पार्थिव पूजनं – प्रतिनिधि
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार
प्रतिनिधि
प्रतिनिधित्व विषय में मुख्य विचारणीय तथ्य यह है कि पार्थिव निर्माण का जो वर्त्तमान व्यवहार है वो विकृत है। व्रत-जप-पूजनादि में स्वयं अक्षम हो तो अन्य को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है और प्रतिनिधित्व में सर्वोपरि स्थान ब्राह्मण का है। कारण कि “देवो भूत्वा देवं यजेत्”, यदि अन्यान्य को प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाय तो “देवो भूत्वा” का नियम संदिग्ध ही रहेगा किन्तु ब्राह्मण के विषय में यह नियम स्वतः परिपूर्ण रहता है, ब्राह्मण को देवता बनने की आवश्यकता नहीं होती अपितु ब्राह्मण देवता ही होते हैं। ब्राह्मण में मनुष्य बुद्धि, गाय में पशु बुद्धि, गंगा में नदी का भाव, पीपल में वृक्ष का भाव रखना भी पाप कहा गया है।
चूंकि ब्राह्मण देवता ही होते हैं इसलिये प्रतिनिधित्व में सर्वोपरि स्थान रखते हैं – आचार्य, होता, जापक, ऋत्विज आदि प्रतिनिधित्व वाले पद ही हैं। एवं इन पदों में केवल और केवल ब्राह्मण को ही प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है उसमें दो महत्वपूर्ण शर्त भी लगते हैं :
प्रथम वो जन्मना ब्राह्मण हों।
द्वितीय शास्त्र के ज्ञाता हो अर्थात शास्त्रीय विधि से करने में सक्षम हों।
जब ब्राह्मण को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा तो केवल पार्थिव निर्माण का नहीं, निर्माण के साथ पूजन का भी प्रतिनिधित्व दिया जाता है और यह वरण पूर्वक देना चाहिये। वर्तमान में जो व्यवहार देखा जा रहा है उसमें निर्माण करने वाले की योग्यता को नहीं अपितु पार्थिव संख्या को अधिक महत्व दिया जाता है। जिसे देखो ११००० करेंगे, क्यों, कहां से तो कोई उत्तर नहीं।
शास्त्रीय संख्या क्या है वो अयुत १०००० है फिर ११००० क्यों ?
१००० दशांश
दशांश का प्रमाण ?
नहीं मिलेगा, केवल तर्क मिलेगा हवन के लिये दशांश।
अरे हवन की आहूति भी जितने पार्थिव उतने होने चाहिये फिर दशांश कैसे ?
एक बार मान लिया जाय तो – यदि एक ज्ञानी ब्राह्मण को प्रतिनिधित्व दिया जाय और विधि के अनुसार करें तो ११०० से १५०० ही कर सकेंगे, और ऐसे में मात्र १०००० के लिये ही १० ब्राह्मणों की आवश्यकता होगी जो स्वयं केवल निर्माण न करें अपितु पूजन भी करें। तदन्तर उतनी ही आहूतियां देकर हवन भी करें। यदि हवन नहीं होता है तो हवन के रूप में यदि पार्थिव की संख्या बढ़ाना पड़े तो कितना बढ़ेगा ? १००० या १०००० विचार करें।
ब्राह्मण के द्वारा किया गया कर्म अधिक श्रेयस्कर होता है क्योंकि ब्राह्मण स्वयं ही देवता होते हैं। यजमान को स्वयं भी करे, ब्राह्मणों के साथ ही स्वयं भी जितना पार्थिव लिंग निर्माण कर सके करे और जिस प्रकार सभी ब्राह्मण पूजन करें उनके साथ ही उसी प्रकार स्वयं भी पूजन करे। यदि न कर सके तो केवल ब्राह्मण से ही कराये।
वर्तमान में समस्या यह है कि दो प्रकार का मतिभ्रम है :
एक संख्या अधिक करने की।
दूसरी स्वयं ही पूजा करने की।
अरे यहां दोष उत्पन्न होता है, ब्राह्मण कोई शिल्पी नहीं होते जो शिवलिंग निर्माण करके प्रदान करें। स्वयं भी जितना पार्थिव बनाये वो ब्राह्मण को ही पूजा करने के लिये दिया जा सकता है किन्तु ब्राह्मण से पार्थिव निर्माण कराके लिया नहीं जा सकता, यहां उनसे दिया गया प्रतिनिधित्व पुनः छीना जा रहा है यह भाव निकलता है, ब्राह्मण से अधिक योग्य स्वयं हैं ऐसा भाव प्रकट होता है। स्वयं उतने ही पार्थिव की पूजा करे जितना निर्माण किया हो।
जिन ब्राह्मणों ने जितना पार्थिव निर्माण किया उनकी पूजा भी वो स्वयं ही करेंगे, हां बाद में यजमान भी चाहे तो गंध-पुष्पाक्षतादि अर्पित कर सकता है किन्तु यह आवश्यक नहीं है। ब्राह्मण के द्वारा की गई पूजा का फल यजमान को ही प्राप्त होगा।
