पार्थिव पूजनं – पूजनारम्भ
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार


अब हम पूजा के दिन पूजन आरम्भ एवं अगले क्रम को भलीभांति समझने का प्रयास करेंगे, क्योंकि पूर्वोक्त अनुभागों में अनेकों वास्तविक तथ्य विदित तो हुये किन्तु सही क्रम स्पष्ट नहीं हुआ है और ये तब तक नहीं होगा जब-तक कि इसको पूर्णतः रेखांकित न किया जाय। एवं साथ ही एक समस्या यह भी उत्पन्न होगी कि वर्त्तमान में उक्त विधि के अनुसार सम्भव नहीं है, नहीं किया जा सकता। किन्तु कैसे संभव नहीं है यह तो सिद्ध ही नहीं होता, जो संभव न हो यदि सिद्ध हो जाये तो उसका विकल्प भी ढूंढा जा किन्तु मनमुखी कदापि न करे।
मिट्टी लाना असंभव है अथवा नैवेद्य की व्यवस्था, दूध असंभव है अथवा चन्दन घिसना ?
वास्तविकता यह है कि आस्था का अभाव है और मर्यादाओं का पालन नहीं उल्लंघन करने की प्रवृत्ति सी बनती जा रही है। अन्न-धन आदि इतना दूषित हो गया है कि धर्माचरण में यदि प्रवृत्त होते हैं तो भी शास्त्रीय मर्यादाओं का उल्लंघन ही करना चाहते हैं, सामान्य जीवनचर्या की तो चर्चा ही क्या करें। तथापि कुछ-न-कुछ तो ऐसे लोग भी होते ही हैं जो शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करना चाहते हैं, उनके लिये उन विधानों की चर्चा उपयोगी होगी।
सर्वप्रथम स्नानादि नित्यक्रिया में ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती और ये यथाकाल करना चाहिये। चर्चा का कारण यह है कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि जब ब्राह्मण आएंगे तब स्नान करेगें। किन्तु ऐसा नहीं है,
पूजनारम्भ
सपत्नीक ग्रन्थिबन्धन करके ईशानकोण में कलश स्थापन के स्थान पर आसन लगाकर बैठें।
पवित्रीकरण, भस्म-रुद्राक्ष धारण आदि करके स्वस्तिवाचन, गणेशाम्बिका पूजन, संकल्प, ब्राह्मण वरण, दिग्रक्षण आदि करें।
हवन वेदी के पश्चिम भाग में बैठकर विधि पूर्वक अग्निस्थापन करें और भोग लगाने और चरु होम के लिये स्थापित अग्नि पर पायस निर्माण करें। सामान्यतः पूजा की पुस्तकें मात्र पूजा से सम्बंधित होती हैं, इसलिये हवन संबंधी चर्चा उसमें नहीं मिलती किन्तु पूजा अनुष्ठानों का यही क्रम होता है। परन्तु व्यवहार में पूजा करके अंत में विधिरहित हवन देखने को मिलता है जिसका कोई महत्व ही नहीं होता।
अग्नि में पर्याप्त ईंधन देकर पुनः ईशानकोण में कलशस्थापन-पूजन करें। यदि हवन न करना हो तो बिना अग्निस्थापन के ही कलशस्थापन-पूजन करें।
तदनन्तर नवग्रह, दशदिक्पाल आदि का पूजन करें।
फिर भगवान शिव की पूजा के लिये पूर्व भाग में उत्तराभिमुख होकर बैठें और पार्थिव निर्माण करके पूजा विधि के अनुसार आवाहन, ध्यान, न्यास, पूजन, जप आदि करें।
तदनंतर हवन विधि के अनुसार हवन, बलिदान, तर्पण, मार्जन आदि करके आरती करें।
प्रदक्षिणा, क्षमा प्रार्थना, साष्टांग प्रणाम आदि करके विसर्जन करें।
ब्राह्मणों को दक्षिणा प्रदान करके, प्रसाद आदि ग्रहण करें।
ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं भी सपरिवार, अतिथि-कुटुम्बादि आदि के साथ भोजन करें।
विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया ।
पूजितोऽपि महादेवो न स्यात्तस्य फलप्रदः ॥
तस्मान्मृदाऽपि कर्तव्यं ललाटे वै त्रिपुण्ड्रकम् ॥
उपरोक्त क्रम से प्रारंभिक क्रियाओं को संपन्न करें। ब्राह्मण को फलाहार आदि करा दें। यदि चरु निर्माण करना हो तो स्थापित अग्नि पर ही करें।
सभी ब्राह्मणों के लिये उचित क्रम से आसन, पात्र, पत्र, मिट्टी, जल, पूजन सामग्री आदि व्यवस्थित कर दें। सबके लिये पृथक-पृथक दीप की व्यवस्था करें किन्तु धूप एकत्र ही रखें। अधिक धूम न हो जाये इसका भी ध्यान रखें। उक्त प्रकार से ही स्वयं के लिये भी व्यवस्था कर लें। अब विधिपूर्वक शास्त्रीय मानकों के अनुरूप पार्थिव निर्माण आरम्भ करें।
मिट्टी लेना : ॐ हराय नमः ॥
पार्थिव लिंग निर्माण करना : ॐ महेश्वराय नमः ॥
विहित पात्र/पीठ पर स्थापित करना : ॐ शूलपाणये नमः ॥
तदुपरांत गंध-पुष्पाक्षतादि अर्पित करे दें – ॐ पिनाकधृषे नमः ॥
इस प्रकार से भगवान शिव की पूजा का कलयुग में विशेष महत्व है और शीघ्र कल्याणकारी, मनोरथ पूर्ण करने वाला है। भगवान शिव की अराधना कोई भी कर सकता है किन्तु स्वयं की योग्यता-अधिकार आदि का ध्यान रखते हुये करने से ही कल्याण प्राप्त कर सकता है, विधान का उल्लंघन करके की गयी पूजा भी विपरीत फलदायक हो सकता है।
सामान्यतः स्नानादि करके यथाविधि नित्यकर्म करे और जो नहीं भी करते हैं वो न्यूनतम सूर्य नारायण को अर्घ्य प्रदान करके १० बार गायत्री जप कर लें।
पंचदेवता व विष्णु पूजन में ब्राह्मण की आवश्यकता हो तो न करें और यदि स्वयं कर सकते हों तो कर लें।
मिट्टी को गूंथना प्रथम चरण है और मण्डलादि (उपलेपनादि) का उल्लेख अपेक्षित नहीं है सर्वत्र अनिवार्य होता है।
चन्दन आदि घिसना, पुष्प-पत्र, पंचामृत, धूप-दीप आदि को पूजा आरम्भ करने से पूर्व ही व्यवस्थित कर लेना चाहिये और ब्राह्मण आ जायें तब किया जायेगा यह भाव भी उचित नहीं है। उक्त विषयों का निर्देशन पहले ही प्राप्त कर लें और ब्राह्मण यदि स्वयं ही सभी काम करने की बात कर रहे हों तो भी मना करें क्योंकि ब्राह्मण का कार्य व्यवस्था करना नहीं, व्यवस्था के अनुकूल कर्म का संपादन करना होता है।
ब्राह्मण का आगमन होने पर पादप्रक्षालन आदि करें, ध्यान रखें पैर धोना ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं यजमान की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को नहीं जानने के कारण ही यजमान पैर धोने के लिये चापाकल या बाथरूम दिखाते हैं। ब्राह्मण का पैर इस प्रकार से धोना चाहिये कि जल से आंगन भींगे। जल आंगन में ही रहे।
आसन आदि प्रदान करके पूजा की व्यवस्था करें।
भस्म, रुद्राक्ष धारण करके पंचदेवता-विष्णु पूजन करके संकल्प करें और तदुपरांत ब्राह्मणों का वरण करें।
तदनन्तर स्वस्तिवाचन, दिग्बन्धन, कलश स्थापन पूजन करें।
यदि हवन करना हो तो मध्य अथवा पूर्व भाग में अग्निस्थापन करके, नवग्रह मंडल निर्माण व पूजन करें। आगे अग्नि में ईंधन-धूप आदि देते रहें ताकि अग्नि बुझे न। यदि हवन नहीं करना हो तो अग्निस्थापन न करे।
उपरोक्त क्रम से से ही एक-एक करके निर्धारित संख्या में पार्थिव लिंग का निर्माण, स्थापन आदि करें। मुख्य पूजा निर्धारित संख्या में पार्थिव निर्माण होने के पश्चात्। स्वयं भी निर्माण करना हो तो अल्प मात्रा में ही करें अधिकांश संख्या ब्राह्मणों में ही विभाजित कर दें और किसी भी ब्राह्मण के लिये ११०० से अधिक न हो यह भी ध्यान रखें। संख्या की अधिकता होने से ही पूजा की विधि का उल्लंघन होगा। स्वयं के लिये न्यूनतम १ अथवा ११ से अधिकतम ५०० तक संख्या ही ग्रहण करें और उक्त संख्या की भी गणना संकल्प में होगी।
ध्यातव्य : पार्थिव निर्माण आरम्भ होने के पश्चात पूजन के मध्य में कोई अन्य क्रिया नहीं, किसी अन्य देवताओं की पूजा नहीं। यदि किसी विशेष देवी-देवता की पूजा करनी ही हो तो वो प्रारम्भ में ही कर लें। साथ ही पार्थिव निर्माण आरम्भ करने के पश्चात कोई विश्राम नहीं, कोई विराम नहीं पूजन करके ही विराम। पार्थिव की संख्या इतना निर्धारित न करें कि मध्य में विराम लेने की आवश्यकता हो। संपूर्ण रूप से पार्थिव पूजन करने के पश्चात् हवन से पूर्व विराम आदि लिया जा सकता है। केवल कुछ विशेष आवश्यता में ही उठें अन्यथा नहीं।
पार्थिव पूजन में कुछ लोग अप्रत्याशित रूप से सत्यनारायण पूजा अथवा सप्तशती पाठ आदि भी समाहित कर लेते हैं। यह शास्त्रोचित नहीं है। एक कर्म में दूसरा कर्म नहीं जोड़ना चाहिये, एक कर्म को ही विधिपूर्वक करने का प्रयास करें। पार्थिव पूजन के पश्चात् रुद्री, स्तोत्रादि का पाठ कर्मांग रूप में रखें और करें।
प्रोक्षणी, पाद्य, अर्घ्य, आचमन पात्र स्थापन
प्रोक्षणी चार्घ्यपात्रं च पाद्यपात्रमनुक्रमत्।
तथा ह्याचमनीयार्थं कल्पितं पात्रमेव च ॥
स्थापयेद्विधिना धीमानवगुंठ्य यथाविधि॥
दर्भैराच्छादयेच्चैव प्रोक्षयेच्छुद्धवारिणा।
तेषु तेष्वथ सर्वेषु क्षिपेत्तोयं सुशीतलम्॥
प्रणवेन क्षिपेत्तेषु द्रव्याण्यालोक्य बुद्धिमान्।
उशीरं चंदनं चैव पाद्ये तु परिकल्पयेत्॥
जातिकंकोलकर्पूरबहुमूलतमालकम्।
चूर्णयित्वा यथान्यायं क्षिपेदाचमनीयके॥
एवं सर्वेषु पात्रेषु दापयेच्चंदनं तथा।
कर्पूरं च यथान्यायं पुष्पाणि विविधानि च॥
कुशाग्रमक्षतांश्चैव यवव्रीहितिलानि च।
आज्यसिद्धार्थपुष्पाणि भसितं चार्घ्यपात्रके॥
कुशपुष्पयवव्रीहिबहुमूलतमालकम्।
दापयेत्प्रोक्षणीपात्रे भसितं प्रणवेन च॥
न्यसेत्पंचाक्षरं चैव गायत्रीं रुद्रदेवताम्।
केवलं प्रणवं वापि वेदसारमनुत्तमम्॥
