर्ग के जितना देना चाहे दे सकता है अर्थात श्राद्ध में अथवा दान में सभी वस्तुओं हेतु मन्त्र का प्रयोग होता है और वो सभी ब्राह्मण के ही अधिकार में होता है।

  • पंचदेवता, विष्णु, तर्पण आदि भाग : ये अविहित है, इसमें सामान्य रूप से ही सामग्रियों का प्रयोग होना चाहिये क्योंकि ये नित्यकर्म हैं। अर्थात विशेष सामग्री के रूप में कुछ होना ही नहीं चाहिये जिसपर अधिकार की बात हो अथवा पुरोहित या महापात्र कोई भी अधिकार स्थापित करने की चेष्टा करें।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

दर्भ विचार

दर्भ विचार में भी ढेरों विषय आते हैं किन्तु सामान्य रूप से वो सभी तथ्य आपको अन्यान्य पुस्तकों में प्राप्त हो जायेंगे हम यहां उन तथ्यों से भिन्न श्राद्ध कर्म में जो अन्य विशेष महत्वपूर्ण तथ्य हैं उसे समझने का प्रयास करेंगे जैसे दर्भग्रहण विचार में क्या करें पुरोहित लेकर आते हैं उसमें इतना ही महत्वपूर्ण है कि दर्भ की जो दरिद्रता रहती है उसका निराकरण करना चाहिये, आवश्यकतानुसार उचित दर्भ (कुशा) की व्यवस्था करना यजमान का ही कार्य होता है और पुरोहित का कार्य समझने से समस्या उत्पन्न हो गयी है। यदि यजमान इसे अपना दायित्व समझे तो ही निवारण संभव है। यदि कुशा अनुपलब्ध हो तो उसका विकल्प भी कहा गया है श्राध्द के दिन ही कुशा अथवा विकल्प (पर्याप्त) व्यवस्था की जा सकती है।

दर्भ की व्यवस्था पाक से प्रथम अपेक्षित है क्योंकि आवश्यकता तो छाग को सिंचित करने में, दिग्बन्धन करने में भी होगी। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य जो है वो “पवित्री”, “त्रिकुशा”, “वेणी”, “मोटक”, “दर्भपिञ्जुलि”, “कुशेषूपविश्य” और “सपवित्रत्रिकुशा” आदि विषयक है। तीन कुशाओं में ब्रह्मग्रंथि देने से वह त्रिकुशा संज्ञक होता है, एक कुशा को द्विगुणित करने से मोटक संज्ञक होता है, वेणी की भांति बीनने पर वह वेणी कहलाता है, दर्भपिञ्जुलि का तात्पर्य कुशाओं का समूह होता है जिसे विशेष मुद्रा के साथ पकड़ा जाता है, वाजसनेयी हेतु एक कुशा का ही विधान है। शास्त्रों में तो दर्भपिञ्जुलि का तात्पर्य कुशाओं का समूह ही है :

चतुर्भिर्दर्भपिञ्जूलैर्ब्राह्मणस्य पवित्रकम् । एकैकन्यूनमुद्दिष्टं वर्णे वर्णे यथाक्रमम्- मार्कण्डेय

सप्तभिर्दर्भपिञ्जूलैर्ब्राह्मणस्य पवित्रकम् । पञ्चभिः क्षत्रियस्यैव चतुर्भिस्तु तथा विशः ॥

द्वाभ्यां शूद्रस्य विहितमातुराणां तथैव च । सर्वेषां वा भवेद्द्वाभ्यां पवित्रं ग्रन्थितं न वा ॥

गरुडपुराण

चतुर्भिर्दर्भपिञ्जूलैर्द्वाभ्यां वाऽथ पवित्रकम् । दैवे कर्मणि कर्तव्यं पित्र्ये तत्त्रिभिरीरितम् ॥ - स्मृत्यन्तरे

इन प्रमाणों से पूर्णतः सिद्ध हो रहा है कि दर्भपिञ्जुलि का तात्पर्य दर्भसमूह ही है, उल्लेखन में जहां दर्भपिञ्जुलि कहा गया है वहां गठरी बनाया हुआ भाव तो लिया जा सकता है किन्तु त्रिकुशा-मोड़ा आदि नहीं हो सकता। पता नहीं ऐसा कहां से आरम्भ किया गया कोई मोड़ा में एक कुशा तोड़कर प्रविष्ट करने लगे तो कोई त्रिकुशा में। उपरोक्त प्रमाणों में दर्भपिञ्जुलि पद है और उसका क्या तात्पर्य है ये विद्वद्जन समझ सकते हैं। आगे उल्लेखन में एक विशेष प्रमाण और भी है :

मण्डलं चतुरस्रं वा दक्षिणाप्रवणं शुभम् । त्रिरुल्लिखेत्तस्य मध्यं दर्भेणैकेन चैव हि ॥
कूर्मपुराण/उत्तरभाग/२२/५०

कूर्मपुराण में के इस वचन में दर्भसमूह भी नहीं कहा गया है एक मात्र दर्भ ही कहा गया है। इसको विद्वानों ने वाजसनेयी के लिए ग्राह्य कहा है। यहीं विद्वानों ने एक और निष्कर्ष भी दिया है : “पिज्जुली = पवित्रम्” यदि पवित्री अर्थ ग्रहण करें तो कोई आपत्ति नहीं केवल इसमें पूर्वोक्त वचन से देव कर्म हेतु ४ वा २ दर्भपिञ्जुलि की पवित्री और पितृकर्म के लिये ३ दर्भपिञ्जुलि की पवित्री। १ दर्भपिञ्जुलि में भाव सामागातिरिक्त अर्थात वाजसनेयी आदि का है।

वाचस्पति मिश्र कहते हैं “वामहस्तेन दर्भपिञ्जुलिमादाय ततो दक्षिणहस्तेकृत्वा तन्मूलेन वामन्वारब्ध”, ये धारण करने की विशेष मुद्रा है और वाजसनेयी हेतु एक दर्भ ही पिञ्जुलि हेतु कहा गया है। यह विशेष मुद्रा भी छन्दोगियों के लिये है और इसका मूल वचन भी छन्दोगपरिशिष्ट में प्राप्त होता है - पिञ्जुल्याद्यभिसंगृह्य दक्षिणेनेतरात्करात् । अन्वारस्य च सव्येन कुर्यादुल्लेखनादिकम् ॥ यहां वाम हस्त का भूमि पर लगाना स्पष्ट होता है जो कि छन्दोगी हवन में भी देखा जा सकता है। तो वाजसनेयी हेतु क्या भाव है ? वाजनेयी हेतु एक दर्भ वा एक दर्भ की पवित्री लिया जा सकता है जिसके मूल भाग को दक्षिणहस्त से धारण करते हुये और वाम हस्त से वेदी पर प्रादेश चिह्नित करते हुये उल्लेखन करे। इसका प्रमाण गोभिल स्मृति में प्राप्त होता है :

पिञ्जुल्यादिभिः संगृह्य दक्षिणेनेतराकरात्। अन्वारभ्य च सव्येन कुर्यादुल्लेखनादिकम् ॥

गोभिल स्मृति/२/१२३

यहां एक और विशेष तथ्य “कराभ्यामुल्लिखेत्” भी प्राप्त होता है और कल्पतरु, वीरमित्रोदयादि में भी दोनों हाथों की मुष्टि से पकड़ना ही कहा गया है। अस्तु हम इसी पूर्वाचार्य मत को ग्रहण करेंगे क्योंकि अनेकानेक स्थान पर प्राप्त हो रहा है। हमसे समझने में त्रुटि हो सकती है और यह स्वीकार करता हूँ। इस कारण जो स्पष्ट हुआ वो यही कि मूल भाग को दाहिने हाथ से इस प्रकार पकड़े जैसे दण्ड आदि को पकड़ते हैं एवं उसके पीछे (कुशाग्र) बांये हाथ को भी मुष्टिवत् ही लगाये। छन्दोगी हेतु तीन कुशा की पिन्जुली सिद्ध होती है एवं शेष के लिये एक कुशा। पवित्री बनाना नहीं कहा गया है अस्तु कुशा ही हो किन्तु ग्रंथि युक्त ही हो।

पवित्रीधारण का दोनों हाथों (अनामिका) में विधान है,मध्यपर्व पर धारण करना भी कहा गया है किन्तु मूल में भी विशेष रूप से ब्राह्मण हेतु प्रशस्त है। वामहस्त में दर्भधारण करके आचमन का निषेध है किन्तु इसका तात्पर्य यह है कि दक्षिणहस्त का दर्भ यदि आचमन काल में हटा लें तो केवल वामहस्त में ही दर्भ होगा ऐसा न करे, दोनों हाथों में दर्भ होना प्रशस्त है और आचमन करने पर उच्छिष्ट भी नहीं होता अपितु कुशाधारण करके ही आचमन करना चाहिये किन्तु तिलक नहीं।

द्व्यङ्गुलं मूलतः कुर्याद्ग्रन्थिरेकाङ्गुलस्तथा । चतुरङ्गुलमग्रं स्यात्पवित्रस्य च लक्षणम् - स्मृत्यन्तरे

पवित्री निर्माण की भी विशेष विधि होती है, ७ कुशाओं की सर्वश्रेष्ठ कही गयी है एवं सामान्यतः २ कुशाओं की कही गयी है जिसका आकार प्रादेश प्रमाण (१० अंगुल) हो। १० अंगुल (प्रादेश प्रमाण) की २ कुशा (न्यूनतम) को २ अंगुल में मोड़ने पर वह ५ अंगुल हो जायेगा, उसमें जब १ अंगुल पर ब्रह्मग्रंथि देंगे तो शेष ४ अंगुल अग्रभाग रहेगा, इस प्रकार से पवित्री होता है। अर्घ्य्पात्र में भी जो पवित्री देने के लिये कहा गया है वो इसी का संकेत करता है न कि कुशा को मात्र तोड़कर।

वारिधारा में पिण्ड पर सपवित्रत्रिकुश रखने के लिये कहा गया है इसका यही तात्पर्य है कि धारित त्रिकुशा और पवित्री दोनों ही (पवित्री में त्रिकुशा देकर) पिण्ड पर रखे। इसी प्रकार कुशेषूपविश्य कथन का तात्पर्य उसी पूर्वधारित त्रिकुशा पर बैठना है एवं वहां पुनः अन्य दूसरी त्रिकुशा ग्रहण किया जायेगा जिसका पिण्डोत्थान से पूर्व वारिधारा काल में त्याग होगा और वही पिण्ड पर दिया जायेगा। इसके विषय में यदि प्रमाण की बात करें तो दर्भत्याग का प्रमाण इस प्रकार मिलता है :

श्राद्धारम्भे तु ये दर्भाः पादशौचे विसर्जयेत्। अर्चनादौ तु ये दर्भा उच्छिष्टान्ते विसर्जयेत् ॥

मार्जनादौ तु ये दर्भाः पिण्डोत्थाने विसर्जयेत्। उत्थानादौ तु दक्षिणान्ते विसर्जयेत् ॥

स्मृत्यंतरे

श्राद्धारम्भ में धारित दर्भ (त्रिकुशा) का पादप्रक्षालन में त्याग करे जो सपात्रक में होगा; अपात्रक में नहीं, पुनः अर्चन में धारित दर्भ का उच्छिष्टांत में त्याग करे और यही (कुशेषूपविश्य) में प्रयोग होगा, पुनः मार्जनादि में धारित त्रिकुशा (पवित्री सहित) पिण्डोत्थान से पूर्व वारिधारा में ही त्याग किया जायेगा और वही सपवित्रत्रिकुशा पिण्ड पर रखा जायेगा। पुनः पिण्डोत्थान में अन्य दर्भ धारण किया जायेगा जिसका दक्षिणा के अंत में त्याग होगा।इसी प्रकार आगे एक बार और विधान है।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति