रुद्राष्टाध्यायी

धर्माचरण हो शास्त्रानुसार

पार्थिव पूजन प्रतिदिन भी किया जा सकता है और इसलिये इसकी विधि सरल होती है। विशेष पूजा में उनका अभिषेक भी किया जाता है। रुद्राभिषेक जब पार्थिव लिंग (मिट्टी के शिवलिंग) पर किया जाता है तो उसमें रुद्रसूक्त के 16 ऋचाओं का ही पाठ किया जाता है और इसे महाभिषेक भी कहा जाता है।

यदि यह सुनिश्चित हो जाये कि सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी पाठ पूर्वक रुद्राभिषेक करने पर भी पार्थिव लिंग का क्षरण नहीं होगा तो किया जा सकता है। तथापि यह सुनिश्चित करना बहुत ही कठिन है और जो लोग कर लेते हैं वो रुद्राभिषेक के उपरांत एक बार सही से पार्थिव लिंग का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें ज्ञात होगा कि क्षरण होता है अथवा नहीं।

पार्थिव पूजन में सबका अधिकार होता है इसलिये अनुपनीतों के लिये वेदमंत्र व प्रणव रहित विधि की आवश्यकता होती है। अतः पार्थिव पूजन की विधि अधिक जटिल नहीं होती है और इसमें वेदमंत्रों के प्रयोग की भी आवश्यकता नहीं होती है। प्रणव प्रयोग मात्र में ही अंतर करने की आवश्यकता होती है। रुद्राभिषेक में भी पौराणिक प्रयोग मिलता है जो रुद्री अनुभाग में समाहित है।

यदि सम्पूर्ण रुद्री पाठ पूर्वक रुद्राभिषेक करना हो तो उसके लिये नर्मदेश्वर अथवा धातु आदि के शिवलिंग पर अभिषेक करना सही विधि है। सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी का एक आवृत्ति पाठ और अभिषेक करना रुद्राभिषेक या रुद्री कहलाता है। शिव पुराण में शतरुद्री से पूजन अभिषेक आदि का अत्युत्तम व अद्भुत माहात्म्य बताया गया है। इसमें भी मंत्रो का प्रयोग रुद्राष्टाध्यायी से ही किया गया है। कुछ मन्त्र बाहर से लिये गये हैं। शतरुद्री सम्बन्धी वाक्य इस प्रकार मिलते हैं:-

षष्ठषष्ठि नीलसूक्तं च पुनर्षोडशमेव च ।

एषते द्वे नमस्ते द्वे नतं विद्द्द्वयमेव च॥

मीढुष्टमेति चत्वारि वय गुंग चाष्टमेव च ।

शतरुद्री समाख्याता सर्वपातकनाशिनी॥

शतरुद्री का प्रयोग श्रेष्ठ होने पर भी रुद्राभिषेक में रुद्री का नमकचमकात्मक प्रयोग विशेष रूप से प्रचलित है। इसमें रुद्राष्टाध्यायी का पहले सात अध्याय तक पाठ करके अष्टम अध्याय में क्रमशः ४,४, ४, ३, ३, ३, २, १, १, २ मन्त्रो पर विराम करते हुए पञ्चम अध्याय अर्थात नीलसूक्त के ११ पाठ होते है।

इस प्रकार एक नमकचमकात्मक रुद्राभिषेक को एक “रुद्र” कहते हैं।

  • ११ रुद्रों का एक लघुरुद्र होता है।

  • ११ लघुरुद्रों का एक महारुद्र होता है।

  • ११ महारुद्रों का एक अतिरुद्र होता है।

रुद्राष्टाध्यायी

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

आगमोक्त

तथा तु विजयापत्रं संन्यस्य पार्थिवोपरि ।

दत्त्वा तु विजया पत्रं अश्वमेधफलं भवेत् ॥

बहुत लोगों को भांग के विषय में प्रश्न करते देखा जा सकता है कि कहां लिखा है ? इस प्रश्न के उत्तर में ऊपर प्रमाण प्रस्तुत किया गया है।

पूजा में मुख्य भाव ही होता है सामग्रियां गौण होती हैं, किन्तु भाव होने पर सामर्थ्यानुसार आवश्यक सामग्रियों का भी प्रबंध किया जाता है भले ही वो सबरी के बैर ही क्यों न हों, सुदामा के तण्डुल ही क्यों न हो। भाव पूर्वक सामर्थ्यानुसार उपलब्ध एक सामग्री भी भगवान भाव से ही ग्रहण कर लेते हैं किन्तु अहंकार पूर्वक, प्रदर्शन करने वालों आदि के सर्वस्व समर्पण को भी स्वीकार न करें।

इसलिये पूजा करनी तो चाहिये भाव से ही किन्तु पूजा में अर्पित होने वाली सामग्रियां भी सामर्थ्यानुसार उपलब्ध करने का प्रयास करना चाहिये। जब भाव की प्रबलता होती है तो जो सामग्रियां सबके लिये उपलब्ध न हो वो भी सहजता से उपलब्ध हो जाती है। पार्थिव (शिव) पूजन की विशेष सामग्रियों को इस प्रकार समझा जा सकता है :

जल : गंगाजल हो अथवा अन्य नदियों का उपलब्ध जल किन्तु आहरण की विशेष विधि होती है और उस विधि से ही पूजा के लिये आहरण करें। जूते-चप्पल पहनकर या अन्य प्रकार से पवित्रता का परित्याग करके जल का आहरण भी न करें। किसी अन्य व्यक्ति से यदि मंगवायें तो यह ज्ञात करके कि उसका लाया जल ग्राह्य होगा अथवा नहीं।

बेलपत्र : शिवपूजन में बेलपत्र की विशेष आवश्यकता होती है किन्तु बेलपत्र तोड़ने का भी विधान है। पूजा के दिन डालियां तोड़कर लाना और फिर बेलपत्र तोड़ना अनुचित है। बेलपत्र १० दिनों तक पर्युषित नहीं होता अस्तु पूजा से ९ दिन पूर्व भी जब अनुकूल हो बेलपत्र की व्यवस्था कर सकते हैं। न्यूनतम एक दिन पूर्व तो अवश्य ही कर लें क्योंकि पूजा के दिन अन्यान्य ढेरों कार्य होते हैं। नित्य पूजा में प्रतिदिन ग्रहण किया जा सकता है क्योंकि वहां आवश्यकता ही अल्प होती है विशेष पूजा में आवश्यकता भी विशेष होती है।

दुग्धादि : दुग्धादि के विषय में यह तो स्पष्ट ही है कि गाय का हो किन्तु उसमें भी ऐसा नहीं कि किसी भी गाय का हो। ग्राह्य दुग्धादि के लिये गाय के विषय में भी नियम है कि वह संधिनी न हो, सवत्सा हो, स्तन में न्यूनाधिक्यता न हो, स्वस्थ हो आदि। दुकानों का दुग्ध, दही, घृत पूजा के लिये ग्राह्य नहीं होता।

अभिषेक द्रव्य : अभिषेक द्रव्य के विषय में प्रायः ऐसा देखने को मिलता है कि अनेकानेक द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है। यह किसी भी प्रकार से उचित प्रतीत नहीं होता। एक बार में किसी एक ही द्रव्य से अभिषेक करना उचित है चाहे वो जल ही क्यों न हो। यदि अनेकानेक द्रव्यों से अभिषेक करना हो तो सभी द्रव्यों से पूर्णाभिषेक होना चाहिये न कि एक ही अभिषेक में सभी द्रव्यों का प्रयोग। जैसे पंचामृत के विभिन्न द्रव्यों से स्नान कराने में देखने को मिलता है और जब ऐसा करेंगे तो एक दिन में अनेक द्रव्यों से अभिषेक संभव नहीं होगा। इस प्रकार मान लें की पांच द्रव्यों से अभिषेक करना हो तो पांच दिनों का अनुष्ठान करके करना चाहिये।

सुगन्धित द्रव्यादि : वर्त्तमान में प्रदर्शन मात्र की ही सोच देखने को मिलती है और सामग्री की अधिकता को महत्व दिया जाता है, शुद्धता को नहीं। इत्र, गुलाब जल आदि में शुद्धता तभी संभव है जब वह स्वयं निर्माण करें। दुकानों से लिया गया सुगन्धित द्रव्य पूजा में अर्पित करने योग्य नहीं होता। तेल ग्राह्य होता है किन्तु जो तेल मिलता है वो स्वयं ही दूषित है, तिल-तेल तक जो कि पूजा के लिये मिलता है अपद्रव्य मिश्रित (दूषित/अग्राह्य) होता है अन्य तेलों की तो बात ही क्या करें। अर्थात पूजा के लिये शुद्ध तिल तेल भी चाहिये तो उसकी व्यवस्था स्वयं ही करनी होगी। इसी प्रकार भस्म के स्थान पर शुद्ध मिट्टी चढ़ाना उत्तम पक्ष है किन्तु दुकानों में बिकने वाला भस्म उत्तम नहीं। ये तब है जब स्वयं भस्म निर्माण न किये हों, यदि कर लें तो विकल्प की आवश्यकता ही नहीं होगी।

विशेष ध्यातव्य : बाजार में मिलने वाली प्रत्येक सामग्री यदि उसका निर्माण किए गया हो तो अग्राह्य ही हो जाता है क्योंकि उसको पूजा आदि में प्रयोग के दृष्टिकोण से नहीं बनाया जाता। और जो पूजा के लिये ही विशेष रूप से बनाया जाता है वो तो और भी दूषित होता है।

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

महाभारतांतर्गत

वर्त्तमान युग में पवित्रता का अर्थ स्वच्छता मात्र समझना सामान्य बात हो गई है और यह मतिभ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार भ्रमित लोगों की बुद्धि के अनुसार हवन करने से वायुमंडल की शुद्धि होती है, यदि वायुमंडल को ही शुद्ध करना है तो मन्त्र और विधान की आवश्यकता कहां है फिर ? अर्थात इस प्रकार के भ्रामक तथ्य बड़े स्तरों पर प्रचारित किये जाते हैं और धार्मिक विषयों में वही लोग जो स्वयं भ्रमित हैं इस प्रकार के कुतर्क करके जो शास्त्रीय विधि से कर्मकांड करने वाले उन्हीं को पाठ पढ़ाया करते हैं। कर्मकांड और धर्म में किसी विषय की सिद्धि के लिये वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता ही नहीं है, ये विज्ञान (वर्त्तमान साइंस) से परे है और स्वयं विज्ञान ही आधार प्राप्त करता है।

पवित्रता के लिये यह आवश्यक होता है कि हमारा द्रव्य (धन), अन्न, गृह, वस्त्र, पात्र, देश (स्थान), सामग्री (प्रयुक्त होने वाले द्रव्य) आदि सभी पवित्र हों न कि केवल शरीर स्वच्छ हो। शास्त्रीय विधान का पालन करने से ही मन भी स्वच्छ होता है, न कि केवल कहने से। आज ढेरों कहने वाले हैं आन्तरिक शुद्धि किन्तु एक ओर आतंरिक शुद्धि की बात करते हैं और दूसरी ओर शास्त्रीय सिद्धांतों का खंडन करते रहते हैं।

बाह्याभ्यन्तर शुद्धि में शारीरिक और मानसिक दोनों शुद्धि की बात है और तर्क पर आधारित शुद्धि का महत्व नहीं है, शास्त्रीय विधान से शुद्धि करे यह आवश्यक है। तर्क पर आधारित शुद्धि में संसर्ग आदि दोषों को अस्वीकार किया जाता है जबकि शास्त्रीय शुद्धि में संसर्गादि भी विचार किया जाता है। शारीरिक शुद्धि खंड में प्रमुख तथ्य इस प्रकार समझे जा सकते हैं :

  • जप-पूजा करते समय जो छींक आदि से अशुद्धि उत्पन्न हो उसके लिये आचमन करे।

  • यदि शयन किया हो तो स्नान अनिवार्य होता है।

  • मल-मूत्रोत्सर्ग के पश्चात् भी आवश्यक शुद्धि का पालन करना चाहिये।

  • किसी कारण से यदि धारण किया हुआ वस्त्र खोला गया हो तो पुनः अन्य स्वच्छ वस्त्र ही धारण करे।

  • आमंत्रित करने वाले लोगों की सूचि ध्यान से बनाये कि कोई असंसर्गी न हो। आजकल इसका पूर्णतः त्याग किया जाने लगा है।

देश (स्थान) की शुद्धता के लिये मंडल का विधान है। प्रत्येक कर्म भूमि पर ही करने का विधान है और भूमि को गोमय व पंचगव्य से उपलेपन करके मंडल निर्माण करे यह शास्त्रज्ञा है। वर्त्तमान युग में सभी पक्की करा रहे हैं, मार्बल, टाइल्स लगा रहे हैं और घर में किंचित भूमि को भी कर्मकांड के लिये रिक्त नहीं रहने देते। प्रथम गलती करके फिर विकल्प मांगना ये उचित नहीं हैं।

मंडल एक अनिवार्य क्रिया है और मंडल किये बिना देश (स्थान) की शुद्धि नहीं होती। श्वानादि जब घर में ही रखे हों तो वहां पवित्रता का विचार करना ही व्यर्थ है। श्वान के दृष्टि मात्र से भी अपवित्रता उत्पन्न होती है, स्पर्श की तो बात ही क्या करें।

सामग्री शुद्धि में जो सामग्री प्रयुक्त करने वाले हैं यथा जल, मिट्टी, पत्र-पुष्प, दुग्ध, दही, घृतादि सबकी शुद्धि के भिन्न-भिन्न नियम हैं। जैसे जलाहरण में पादुका का निषेध है, असंसर्गी के संसर्ग का निषेध है एवं मृदाहरण में भी यह नियम है।

अब गंगाजल ही कोई लाये और जूते-चप्पल पहनकर लाये तो वो आचमन के योग्य भी नहीं रहता। यदि दुग्धादि की बात करें तो सर्वोत्तम पक्ष यह है कि स्वयं ही गोपालन करें, द्वितीय पक्ष यह है कि अन्यत्र से शुद्धता को ज्ञात करके प्राप्त करें। जैसे मृतवत्सा न हो, संधिनी न हो, स्तन न्यूनाधिक न हो आदि।

यदि इन नियमों को समझें तो बाजारू दुग्धादि निषिद्ध हो जाते हैं, फिर डेयरी का दूध-दही का प्रयोग करने योग्य नहीं होता। यदि पत्र-पुष्प-समिधा आदि की बात करें तो इसका क्रय नहीं होना चाहिये मूल्य प्रयोग होने से भी दोष उत्पन्न होता है किन्तु आज सभी पत्र-पुष्प-समिधा आदि भी क्रय करते हैं।

यदि पूजन के विशेष सामग्री सप्तमृत्तिका, सर्वौषधि, पंचरत्न, इत्र, गुलाबजल आदि की बात करें तो वो सभी (जो बाजार से क्रय किया जाता है) पूजा काल में में स्पर्श करने योग्य भी नहीं होते प्रयोग करना तो चिंताजनक है। तेल-घृत में इतना दोष नहीं होता किन्तु शुद्ध हो इसका विचार तो उसमें भी करना ही पड़ता है और ये प्रयोग करने वाले का ही दायित्व होता है न कि बेचने वाले का। विक्रेता अपने स्थान पर दोषी है किन्तु क्रेता अपना दोष विक्रेता के ऊपर नहीं डाल सकता।

चंदन के नाम पर केवल कुमकुम का प्रयोग करना शास्त्र और कर्मकांड में अनास्था है। चन्दन का तात्पर्य पत्थर पर चन्दन की लकड़ी घिसकर प्राप्त किया हुआ चन्दन है और यही विधान है एवं और भी विधान है जैसे अधिक पतला न हो (अर्थात जल अधिक न मिलाये), ताम्रपात्र में न रखे आदि। चन्दन के नाम पर कुमकुम प्रयोग करना अश्रद्धा-अनास्था का परिचायक होता है। इसी प्रकार धूप के स्थान पर अगरबत्ती का प्रयोग करना भी समझना चाहिये। इस प्रकार से शुद्धि विधान का विकास के नाम पर परित्याग करना अश्रद्धा-अनास्था है या मतिभ्रम है।

नैवेद्य खंड में तो विशेष विचार की आवश्यकता होती है, नैवेद्य में पायस, पक्वान्नादि की विशेष आवश्यकता होती है और जो भी भोग लगाये जायें वो सभी मिष्टान्नादि भी स्वयं ही शुद्ध सामग्रियों से पवित्रता पूर्वक निर्माण करें यह आवश्यक नियम है। बाजारू मिष्टान्न की बात करें तो एक मात्र बतासा ग्राह्य होता है। लड्डू, पेड़ा आदि जो भी अर्पित करना हो वो स्वयं ही बनाने का विधान है, न कि क्रय करने का। यदि स्वयं न बना सके तो अन्य का सहयोग लिया जा सकता है अथवा अत्यधिक बनाना हो तो हलवाई को भी रखा जा सकता है किन्तु उसे भी पवित्रतापूर्वक निर्माण करना अनिवार्य होता है और ऐसा नियम पहले ही विदित करे।

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि