सावधानी

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" - श्राद्धकाल और सावधानी, वरण में सावधानी, अन्न प्रयोग में सावधानी, नित्यकर्म,

श्राद्धकाल और सावधानी

एकादशाहे प्रेतस्य दद्यात् पिण्डं समन्त्रकम् । सिद्धान्नं तस्य दातव्यं शर्कराऽपूपकादयः ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/१ (कृतयुगसन्तानः)/७५/१४

धूर्ताचार्यों ने मध्याह्न का न जाने कहां से कैसे क्या अर्थ कर लिया कि एकोद्दिष्ट मध्याह्न तो छोड़िये अपराह्न में भी नहीं अपितु सायाह्न में किया जाता है। सायाह्न ही नहीं चतुर्थ प्रहर भी श्राद्ध के लिये निषिद्ध है तो किस आधार से सायाह्न में एकोद्दिष्ट करते हो ? यदि मध्याह्न में श्राद्ध के लिये प्रस्थान करने से श्राद्ध सायाह्न में होता है तो सीधा तात्पर्य है कि प्रस्थान प्रातः ही किया जायेगा तभी मध्याह्न में एकोद्दिष्ट संभव है अन्यथा असंभव। इन मूर्खाचार्यों ने जो शास्त्रसिद्ध होने वाले विषयों पर देशाचार/लोकाचार आदि का राग अलापते हैं इस विषय में कभी चिंतन ही नहीं किया।

यदि ऐसी चिंतन-मनन शक्ति मेरे पास है तो मैं ही करूँगा न। यह सत्यापन करना अनिवार्य है कि मैं वर्त्तमान काल में संशोधन करने का अधिकारी हूँ और सबके लिये वह बाध्यकारी भी है। खंडन का अवसर प्रदान किया जायेगा और जिसे लगे कि इसका शास्त्र से खंडन हो सकता है तो करने के लिये स्वतंत्र है। यदि प्रमाण पूर्वक इस तथ्य को खंडित कर सको और सायाह्न में ही एकोद्दिष्ट सिद्ध कर दो तो किया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो जो सिद्ध किया गया है वह बाध्यकारी होगा और अस्वीकार करने पर शास्त्रदस्यु संज्ञक होओगे, ब्रह्मघात से युक्त होओगे।

मेरे आक्रोश का कारण यह है कि यदि किसी ब्राह्मण के यहां श्राद्ध कराने जाता हूँ तो वहां ब्राह्मण का कर्म तो कई बार सुनने को मिलता है किन्तु देखने को कुछ भी नहीं। इधर ही एक पंडित के श्राद्ध में गया जहां लगभग १५ पंडित उपस्थित भी थे और कर्त्ता स्वयं को भी पंडित घोषित करता है, गिरिधारी जी ने ही बिलम्व होते देख उसे श्राद्धकाल का स्मरण कराया तो उसने कहा कि उचित काल तो अपराह्न होता है। ऐसे स्वघोषित पंडितों को ही मैं अपण्डित, मूर्खाचार्य, शास्त्रदस्यु आदि सम्बोधित करता हूँ। आशा है विद्वद्जनों को सभी बातें शास्त्रसम्मत ही लगेगी।

एकोद्दिष्ट का उचित काल मध्याह्न है उसमें भी कुतप काल अधिक विशेष है। एकोद्दिष्ट में पूर्वाह्ण का निषेध है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि पूर्वाह्ण में नित्यकर्म, दान, पाक भी नहीं होंगे। ये सभी मध्याह्न के आरम्भ होते-होते संपन्न हो जाने चाहिये तभी मध्याह्न में एकोद्दिष्ट संभव हो सकता है। एकोद्दिष्ट के लिये अपराह्न का भी निषेध है और सायाह्न व रात्रि तो निषिद्ध है ही। प्रमादादि व विघ्नवश विलम्ब होने पर आगे भी कर्तव्य होता है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं होता कि अपराह्न से सायाह्न तक ही करें। श्राद्धकाल को लेकर पर्याप्त सजगता आवश्यक है। एकादशाह को एकोद्दिष्ट श्राद्ध ही किया जाता है।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

वरण में सावधानी

देव और पितृकर्म में प्रेतकर्म के ब्राह्मण से भिन्न ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। प्रेतकर्म में वर्णित ब्राह्मण देव-पितृकर्म का अधिकारी नहीं होता अर्थात उसका अधिकार नष्ट हो जाता है और यही कारण है कि प्रेतकर्म करने वाले ब्राह्मण को महापात्र कहा जाता है एवं प्रेतकर्म से भिन्न किसी कर्म में ग्राह्य नहीं होते। अस्तु आद्यश्राद्ध (एकादशाह) को केवल और केवल महापात्र का ही वरण किया जाना चाहिये पुरोहित का नहीं।

पुरोहित और अन्य वो सभी वेदादि पाठ करने वाले ब्राह्मण जो आंगन में कलश पूजा के उपरांत भोजन करने वाले हों उनका वरण सपिंडीकरण श्राद्ध काल में होगा एकादशाह को नहीं। उनकी उपस्थिति का कारण अधिकारी का अभाव होना है। अधिकारी के अभाव में भी सभी कर्म हों इस कारण पुरोहित व वेदादि पाठ के निमित्त देव-पितृकर्म के अधिकारी ब्राह्मण भी एकादशाह को उपस्थित होते हैं। अभाववश कर्म के निमित्त अनाधिकार होने से उपस्थित होने का तात्पर्य है कि वरण नहीं ग्रहण कर सकते।

दोष यह है कि वरण ग्रहण करने के पश्चात् एकादशाह को भोजन करना भी अनिवार्य होगा और द्वादशाह को सपिंडीकरण में जहां आवश्यकता है, जिसके अधिकारी हैं वहां अनधिकारी हो जायेंगे। अस्तु महापात्र के अतिरिक्त अन्य सभी देव-पितृकर्म के अधिकारी ब्राह्मणों को एक विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है कि जब उन्हें श्राद्ध में उपस्थित होने का आमंत्रण मिले तभी वो वरण व भोजन अस्वीकार कर दें अन्यथा निमंत्रण मान्य होगा और भोजन करना अनिवार्य होगा, वरण सपिण्डीकरण काल में ग्रहण किया जायेगा और भोजन कलश पूजा के उपरांत। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि :

  • एकादशाह के दिन केवल और केवल महापात्र का ही वरण शास्त्रोचित है।

  • देव-पितृकर्म सपिंडीकरण में होता है और सपिंडीकरण काल में ही देव-पितृकर्म वाले ब्राह्मण का वरण किया जा सकता है।

  • देव-पितृकर्म से संबंधित ब्राह्मणों की एकादशाह को उपस्थिति का कारण प्रेतकर्म का अधिकार न होकर अधिकारी का अभाव होना है।

  • देव-पितृकर्म संबंधी ब्राह्मण (पुरोहित/पंडित वर्ग) जब श्राद्ध में उपस्थिति का आमंत्रण प्राप्त हो तभी एकादशाह को वरण व भोजन मना कर दें।

इससे संबंधित एक अन्य विषय भी है जो अत्यंत ही महत्वपूर्ण है वो है वार्षिक श्राद्ध। लोगों की ही नहीं विशेषरूप से कर्मकांडियों का विवेक विलुप्त हो चुका है और श्राद्ध शब्द नहीं सुना कि महापात्र का कर्म बोल देंगे। महापात्र और प्रेतकर्म का संबंध है एवं पुरोहितवर्ग के ब्राह्मण देव-पितृ से संबंधित होते हैं। वार्षिक श्राद्ध प्रेत श्राद्ध नहीं होता पितृकर्म है और पितृकर्म होने से महापात्र अग्राह्य हो जाते हैं एवं पुरोहित ही ग्राह्य होते हैं। किन्तु विवेकशून्यता की सिद्धि इसी तथ्य से हो जाती है कि ब्राह्मणवर्ग वार्षिक श्राद्ध में अधिकांशतः महापात्र को ही आमंत्रित करते हैं। यदि वृषोत्सर्ग की बात करें तो यहां देव-पितृ ब्राह्मण का वरण (ब्रह्मा और होता) होगा किन्तु मात्र वृषोत्सर्ग के निमित्त होगा न कि श्राद्ध के निमित्त।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

षोडश श्राद्ध में नित्यकर्म

नित्यकर्म किसी का भी स्वयं का कर्म है और इसमें ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती। तथापि यजमान नित्यकर्मादि से रहित होता है अस्तु सूर्य को अर्घ्य प्रदान करके १० बार गायत्री जप कराकर तर्पण व पंचदेवता पूजन ब्राह्मण को कराना ही होगा। तर्पण और पंचदेवता-विष्णु पूजन ही क्यों कराया जा सकता है एवं संध्या क्यों नहीं कराया जा सकता ये विचार का विषय है।

तर्पण महलायादि अनेकानेक अवसर पर ब्राह्मण कराते हैं एवं पंचदेवता-विष्णु पूजन तो सभी पूजनादि में कराते ही हैं इस कारण ये ब्राह्मण को ही कराना पड़ेगा। किन्तु संध्या कराना कुछ धूर्ताचार्यों ने आरम्भ किया है क्योंकि संध्या कराने का कर्म है ही नहीं। यदि यजमान को आता हो तो प्रतिदिन यथाकाल करता हो तो स्वयं ही कर ले और यदि नहीं करता है, संध्याविधि ज्ञात ही नहीं तो कोई औचित्य ही नहीं बनता।

यदि श्राद्ध में अनिवार्य सिद्ध किया जा सके तो धूर्ताचार्यों को चुनौति है सिद्ध करो कि श्राद्ध में अनिवार्य है; प्रतिदिन नहीं। अन्य पूजन-अनुष्ठानों में अनावश्यक है यह सिद्ध करो क्योंकि श्राद्ध के अतिरिक्त अन्य किसी अवसर पर तो नहीं कराते हो। अरे सीधा कह रहा हूँ संध्या कराना ब्राह्मण का कार्य नहीं है, यजमान यदि सीखना चाहे तो ब्राह्मण सीखा सकते हैं किन्तु वो उपनयन काल के पश्चात् ही श्राद्ध कर्म में नहीं।

धूर्ताचार्य इसीलिये संबोधित किया जा रहा है कि कुछ धूर्तों ने स्वयं को अधिक बड़ा पंडित सिद्ध करने के लिये संध्या कराना आरम्भ कर दिया और बहुत सारे उसका अनुकरण भी करने लगे।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

अन्न प्रयोग में सावधानी

श्राद्ध में दूषित अन्न का प्रयोग भी चिंता का विषय है, श्राद्ध में जो कुछ भी भोज्य प्रयुक्त हों वह शुद्ध व्यक्ति द्वारा ही पकाये जाने चाहिये। वर्त्तमान में पूरी की तो बात छोड़िये बेंती (बेसन या आटे से बनायी जाती है) श्राद्धकर्त्ता की पत्नी को ही मुख्य रूप से बनाना चाहिये किन्तु ये भी हलवाई ही बनाता है। जो भी पाक होगा बिना स्नान किये नहीं हो सकता, स्नान करके ही बनाया जा सकता है एवं जिसका श्राद्ध है उसके परिवार व सपिण्डादि ही पका सकते हैं। श्राद्ध कर्म में पूरी की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है फिर भी यदि देना ही हो तो घर में शुद्धतापूर्वक पकाया जाना चाहिये।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति