पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध का खंडन
"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" - मासिक श्राद्ध में तंत्र प्रशस्त
एकेनैव तु पाकेन श्राद्धानि कुरुते सुतः ।
एकं तु विकिरं कुर्यात्पिण्डान्दद्यद्बहूनपि ॥
गरुडपुराण/२/२६/४७
ऊपर तंत्र से १४/१५ मासिक श्राद्ध करने को सप्रमाण सिद्ध किया जा चुका है अब तर्कपूर्वक एक-एक करके अर्थात पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध करने का खंडन किया जायेगा। सर्वप्रथम एक तथ्य जो ऊपर स्पष्ट हो चुका है कि एक पाक से एक ही विकिरदान किया जायेगा इसके आधार पर ही ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि यदि पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध करना ही हो तो सबके पाक भी भिन्न-भिन्न होंगे, जबकि पाक तो एक ही होता है। यदि पाक भिन्न हो तो यह दोष नहीं होगा।
किन्तु उस अवस्था में काल का उल्लंघन होगा। यद्यपि विघ्न, प्रमाद आदि के कारण बिलम्ब होने पर प्रदोष काल तक भी श्राद्ध किया जा सकता है किन्तु ध्यातव्य है कि विघ्न होने पर कर सकते हैं न कि स्वयं ही विघ्न उपस्थित करके करेंगे। जैसे चिकित्सक भी हो, ओषधि भी हो किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि मतिपूर्वक स्वास्थ्य की हानि की जाय अपितु इसका तात्पर्य यह है कि यदि स्वास्थ्य बिगड़ जाये तो चिकित्सक-ओषधि की आवश्यकता होगी।
जब एक-एक करके मासिक श्राद्ध करते हैं तो मतिपूर्वक श्राद्ध के विहित काल का उल्लंघन करते हैं, स्वयं ही विघ्न करते हैं न कि विघ्न होता है। पूर्वाह्न में आरंम्भ करना भी निषिद्ध काल में आरम्भ करना है और सायाह्न में करना भी निषिद्ध काल में मतिपूर्वक करना है। क्योंकि तंत्रमार्ग है और तंत्र से करने पर विहित काल में सम्पन्न किया जा सकता है।
आगे यह तो तब है न जब अपात्रक श्राद्ध करते हैं, यदि भिन्न पाक हो तो भी सपात्रक में तंत्र की ही सिद्धि होती है, पृथक-पृथक करने की नहीं। सपात्रक होने पर दो स्थिति हो सकती है या तो अनेकों ब्राह्मण हों अथवा एक ही ब्राह्मण हों। यदि अनेकों ब्राह्मण हों, पाक भी भिन्न हो तो भी सबको भोजन उचित काल में ही कराना होगा, ऐसा नहीं हो सकता कि ८ बजे एक को करा दें और जिनका क्रम अंतिम में आये उनको सायाह्न तक भूखा रखें अर्थात अंतिम मासिक सायाह्न में करें।
दूसरी बात यदि एक-एक करके करेंगे तो भिन्न पाक के साथ-साथ प्रत्येक बार मंडल की भी आवश्यकता होगी जिसमें ५ – १० मिनट लगेंगे। भले ही थोड़ा दूर भोजन करायें किन्तु निकट में उच्छिष्ट रहते नहीं कराया जा सकता। स्थान में अंतर होने पर भी प्रत्येक बार मंडल करना ही होगा। अब यदि एक या तीन ब्राह्मण ही हों तब तो निःसंदेह तंत्र से ही किया जायेगा।
इसकी सिद्धि हेतु और भी प्रमाण हैं और इतने प्रमाणों का आधार होते हुये भी यदि कोई देशाचार/व्यवहार आदि ही कहे तो फिर शास्त्र की आवश्यकता ही क्या है ? उचित-अनुचित का निर्णय तो शास्त्र से ही किया जायेगा। इसके विरुद्ध एक भी प्रमाण तो प्रस्तुत होना चाहिये न कि द्वादशाह को एक-एक करके ही मासिक श्राद्ध होने चाहिये। एक भी प्रमाण नहीं होने पर बोलना क्या ब्रह्मघात नहीं सिद्ध होता है ?
द्वादशाहे यदा कुर्यात्सपिंडीकरणं सुतः।
मध्याह्ने चैव सर्वाणि कुर्याच्छ्राद्धानि षोडश ॥
स्मृत्यंतरे – (स्मृति मुक्ताफलं श्राद्ध काण्ड)
आपदाद्यकृतं यत्तु कुर्यादूर्ध्वं मृताहतः।
न पृथक् पाकहोमादिः पिण्डदानं पृथक्पृथक् ॥
कालादर्शे – (स्मृति मुक्ताफलं श्राद्ध काण्ड)
इस अपकर्षण के लिये एकादशाह और द्वादशाह दोनों दिन का ही वचन प्राप्त होता है अर्थात मासिक श्राद्ध एकादशाह को भी तंत्र से किये जा सकते हैं एवं द्वादशाह को सपिंडीकरण अथवा जिस देश में एकादशाह को किये जाते हैं वहां एकादशाह को ही करे और जहां द्वादशाह को मासिक श्राद्ध किये जाते हैं वहां द्वादशाह को ही तंत्र से मासिक श्राद्ध करे।
यदि अपण्डित बिना प्रमाण के भी चिल्ला सकता है तो चिल्लाये उसके चिल्लाने से सत्य और शास्त्रीय तथ्य खंडित नहीं हो सकते एवं प्रामाणिक तथ्य को प्रस्तुत करने में हमें कोई संशय नहीं। ये लोग आज नहीं मानेंगे तो न सही परवर्ती विद्वानों के लिये तो यह आधार बनेगा ही, वो इन मूर्खों की मूर्खता पर हंसेगे भी और प्रामाणिक तथ्य को स्वीकारेंगे भी।
अब दूसरे प्रकार से समझते हैं और ये विषय जो मूर्धन्य विद्वान होंगे विशेषरूपेण श्राद्ध के उनके ही समझ में आएगी मूर्खाचार्यों के समझ में आ ही नहीं आ सकता ये है सपात्रक के अनुसार ब्राह्मणाभाव में विचार करने से सिद्धि। मान लें यदि सपात्रक श्राद्ध में द्वादशाह के दिन मात्र २ ब्राह्मण (महापात्र) ही उपलब्ध हुये तो क्या होगा ?
उत्तर इस प्रकार है :
एक ब्राह्मण मासिक श्राद्ध में नियुक्त होंगे और तंत्र से ही मासिक श्राद्ध होगा।
सपिण्डीकरण विश्वेदेव और पितृश्राद्ध में देव-पितृ संबंधी ब्राह्मण ही नियुक्त होंगे।
सपिंडीकरण में भी प्रेत श्राद्ध होता है अस्तु द्वितीय महापात्र प्रेत श्राद्ध में नियुक्त होंगे।
आगे एक और विसंगति है वो है अन्न के उष्ण होने की अनिवार्यता। जो भोजन श्राद्ध में परोसा जाता है उसका उष्ण होना अनिवार्य है। लेकिन अपण्डितों को सभी शास्त्र के नियम आडम्बर लगते हैं क्योंकि उससे स्वेच्छाचार की स्वतंत्रता का हनन होता है क्या किसी को ये चर्चा करते कभी सुनते हैं कि अन्न का उष्ण होना अनिवार्य है और जिस समय अन्न परिवेषण किया जाता है उस समय तक उष्ण रहे अर्थात पाक होते ही श्राद्ध का आरम्भ होना चाहिये। यहां तो पाक बनने के पश्चात् २ घंटे तक दानादि किया जाता है तब तक अन्न की उष्णता कहां होगी समझा जा सकता है। द्वादशाह को मासिक श्राद्ध और सपिंडीकरण श्राद्ध दोनों पाक प्रथम ही किया जाता है और उसके बाद नित्यकर्म करके मासिक श्राद्ध के सभी पिंड भी निर्माण कर लिए जाते हैं। तब तक अन्न की उष्णता समाप्त हो ही जाती है। यदि किंचित रहती भी हो तो एकाध मासिक में रह सकती है उसके पश्चात् नहीं। सपिंडीकरण में उष्णता के विधान का तो पूर्णतः हनन किया जाता है और ऐसे लोग पण्डित कहे जाते हैं जबकि शास्त्रदस्यु हैं।
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावद्भुञ्जन्ति वाग्यताः।
अश्नन्ति पितरस्तावद्यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
यमस्मृति/प्रायश्चित्तवर्णन/३८, स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/४०९४
यावदूष्मा भवत्यन्ने यावदश्नन्ति वाग्यताः ।
तावदश्नन्ति पितरो यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
विष्णुस्मृति/८१/२१, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/१/१४०/४५
अर्थात अनेकों प्रकार से विचार करने पर भी एक-एक करके मासिक श्राद्ध करना खंडित होता है। अपण्डितों को ये विषय समझ ही नहीं आएगा किन्तु विद्वान कर्मकांडियों के लिये समझना सरल ही है।
इस विषय को और अधिक समझने के लिये कुछ अन्य प्रमाण भी प्रस्तुत हैं, यद्यपि ये प्रमाण अन्य स्थिति में उद्धृत किये गए हैं किन्तु मासिक श्राद्ध में भी मान्य हैं ऐसा प्रतीत होता है किन्तु विद्वद्जनों को मनन करना आवश्यक है कि मासिक श्राद्ध में अग्रांकित प्रमाण ग्राह्य होंगे अथवा नहीं –
नैकः श्राद्धद्वयं कुर्यात्समाऽहनि कुत्रचित्र
– प्रचेता
श्राद्धं कृत्वा तु तस्यैव पुनः श्राद्धं न तद्दिने।
नैमित्तिकं तु कर्तव्यं निमित्तानुक्रमोदितम्॥
– जाबालि
द्वे बहूनि निमित्तानि जायेरन्नेकवासरे ।
नैमित्तिकानि कार्याणि निमित्तोत्पत्त्यनुक्रमात् ॥
– कात्यायन
काम्यतन्त्रेण नित्यस्य तन्त्रं श्राद्धस्य सिध्यति
– स्मृतिसंग्रह, वीरमित्रोदय (श्राद्ध प्रकाश), संस्काररत्नमाला, श्राद्धकल्पलता आदि में उद्धृत
मृताहनि समासेन पिण्डनिर्वपणं पृथक् ।
नवश्राद्धं च दम्पत्योरन्वारोहण एव तु ॥
– लौगाक्षि, वीरमित्रोदय (श्राद्ध प्रकाश) में उद्धृत
तंत्र की सिद्धि अनेकों प्रकार से होती है और इसको तंत्रन्यान्य कहा जाता है; जैसे :
संस्कार लोप होने पर प्रत्येक के लिये प्रायश्चित्त का विधान है क्षामवती करे यदि अनेकों संस्कार का लोप हो गया है तो नियमतः सबके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये किन्तु तंत्रन्याय से एक ही क्षामवती करने पर सबका प्रायश्चित्त हो जाता है।
लोग ११ से लेकर करोड़ों पार्थिव लिंग की पूजा करते हैं। नियमतः एक करोड़ों पार्थिव लिंग की पूजा का फल प्राप्त करके एक-एक करके निर्माण और पूजा होनी चाहिये। किन्तु एक दिन में सवालाख पार्थिव लिंग का निर्माण करते हैं और एक बार में सबकी पूजा करते हैं, पृथक-पृथक नहीं। यदि तंत्रन्याय से इसकी सिद्धि न हो तो फल का अभाव हो जायेगा, एक पार्थिव लिंग की पूजा का ही फल होना चाहिये क्योंकि एक बार ही पूजा की गई तो किसी एक की पूजा मान्य हो सकती है सबकी नहीं। किन्तु यही तंत्रन्याय है कि सबकी पूजा एक बार में करने से मान्य है अर्थात सवालाख पार्थिव लिंग पूजन मान्य होगा।
श्राद्ध में भी प्रत्येक श्राद्ध (पिता-पितामह-प्रपितामह) के लिये पृथक पाक का विधान है किन्तु यहां भी तंत्रन्याय से ही एक वर्ग हेतु एक पाक सिद्ध होता है। प्रमाण भी है यह भिन्न विषय है। प्रमाण के अनुसार एक वर्ग के लिये एक पाक होने चाहिये। जैसे पितृ वर्ग में पिता, पितामह, प्रपितामह आते हैं इसी प्रकार मातृ वर्ग, मातामह वर्ग भी हैं और प्रत्येक वर्ग के लिये भिन्न पाक की आज्ञा है। किन्तु एक वर्ग के तंत्र की भी आज्ञा है।
बिंदुवार
मासिक श्राद्ध एकादशाह को भी किया जा सकता है और द्वादशाह को भी। व्यवहार/लोकाचार/देशाचार चिल्लाने वालों के लिये यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि दोनों ही प्रशस्त है एवं इस कारण जहां जो ग्रहण किया गया हो वह वहां का देशाचार आदि भी कहलायेगा।
मासिक श्राद्ध एकोद्दिष्ट के अंतर्गत आता है, अपकर्षण होने के कारण एक दिन में ही सभी करने से पिण्ड की संख्या बढती है।
एकोद्दिष्ट श्राद्ध का मुख्य उचित काल कुतप काल है और गौण काल मध्याह्न है।
पूर्वाह्ण और सायाह्न दोनों ही काल में श्राद्ध प्रशस्त नहीं है अपितु निषिद्ध है, एकोद्दिष्ट मध्याह्न में ही प्रशस्त है।
मुख्यकाल मात्र में १४ मासिक श्राद्ध तंत्र से भी संपन्न होना कठिन है अस्तु मध्याह्न काल को ग्रहण किया जायेगा।
मासिक श्राद्ध के पश्चात् सपिण्डीकरण भी करना आवश्यक होगा, सपिंडीकरण पार्वण में गण्य है (विधि से) और उसका काल अपराह्न सिद्ध होता है किन्तु सायाह्न या रात में नहीं। अस्तु यदि मासिक श्राद्ध मध्याह्न में संपन्न कर लिये जायें तभी अपराह्न में सपिण्डीकरण का आरम्भ होना भी संभव हो सकता है। आरम्भ होने के पश्चात् यदि विलम्ब हो ही जाये तो हो सकता है।
