सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं
मिथिला देशीय संशोधित श्राद्ध विधि
"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं"
(प्रथम खण्ड)
सम्पादक : पण्डित दिगम्बर झा
संशोधन प्रस्तावक : विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज
प्रथम संस्करण (PDF) - गंगादशहरा सम्वत् २०८३ (२६/५/२०२६)
©कॉपीराइट : यह संशोधन श्राद्ध की विकृतियों का निवारण करने के उद्देश्य से किया गया है और इसपर ©कॉपीराइट अधिकार भी बनेगा किन्तु मंत्रों और विधियों पर नहीं अपितु विश्लेषण पर क्योंकि ऐसा विश्लेषण अनुपलब्ध है एवं इस विश्लेषण से संगत पद्धति का भी अभाव है। अस्तु चोरी करने का प्रयास कॉपीराइट का उल्लंघन ही मान्य होगा। पूर्णतः अपात्रक श्राद्ध प्रकाशित नहीं है अस्तु पूर्णतः अपात्रक श्राद्ध विधि पर “वैधानिक बौद्धिक संपदा” का ©कॉपीराइट अधिकार बनता है।
पुस्तक : अप्रकाशित
PDF : प्रथम संस्करण - गंगादशहरा २०८३ (२६/५/२०२६)
PDF : द्वितीय संस्करण - गुरुपूर्णिमा २०८३ (२९/७/२०२६)
अंतर्जाल संस्करण : प्रकाशित (www.karmkandvidhi.in)
ध्यातव्य : यह उपलब्ध PDF - द्वितीय संस्करण भी सामान्य विवेकियों के लिये उपयोग हेतु नहीं है, अभी भी संशोधन कार्य शेष है। विवेकवान विवेकपूर्वक प्रयोग कर सकते हैं किन्तु यह संस्करण मुख्यतः विद्वानों खंडन-मण्डन, सुझाव, समालोचना आदि के लिये ही है और रक्षाबंधन तक प्रतीक्षा की जायेगी और तदनुसार अपेक्षित संशोधन करके पुनः रक्षाबंधन से विजयादशमी (२०८३) तक PDF तृतीय संस्करण जो उपलब्ध किया जायेगा वह उपयोगी होगा। हमें विद्वद्जनों के सहयोग की अपेक्षा है क्योंकि और भी ढेरों संशोधन (चूडाकरण - विवाह, अशौच निर्णय, स्त्रीकर्तृक-अनुपनीत-जीवित- वृद्धि-पार्वणादि श्राद्ध, तीर्थाटन, व्रत-पर्व निर्णय आदि) अपेक्षित हैं। अद्यतन संस्करण प्राप्ति हेतु यहां पधारें - सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं (अद्यतन)
प्रस्तावना
जहाँ लगभग १०–१५ वर्ष पूर्व गिने-चुने ही श्राद्ध कर्म कराने वाले कर्मकांडी उपलब्ध होते थे, पुरोहित वर्ग प्रायः श्राद्ध करा ही नहीं पाते थे और रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जप आदि अनुष्ठान कराने वाले विद्वान पंडित भी यह कहने के लिए विवश होते थे कि "मैं इस कर्म में रुचि नहीं रखता, इससे दूर ही रहता हूँ"—यद्यपि वे भागवत-वेदादि का पाठ करने के लिए जाते भी थे। यह तो एक स्पष्ट विरोधाभास ही था कि वे प्रेत-कर्म (पितृ-कर्म) में सम्मिलित भी हो रहे थे और साथ ही उससे दूर रहने का कथन भी करते थे। पूर्व प्रकाशित "सुगम श्राद्ध विधि" ग्रंथ की उपादेयता यही सिद्ध हुई कि ऐसे सभी पंडित एवं पुरोहित भी वर्तमान काल में श्राद्ध कर्म को सीखने और विधिपूर्वक कराने लगे।
इस पुस्तक का मूल उद्देश्य ही यही था कि सामान्य विवेक से युक्त ब्राह्मण भी सुगमता से श्राद्ध कर्म कराना सीख सकें, और सफल भी रहा। मैं इसे अपना परम सौभाग्य मानता हूँ कि जगदीश्वर ने इस पवित्र कार्य के निमित्त मेरा चयन किया। इसी क्रम में अब मुझे आगे और भी गुरुतर उत्तरदायित्व प्राप्त हुआ है, जो मिथिला के गौरव एवं परंपरा के पूर्णतः अनुकूल है।
शास्त्र का भी यही वचन है कि "मिथिला व्यवहार" को ही धर्म का प्रामाणिक निर्णय मानना चाहिए। यहाँ 'व्यवहार' से तात्पर्य "शिष्ट एवं विज्ञ जनों के आचरण" से है, न कि अल्पज्ञ व स्वेच्छाचारी पुरुषों के आचरण से। मिथिला के शिष्ट-प्राज्ञ जनों का व्यवहार धर्म का निर्णय इसीलिए सिद्ध हुआ है, क्योंकि मिथिला अनादि काल से मनीषियों व शास्त्रवेत्ताओं की उद्गमस्थली रही है। मिथिला क्षेत्र की माटी में प्रज्ञा और विवेक की जो उर्वरता विद्यमान है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। अस्तु, "सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" पुस्तक मूलतः मिथिलादेशीय परंपरा पर आधारित है; तथापि यह अन्य क्षेत्रों/देशों के लिए भी शास्त्रविहित, निषिद्ध अथवा निष्कर्ष न प्राप्त होने की स्थिति में पूर्णतः उपयोगी सिद्ध होगी और सम्यक् मार्ग प्रदर्शित करेगी।
"सुगम श्राद्ध विधि" अपने तात्कालिक उद्देश्य में सर्वथा सफल रही, किंतु उसका संपादन व्यावहारिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही किया गया था। जो श्राद्ध कर्म में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए तो वह प्रारंभिक ज्ञान का आधार सिद्ध होगी, तथापि केवल व्यावहारिक दृष्टिकोण रहने के कारण उसमें अनेकानेक शास्त्रीय विसंगतियाँ भी समाहित रह गई थीं। इसका कारण यह था कि उस समय श्राद्ध को पूर्णतः शास्त्र-सम्मत बनाने की अपेक्षा उन लोगों के भय का निवारण करने पर बल दिया गया था, जो जटिलता के भय से श्राद्ध कर्म से ही विमुख हो जाते थे, ताकि उनके भय का समापन हो और पितृ-कर्म में रुचि उत्पन्न हो।
अब, जो कर्मकांडी श्राद्ध शास्त्र के वास्तविक विशेषज्ञ बनना चाहते हैं, उनके लिए "सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" उत्कृष्ट पद्धति सिद्ध हो — ऐसा प्रामाणिक प्रयास किया गया है। वर्तमान काल में श्राद्ध कर्म के अनुष्ठान में जो अनेक विसंगतियाँ और भ्रांतियाँ उत्पन्न हो चुकी हैं (जिनमें से कुछ कलि के प्रभावस्वरूप भी हैं), उनका निराकरण करना परम आवश्यक है; और इस दिशा में यह एक सार्थक व सशक्त प्रयास किया गया है। साथ ही, यह ग्रंथ परवर्ती (आगामी) पीढ़ियों के लिए भ्रमों और दोषों का सम्मार्जन करने वाला सिद्ध होगा।
"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" में क्रिया-विधि आदि का सांगोपांग विस्तृत विश्लेषण करके इसे विद्वद्जनों हेतु मननयोग्य बनाया गया है। यदि निष्पक्ष भाव से मनन किया जाए, तो इसमें प्रस्तुत प्रमाणित तथ्यों को स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। किंतु, जो शास्त्रदस्यु, मदांध, दुराग्रही और अपंडित हैं — उनके दर्प का दलन भी इसमें स्पष्टतः किया गया है; क्योंकि ऐसे अपंडित मूर्खाचार्यों में बौद्धिक जड़ता होती है और वे सीमा से अधिक दुराग्रह का पालन भी करते हैं, इस कारण वे न्यूनतम सम्मान के योग्य भी नहीं होते।
निष्कर्षतः, यह पुस्तक एक ओर जहाँ कर्मकांडी को श्राद्ध कर्म का निष्णात विशेषज्ञ बना सकती है, वहीं दूसरी ओर श्राद्ध में व्याप्त विकृतियों व विसंगतियों का समूल निस्तारण भी करेगी। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो भी इसे आत्मसात करके श्राद्ध संपादित करेगा, उसके पितरों की क्षुधा एवं तृषा का पूर्ण निवारण होगा; और जो दुराग्रही बनकर शास्त्र-मर्यादा की उपेक्षा करेगा, वह अपने ही पितरों को दुःखित और व्याकुल करेगा।
भूमिका
“शास्त्र को यथार्थ रूप से न समझकर केवल वाद-विवाद करने वाले ही वास्तव में ‘शास्त्रदस्यु’ हैं।”
भूमिका में सर्वप्रथम विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज जो कि अनुज भ्राता के समान हैं का साधुवाद अनिवार्य है क्योंकि इस विषय के प्रस्तावक एवं संशोधन में अनेकानेक नहीं अपितु सर्वत्र सभी विषयों पर शास्त्रीय चिंतन करके भी सहयोग प्रदान किया। “अपात्रक श्राद्ध क्या है और क्या वर्त्तमान श्राद्ध अपात्रक है क्योंकि दक्षिणा तो कुशोदक पूर्वक दी जाती है” यही वो मूल प्रश्न गिरधारी जी का था जिसने मुझे इस विषय में चिंतन-मनन को बाध्य किया एवं “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” की पृष्ठभूमि बनी।
यद्यपि कई वर्षों से हम दोनों में मनभेद था किन्तु यह ईश्वरीय कृपा ही थी कि मनभेद समाप्त हो गया और इस पुनीत कार्य के प्रेरक भी वही बने एवं पग-पग पर सहयोग भी किया। मेरे लिये अकेले यह कार्य संभव नहीं था ऐसा मेरा स्वयं का मानना है इस कारण एक बार पुनः विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज का साधुवाद, स्नेह, “विजयी भव” शुभाशीर्वाद।
यहां गिरधारी जी के विषय में कुछ और भी स्पष्ट करना आवश्यक है; वर्त्तमान समय में शास्त्रार्थ करने में सक्षम विद्वान नहीं प्राप्त होते किन्तु मिथिला में बेगूसराय की भूमि ऐसे विद्वानों से रहित नहीं है एवं इस शक्ति से संपन्न व्यक्ति हैं गिरधारी जी। दुर्भाग्य उन अभागों का है जो जिले का होने के कारण अथवा आयु में अल्प होने के कारण द्वेषादिवश पहचान नहीं पा रहे हैं। पहचानने हेतु भी तो दृष्टि चाहिये न अभागों को यही तो नहीं होता। शास्त्रार्थ में समर्थ होने को प्रमाणित करते हुये मैं “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” के संबंध में यदि किसी को शास्त्रार्थ करने की इच्छा हो तो गिरधारी जी को अधिकृत कर रहा हूँ, एवं इसको स्वीकारना अस्वीकारना उनके विवेकाधिकार में होगा।
अब श्राद्ध में व्याप्त विसंगतियों-विकृतियों को संक्षेप में समझते हैं क्योंकि पुस्तक की उपयोगिता इसी से सिद्ध होती है :
महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र ने अपात्रक श्राद्ध में प्रेत दक्षिणा हेतु “यथानामगोत्राय“ को ही अंगीकार किया था किन्तु वर्त्तमान में उपलब्ध पद्धतियां आधार तो बताती हैं किन्तु इस विषय का खंडन किये बिना त्याग कर देती है। अपात्रक श्राद्ध तो किये जा रहे हैं किन्तु प्रेत श्राद्ध की दक्षिणा कुशोदक पूर्वक महापात्र को प्रदान किया जा रहा है जो अपात्रकत्व को खंडित करता है एवं सपात्रक भी नहीं है अस्तु यह एक बड़ी विकृति है। या तो सपात्रक विधि से श्राद्ध किये जायें अथवा अपात्रक विधि से जिसमें ऐसी सम्मिश्रण न हो की विकृति सिद्ध हो।
वाचस्पति मिश्र द्वारा परकीयभूमि में श्राद्ध होने पर भूस्वामि का अग्रभाग प्रारम्भ में ही त्याग स्वीकारा गया किन्तु विद्यमान श्राद्ध पद्धतियां में भोजन पूर्व इस प्रकार से प्रस्तुत कर दी गयी जिससे यह श्राद्ध का अंग बन गया। यह न ही श्राद्ध का अंग है और न ही स्वभूमि पर श्राद्ध होने में आवश्यक किन्तु श्राद्धांग स्वरूपवश घर में सांवत्सरिक श्राद्ध करने वाले भी भोजन से पूर्व भूस्वामि भाग प्रदान करते हैं। यह भी एक बड़ी विकृति है और सामान्य कर्मकांडी को भी इस विषय में चर्चा करते देखा जाता है किन्तु इसका निस्तारण कैसे होगा, मार्ग ही नहीं मिलता।
पूर्व काल में पात्रत्वाभाववश श्राद्ध को अपात्रक किया गया था, किन्तु प्रतिग्रहाधिकार सिद्ध होने के कारण उसका परिहार न करके ग्रहण किया गया था। साथ ही आद्यश्राद्ध के एकोद्दिष्ट में छत्र-उपानद्दान ग्रहण किया गया और व्यावहारिक रूप से गोदान भी प्रचलित है यद्यपि पद्धतियों में ग्रहण नहीं किया गया है। यह सपात्रक श्राद्ध विधान था । अपात्रक श्राद्ध के विषय में भी जो प्रामाणिक चर्चा की गयी है वह निःसंदेह अज्ञानान्धकार का नाश करने वाली है।
वृषोत्सर्ग एकादशाह के दिन अनिवार्य है यदि ऐसा कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी; असमर्थों को छोड़कर। किन्तु वर्त्तमान काल में वृष का उत्सर्ग करना लोकविरुद्ध सिद्ध होता है अस्तु वैकल्पिक मार्ग की आवश्यकता है। अर्थात जो समर्थ हैं उनके लिये तो वैकल्पिक मार्ग चाहिये ही अस्तु वृषोत्सर्ग का शास्त्र में जो वैकल्पिक मार्ग है वो भी संशोधन पूर्वक श्राद्धपद्धति का भाग बनना अनिवार्य है ताकि समर्थों को उचित मार्ग प्राप्त हो।
वेदमंत्रों में ऊह संबंधी विकृति पद्धतियों में भी द्रष्टव्य है। एक ओर तो ऊहपूर्वक मंत्र दिया भी गया है एवं दूसरी ओर टिप्पणि में ऊह का निषेध भी किया गया है, यदि निषिद्ध है तो ऐसा किये क्यों और यदि विहित है तो ऐसी टिप्पणी क्यों ? आप “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” में ऊह विवाद निस्तारण से भी चकित होंगे।
सांवत्सरिक श्राद्ध पितृ कर्म है, प्रेतकर्म नहीं किन्तु विशेष रूप से ब्राह्मणों के यहां इसमें महापात्र को ही आमंत्रित करते देखा जाता है। यह विकृति है श्राद्ध का तात्पर्य प्रेतकर्म नहीं होता। ये वास्तव में एक गंभीर व्यावहारिक विकृति है एवं इसके साथ ही और भी अनेकानेक व्यावहारिक विकार परिलक्षित होते हैं :
एकादशाह को देव-पितृ संबंधी ब्राह्मण श्राद्ध में कर्मकाण्ड, वेद, भागवत आदि कार्यों के लिये नियुक्त तो होते हैं किन्तु भोजन नहीं करते जो दोषपूर्ण है।
कई स्थानों पर अनावश्यक होने पर भी महापात्र को क्षौरार्थ बाध्य किया जाता है तो अधिकतम स्थानों पर आवश्यक होते हुए भी नहीं किया जाता, सर्ट-पैंट पहनकर भी कुशोदक ग्रहण करते देखने को मिलते हैं यहां तक भी देखा जाता है कि वस्त्र में भी म्लेच्छ वस्त्र मांगकर लेते हैं।
कोई भी श्राद्ध विहित काल में नहीं किया जाता, आद्यश्राद्ध तो सायाह्न में होता तो मासिक श्राद्ध पूर्वाह्ण में ही आरम्भ कर दिया जाता है और सपिण्डीकरण तो सायाह्न में ही किया जाता है । ये व्यावहारिक विकृतियां हैं व निस्तारण का प्रयास अपेक्षित है। यदि पूर्वाचार्यों के संशोधन होने पर भी कुछ विषय छूट गया तो उसका संशोधन ही नहीं हो सकता यह भ्रम है। यदि पूर्वाचार्यों ने कालानुसार प्रयास किया था तो वह मार्ग अवरुद्व न होकर वर्तमान में भी विद्यमान है।
श्राद्ध में प्रयुक्त पाक ही हलवाई आदि से नहीं बनवाया जा रहा यही बड़ी बात है इसके अतिरिक्त सभी भोज्य द्रव्य हलवाई द्वारा बनाना आरंभ नहीं प्रचलन बन गया है चाहे बेंती हो, व्यंजन हो या पूड़ी आदि । अधिकांशतः अग्राह्य दूध-दही-घृत का ही प्रयोग किया जाता है।
सपिण्डीकरण में आसन को लेकर विवाद बना ही रहता है और कई स्थानों पर प्रेत को मध्य में रखा जाता है। इसी प्रकार सपिण्डीकरण में एक ही वेदी बनाई जाती है जबकि प्रेत वेदी पृथक होना आवश्यक है। सपिंडीकरण में आसन क्रम के विवाद का भी प्रामाणिक रूप से निस्तारण किया गया है जो विद्वद्जनों के लिए चिंतन-मनन योग्य तो है किन्तु दुराग्रही-बकवादियों का केवल दर्पदलन ही उचित समझा गया है। सपिण्डीकरण में आसन क्रम को सुसंगत और प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर स्थापित किया गया है।
इसी प्रकार दर्भ का विषय पर भी ये दुराग्रही कभी चिंतन नहीं करते अपितु दर्भपिञ्जुलि पर भी विवाद मात्र करते हैं और “कुशेषूपविश्य”, “सपवित्रत्रिकुश” आदि पर इनकी प्रज्ञा कार्य ही नहीं करती यहां ऐसे विषयों का भी प्रामाणिक रूप से विचार किया गया है।
महापात्र को प्रेतोत्सर्जित भोजन आंशिक रूप से ग्रहण करने के लिये बाध्य किया जाता है जबकि श्राद्ध अपात्रक (नाम से) है। भोजन में परोसे जाने वाले अन्न का उष्ण होना अनिवार्य है कितने मूर्खाचार्य इसका उल्लंघन नहीं करते?
यावदूष्मा भवत्यन्ने यावदश्नन्ति वाग्यताः । तावदश्नन्ति पितरो यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
विष्णुस्मृति/८१/२१, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/१/१४०/४५
श्राद्ध में उत्सर्जित द्रव्य और दान सामग्री का विवाद तो बड़ी समस्या बनती जा रही है, महापात्र से पुरोहित हरण कर रहे हैं तो पुरोहित से नापितादि । इसी प्रकार और भी अनेकानेक विकार विद्यमान है एवं सुधार की दिशा में प्रयास अपेक्षित है परिणाम (फल) में तो अधिकार ही नहीं होता वो दैवाधीन ही रहता है ।
वर्तमान काल में लोगों की सोच भी विकृत हो गई है वो फल (परिणाम) में तो अधिकार स्थापित करना चाहते हैं किन्तु दायित्व निर्वहन से मुक्तिपूर्वक; इसी कारण अधिकांश विकारों की चर्चा सामान्यतः सर्वत्र होती ही रहती है किन्तु प्रयास कोई नहीं करते। यदि समस्या है और विदित भी है तो उसके निवारण का मार्ग ढूंढना चाहिए एवं प्रयास भी करना चाहिए, इस अपेक्षा का परित्याग करके कि फल प्राप्त होगा ही । मनुष्य को स्वयं के दायित्व का ही निर्वहन करना चाहिए न कि दैव को दायित्व का स्मरण दिलाना।
एक बड़ी समस्या जो कि सबसे बड़ी है वो यह कि समस्यायें जानते भी हैं, समाधान चाहते भी हैं, हम समर्थ नहीं यह भी ज्ञात रहता है अर्थात् हम नहीं कर सकते जानते हुए भी किसी दूसरे को भी करने नहीं देंगे क्योंकि श्रेय तो उसी का हो जाएगा। दूसरे को श्रेय प्राप्त न हो जाय ऐसी मानसिकता स्वयं ही एक बड़ी समस्या है जो समाधान के मार्ग को अवरूद्ध करती है।
यह मेरा अनुभव है यद्यपि संवाद करने वालों को यह विदित होता है कि मेरा शास्त्रज्ञान उससे कई गुणा अधिक है किन्तु जब कोई विषय उठे तो बकवास करने की भी व्यग्रता रहती है ऐसा एक बार भी नहीं सोच पाते कि तनिक धैर्य से श्रवण करने पर अनेकानेक रहस्योद्घाटन होंने लगेगा, ज्ञान की वृद्धि ही होगी । किसी को धनमद तो किसी को पद (मास्टर/प्रतिष्ठित आदि होने का), तो किसी को वयाधिक्यता का भी अहंकार रहता है । यह समझ ही नहीं पाते कि इसका कोई औचित्य नहीं है वास्तविक औचित्य ज्ञान ही रखता है।
उदाहरण स्वरूप इस पुनीत कार्य में सहयोगी गिरधारी जी द्वारा उक्त प्रश्न दो बार आया, यदि हम अहंकार और दुराग्रह पूर्वक प्रश्न को खंडित करते तो आज यह अमृत ही प्राप्त नहीं होता इसलिए सभी पंडित को श्रवणीय शक्ति का विकास करना चाहिए एवं वाचालत्व का परित्याग।
अनिन्द्या ब्राह्मणा गावः कांचनं सलिलं स्त्रियः। पृथिवी तु षडेतानि यो निन्दति स पातकी ॥
स्कन्दपुराण/(७) प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्य/२२/८०
यदि कोई श्रेष्ठ ज्ञाता मिलें तो प्रश्नमात्र करके मौन धारण करना अनिवार्य होता है। यह तथ्य अहंकार प्रदर्शन करने वाला भी प्रतीत होता है किन्तु यह व्यावहारिक समस्या पहचान करने के लिये अनुभव सिद्ध तथ्य है और यही कारण है कि ऐसे लोगों को बारम्बार धिक्कारा-दुत्कारा गया है, अपण्डित-मूर्खाचार्य-धूर्ताचार्य-मूढ शास्त्रदस्यु इत्यादि शब्दों के प्रयोग में किंचित भी विचार नहीं किया गया निःसंकोच भाव से कहा गया है। यद्यपि यह पुस्तक रूप में तत्काल प्रकाशित नहीं होने जा रहा है तथापि हमारी इच्छा तो यही है कि जब पुस्तक प्रकाशित हो तो उसमें से इन दुत्कारों-धिक्कारों को हटा दें किन्तु इसकी सिद्धि होने पर कि “सुधार आरम्भ कर दिया गया।”
इस प्रकार से मुर्खाचार्यादि शब्दों से दुत्कारना-धिक्कारना मुझे दोषपूर्ण भी प्रतीत होता है किन्तु विचार करने पर ज्ञात होता है कि यह द्वेष भाव से नहीं किया जा रहा है अपितु उपकार भाव से ही किया जा रहा है। साथ ही शास्त्र में भी ऐसों को शास्त्रदस्यु कहा गया है, ये तथ्य समझा रहा हूँ कि शास्त्रदस्यु क्यों बन रहे हो। सुधार हो; इस विषय को ध्यान में रखकर तिक्त ओषधि का प्रयोग किया गया है निंदा भी नहीं की गयी है और न ही द्वेषपूर्वक किया गया है। तथापि स्वस्थ हो जायें तो इसकी आवश्यकता ही न रहे और पुस्तक में ऐसे शब्द न अंकित करना पड़े मेरी इच्छा है; किन्तु स्वस्थ हों जाये तो।
शास्त्रं ह्यबुद्ध्वा तत्त्वेन केचिद्वादबलाज्जनाः। कामद्वेषाभिभूतत्वादहंकारवशं गताः॥
यथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः। ब्रह्मस्तेना निरारम्भा अपक्वमनसोऽशिवाः॥
महाभारत/शांतिपर्व (१२)/२७५/५२-५३
इस प्रकार यह निंदा न होकर शिक्षा है और रूचि के अभाव का निवारण करने के लिये कटुशब्दों का प्रयोग किया गया है, परवर्तियों को शास्त्रदस्यु बनने से रोकने का प्रयास है। यह परवर्तियों का ध्यान उन अग्राह्य आचरण और व्यवहार पर आकृष्ट करेगा और त्याग का विवेक प्रदान करेगा। यदि समकालीन भी शास्त्रीय मर्यादा से मर्यादित होकर विचार करेंगे तो उनके लिये भी आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा व उनके पितरों को जो तृषा-क्षुधा से संतप्त हैं तृप्ति प्रदान करके प्रसन्न करेगा।
मूर्खाचार्य सिद्धि : इनका मूर्खाचार्य होना सिद्ध करने का भी विषय है जो इनके व्यवहार से ही सिद्ध होता है और उनको उद्धृत करना आवश्यक है। मैथिल परम्परा में “इहागच्छ इहतिष्ठ” का प्रयोग स्वीकारा गया है यह भी प्रामाणिक है। यही मैथिलेत्तरों हेतु अनुकरणीय का उत्तम उदाहरण है कि धर्म का निर्णय मिथिला के व्यवहार को देखकर करो, “आवाहयामि-स्थापयामि-पूजयामि” भी प्रामाणिक ही है किन्तु मिथिला के मनीषियों ने “इहागच्छ इहतिष्ठ” को अंगीकार किया तो यही उचित निर्णय है। मिथिला ने “न मम” को भी नहीं स्वीकारा है इसके पीछे भी सूक्ष्म विवेक है कि “न मम” जिसके लिये कह रहे हैं उसके अतिरिक्त तो “मम” सिद्ध हो जाता है।
इसी प्रकार मिथिला में मुख्य विषय को ग्रहण करने की बुद्धि अर्थात “नीर-क्षीर विवेक” रही है एवं अनावश्यक विस्तार की परंपरा नहीं रही है जैसे ढेरों वेदियां बना लेना, मुख्य कर्म से पूर्व अंगभूत कर्मों में ही अधिक काल नष्ट करना आदि। किन्तु मूर्खाचार्यों में ये सभी दोष विद्यमान हैं और यत्र-तत्र दृष्ट हैं। ज्ञान तो प्राप्त नहीं किया किसी प्रकार रुद्री पाठ करना, महामृत्युंजय जप करना सीख लिया और धीरे-धीरे अक्षत-फूल चढ़ाना सीख लिया अज्ञानवश “इहागच्छ इहतिष्ठ” के स्थान पर “आवाहयामि-स्थापयामि-पूजयामि” का प्रयोग कर रहे हैं, “न मम” का भी प्रयोग कर रहे हैं, कर्मकांड के आरम्भ में ही समय नष्ट कर देते हैं एवं मुख्य भाग अभिषेक को २५ – ३० मिनट में संपन्न कर देते हैं भजन जितना अधिक कर लें।
वेदियों के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं कब-कहां-कौन वेदी बनाई जाय या नहीं, रुद्राभिषेक और पार्थिव पूजन में भी मातृका वेदी सहित अन्यान्य ढेरों वेदियां बनाकर पांडित्य के अहंकार से मदमस्त हो रहे हैं। विचारणीय विषय का ज्ञान तक नहीं है, किसी अन्य से ज्ञात होने पर भी अस्वीकार करने की प्रवृत्ति बन चुकी है और “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” के विषय में भी ऐसा ही संभावित है एवं इसी कारण ऐसे लोगों की ही भर्त्सना मूर्खाचार्य कहकर की गई है। ये उनके ऊपर ही निर्भर करेगा कि वो इसी को सिद्ध करते हैं अथवा खंडित करेंगे ?
आग्रह तो विद्वज्जनों से ही किया जायेगा कि प्रस्तुत स्वरूप में (यद्यपि कुछ विसंगतियां मतिपूर्वक भी छोड़ी गई हैं) जो कुछ भी त्रुटि-विसंगति है उसके प्रति ध्यानाकर्षण करें । जो शास्त्रविरुद्ध हो उसका प्रामाणिक खंडन करें स्वगतोत्सुक हूं और शास्त्रसम्मत तथ्य को उनके नाम, छवि आदि सहित आदरपूर्वक स्थान दिया जाएगा । जो अल्पज्ञ पांडित्यमद धारण करने वाले हैं उनको यही कहूंगा कि सुधार करें और पुस्तक में (जब प्रकाशित हो) मूर्खाचार्यादि पद न रहे ऐसा प्रयास करें।
अर्थात् यदि खंडन नहीं कर सकते तो जो शास्त्र से सिद्ध किया गया है वह स्वीकार्य ही होता है, प्रामाणिक रूप से आप खंडन करने का सामर्थ्य ही नहीं रखते और स्वीकारने में अहंकार रोकता है तो तीसरा मार्ग कर्मकाण्ड का ही त्याग बचता है। विकृतियां इस प्रकार व्याप्त हैं कि यदि स्पष्ट संदेश न दिया जाए तो कोई गंभीरता से लें भी न बस बकवाद करें । बकवाद का अवसर ही नहीं दिया जा रहा है सामर्थ्य है तो प्रामाणिक रूप से खंडन करें यदि प्रामाणिक रूप से प्रतिखंडित नहीं होगा तो स्वीकार किया जायेगा।
यदि मैं इस प्रकार शास्त्र सिद्ध को स्वीकारने की घोषणा करता हूं अर्थात् बाध्यता से भिज्ञ हूं तो आपको भी वो बाध्यता विदित हो कि आप भी शास्त्र के प्रति बाध्य हैं । सामान्य पुरोहित वर्ग और जो सामान्य ज्ञान रखने वाले निरहंकारी हैं उनको बस खंडन-मंडन पर ध्यान केंद्रित करने के लिये कहूंगा । यदि कोई इस प्रकार स्पष्टरूप से खंडन की मांग करने पर भी खंडित नहीं करते तो स्वतः ही शास्त्रसम्मत सिद्ध हो जायेगा, किसी के मान्यता, मंडन आदि की अपेक्षा ही नहीं है। जब खंडन न हो तो आपके लिए स्वीकार्य होगा, आप अपनी शंका-प्रश्न निःसंकोच होकर व्यक्त करें शंका समाधान का भी हर संभव प्रयास किया जायेगा।
किन्तु जो गाल बजाने वाले मूर्खाचार्य बकवास करें तो उससे स्पष्ट कहें सामर्थ्य है तो प्रामाणिक रूप से खंडन करके संदेश भेज दो। निश्चित रूप से स्वीकार होगा अथवा प्रतिखंडन होगा, मूर्खाचार्य मत बनो । यदि खंडन नहीं कर सकते हो तो सही है और स्वीकार्य है ऐसा कहो। धर्म का ज्ञान शास्त्र से ही होता है धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म की रक्षा के लिये उससे पूर्व शास्त्र की रक्षा अनिवार्य है। रक्षा का तात्पर्य धर्म या शास्त्र का अस्तित्व संकट में है इस भाव से न होकर स्वयं के लिये बचाये रखना होता है।
प्रत्येक गांव में तो नहीं कहा जा सकता किन्तु हर क्षेत्र में विद्वान भी होते हैं, सामान्य ज्ञान रखने वाले भी होते हैं और ऐसे बकवादी मूर्खाचार्य भी होते हैं। विद्वानों की शास्त्र में निष्ठा होती, सामान्य ज्ञान रखने वालों की विद्वानों में किन्तु विद्वानों में श्रद्धा का ही अनुचित लाभ ये बकवादी मूर्खाचार्य भी उठाते रहते हैं। विद्वानों से भी यही निवेदन है कि ऐसे बकवादी मूर्खाचार्यों को उनकी वास्तविकता से अवगत करा दें अर्थात् प्रामाणिक खंडन करने के लिये कहें अथवा स्वीकार करने को प्रेरित करें ।
चेतावनी : वो अपण्डित वर्ग जिसे श्राद्धविषयक कुछ भी शास्त्रीय ज्ञान नहीं है केवल नामधारक ब्राह्मण होने और किञ्चित रूप से “येन-केन-प्रकारेण” श्राद्ध करा लेते हैं वो लोग इस विषय में किसी भी प्रकार से विमर्श की अर्हता धारण ही नहीं करते। इस वर्ग की त्रुटि यह है कि अहंकारवश विद्वानों से विचार भी नहीं करेंगे कि कितना उचित-कितना अनुचित, स्वयं शास्त्रीय दृष्टि से रहित होते हैं किन्तु लब्धप्रतिष्ठ होने के कारण प्रतिष्ठा संरक्षण हेतु ही व्यग्र रहते हैं। ऐसे लोगों को आप यत्र-तत्र निष्कर्ष देते पायेंगे किन्तु जब सार्वजानिक रूप से खण्डन-मण्डन का प्रस्ताव दिया हुआ है तो भी कुछ शास्त्रीय आधार लेकर लिखित रूप से प्रस्तुत नहीं कर सकते। ऐसे अपण्डितों के लिये केवल इतना ही सन्देश पर्याप्त है कि स्वयं की सीमा का आकलन करते हुये अन्य विद्वानों का आश्रय लेकर जहां शास्त्रीय दृष्टि से विरोधाभास है उसको प्रकट करें और प्रामाणिक रूप से सिद्ध करके लिखित रूप से प्रस्तुत कराने का प्रयास करें। इस वर्ग की भर्त्सना इस कारण अपेक्षित है क्योंकि यही वर्ग है जो धरातल पर विद्वानों को मौन धारण करने के लिये बाध्य किया करता है।
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥
मनु स्मृति/९/३१७
देश भर में जो ब्राह्मणों के विरुद्ध वातावरण निर्मित हो रहा है उसके एक प्रमुख कारक ऐसे मूर्खाचार्य भी हैं । विद्वान ब्राह्मण ही नहीं अल्पज्ञ में भी आमजन श्रद्धा रखता है ये मूर्खाचार्य ही उसकी श्रद्धा का अनुचित लाभ लेकर हनन करते हैं, ये दुत्कार के ही अधिकारी हैं । इनके कारण समस्या बढ़ती जा रही है और पीड़ित सामान्य ज्ञान रखने वाले होते हैं एवं ठगा यजमान जाता है। सम्मान के अधिकारी ज्ञानी होते हैं ऐसे मूर्खाचार्य नहीं।
“सुगम श्राद्ध विधि” पुस्तक की बात करें अथवा यहां जो विधि दी गयी है वो पूर्वकालिक व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है। श्राद्ध कर्म में बहुशः विकृतियां व्याप्त हो गयी है जिसका दुष्परिणाम यह है कि सभी पितृदोष के भाजन बन रहे हैं, पितृकोप से पीड़ित हैं। पूर्वाचार्य भी समय-समय पर संशोधन-परिष्करण करते रहे हैं और जो विकृतियां वर्त्तमान में हैं उसे संशोधित करने हेतु पूर्वाचार्य नहीं आने वाले ये वर्त्तमान में जो उपस्थित हों उन्हीं का दायित्व होता है।
किसी भी काल में उपस्थित सभी विद्वद्जन यही कार्य नहीं करते अपितु यह सौभाग्य कुछ कृपाप्राप्त को ही मिलता है। कृपाप्राप्त को ही दायित्व प्रदान किया जाता है और वर्त्तमान काल में यह दायित्व मैंने (मिथिला हेतु) ग्रहण किया है, मैथिलेत्तरों हेतु तो मिथिला के शिष्टविद्वद्जनों का व्यवहार ही निर्णय कहा गया है। अस्तु हमने श्राद्धकर्म को संशोधित करने का दायित्व ग्रहण किया। इस दायित्व का निर्वहन करते हुये अनेकों ऐसे प्रश्न भी उत्पन्न हुये जिसके विषय में पद्धतिकारों ने मौन धारण कर रखा है। यहां मौन का त्याग करके स्पष्ट रूप से ऐसे सभी प्रश्नों का निष्कर्ष भी दिया गया है। यद्यपि एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विस्तार भय से अनेकों विषय के संक्षिप्त उत्तर और प्रमाण ही प्रस्तुत किये गए हैं किन्तु उन विषयों की प्रामाणिक चर्चा “सम्पूर्ण कर्मकांड विधि” - “https:// karmkandvidhi.in/” पर की गयी है और वहां अवलोकन किया जा सकता है।
॥ उद्गारः ॥
संशोधन प्रस्तावक - विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज
आयुः प्रज्ञां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्ये प्रीता नृणां पितामहाः ॥
(श्राद्ध कल्पलता - याज्ञवल्क्लस्मृति)
सनातन वाङ्मय की पावन परिधि में “श्राद्ध” केवल एक लौकिक अनुष्ठान या कुल-परम्परा मात्र नहीं हैं, अपितु यह विदेह पितरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक परम पवित्र, अपरिहार्य और 'ऋणत्रय' (देव, ऋषि, और पितृ ऋण) से मुक्ति का आध्यात्मिक महायज्ञ है। श्रुति-स्मृति के महावाक्य सघोष प्रमाणित करते हैं कि श्रद्धा की सात्विक अंतः सलिला से पूरित कर्म ही श्राद्ध की संज्ञा पाता है : “श्रद्धया दीयते यस्मात् श्राद्धं तेन प्रकीर्तितम्"
शास्त्रीय मान्यता है कि दिव्य देव शक्तियों की अपेक्षा पितरगण अतिशीघ्र आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) होते हैं। गरुड पुराण में भी इस तथ्य को परम पुष्ट करते हुए कहा गया है कि - “न हि धन्यातिगा काचित् पितृभक्तेर्गरीयसी” (अर्थात इस चराचर जगत में पितृभक्ति से बढ़कर कल्याणकारी एवं श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। उनकी सद्यः प्रसन्नता से ही मानव कुल में दीर्घायु, प्रज्ञा, अक्षय धन, परा-अपरा विद्या, ऐश्वर्य और अंततः मोक्ष की प्राप्ति सुलभ होती है।
किन्तु अत्यंत क्षोभ और चिंता का विषय है कि वर्तमान समय में बढ़ते सामाजिक अपसंस्कारों, कुरीतियों और कतिपय आधुनिक पद्धतिकारों के प्रमाद (अज्ञान व असावधानी) के कारण इस परम पवित्र अनुष्ठान में गंभीर शास्त्रीय विकृतियां आ गई हैं। विशेषकर “सपात्रक” और “अपात्रक” विधानों का जो भ्रामक सम्मिश्रण (खिचड़ी) धड़़ल्ले से किया जा रहा है, उसने श्राद्ध की मूल आत्मा और उसकी फलश्रुती को आहत किया है।
इस शास्त्रीय मर्यादा के ह्रास से व्यथित होकर, इस ग्रंथ के संशोधन प्रस्तावक के रूप में मैं (विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज) अनेक लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों के द्वार खटखटाए, उनसे संवाद स्थापित करने तथा इस विकृति के परिमार्जन का भगीरथ प्रयास किया। किंतु काल की बिडंबना रही कि वहां से केवल विफलता और उदासीनता ही हाथ लगी। तत्पश्चात दैवयोग और भगवत्कृपा से किसी अन्य विषय (संक्रान्ति निर्णय) आदि को लेकर, पूर्वपरिचित एवं “सुगम श्राद्ध विधि” पद्धतिकार पण्डित दिगम्बर झा जी से उनके आवास पर मिलन हुआ। इसी क्रम में उन्हें इस गंभीर शास्त्रीय संकट और विकृतियों से अवगत कराया। तदनंतर, हम दोनों ने अनेकानेक प्रमाणिक ग्रंथों, स्मृतियों, पुराणों एवं विशेष रूप से महामहोपाध्याय पंडित रुद्रधर झा कृत “श्राद्ध विवेक” और महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र कृत पद्धति आदि कालजयी स्मृतियों व निबंध-ग्रंथों का गहन अनुशीलन और मंथन किया।
अंततः शास्त्रों के मूल सत्यों पर हमारे विचार एकाकार हुए, मतैक्य हुआ और उसी अनवरत शास्त्रीय मंथन के अमृत परिणामस्वरूप आज यह “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” नामक श्राद्ध पद्धति अपने मूर्त रूप में आपके सम्मुख प्रतिष्ठित है। इस पद्धति की सबसे महती विशेषता और वज्र-सदृश सुदृढ़ आधार यह है कि इसमें धर्मशास्त्र के दैदीप्यमान नक्षत्र महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र के अकाट्य सिद्धांतो तर्कों और उनके सार्वभौमिक शास्त्रीय मतों का आश्रय लिया गया है।
जैसा कि भगवान मनु ने मनुस्मृति में विधि और काल की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए निर्देश दिया है - यस्मिन्नहनि यच्छ्राद्धं तदहर्न व्यतिक्रमेत् - अर्थात् देश, काल और पात्र की शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन किए बिना, निर्दिष्ट तिथि (समय/काल) पर किया गया शास्त्रोक्त कर्म ही अभीष्ट सिद्धि और पितृ-तृप्ति कारक होता है। महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र का “अपात्रक श्राद्ध” संबंधि शास्त्र चिंतन इसी सूक्ष्मता और प्रामाणिकता को रेखांकित करता है; जिसके सम्यक् समावेश से यह नवीन पद्धति सर्वथा निर्दोष, सुग्राह्य और सिद्ध होगी ।
इस गौरवमय ग्रंथ के संशोधन प्रस्तावक के रूप में, जब मैंने इस पद्धति की मूल विषय-वस्तु, इसके पाठ्य और इसकी शास्त्रीय अन्विति का गहन अनुशीलन किया, तो मुझे यह देखकर अतीव संतोष हुआ कि इसमें रूढ़िवादिता और आधुनिक भ्रांतियों का समूल उच्छेदन करते हुए शास्त्र मर्यादा का अक्षुण्ण पालन किया गया है। पंडित दिगम्बर झा जी का यह संपादन कार्य श्लाघनीय और वंदनीय है। जिन्होंने सनातन की मूल आत्मा को सुरक्षित रखते हुए इसे वर्तमान समय के लिए अत्यंत व्यावहारिक और उपयोगी स्वरूप प्रदान किया है।
मेरा यह दृढ और अकाट्य विश्वास है कि यह पद्धति न केवल कर्मकांड के मर्मज्ञ विद्वानों, वेदपाठी पुरोहितों और आचार्यों के लिए एक “प्रामाणिक दिग्दर्शिका” (मार्गदर्शक ग्रंथ) सिद्ध होगी, बल्कि उन सभी सनातनी जिज्ञासुओं और गृहस्थों का भी परम कल्याण करेगी अपने पूर्वजों की आत्मिक तृप्ति और अक्षय लोक प्राप्ति हेतु इस मार्ग पर अग्रसर है।
इस पवित्र और युगांतरकारी ग्रंथ के सफल प्रकाशन (तत्काल PDF) पर मैं अंतःकरण से अत्यंत हर्ष और संतोष व्यक्त करता हूँ और भगवच्चरणारविंदो में सांष्टांग प्रार्थना करता हूँ कि यह कालजयी कृति संपूर्ण जगत के कल्याण, लोक-संस्कारों के संवर्धन और सनातन धर्म की रक्षा में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करे।
सुसिद्धं विधिवच्छ्राद्धं, पितॄणां तृप्तिदायकम्। श्रद्धया क्रियते यस्मात्, तस्माच्छ्रेयस्करं परम्॥
॥ श्रीमन्नारायण ॥ राधे राधे ॥
विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” में प्रयुक्त कटु शब्द (जैसे मूर्खाचार्य, धूर्ताचार्य, शास्त्रदस्यु) किसी व्यक्ति विशेष के प्रति द्वेषवश नहीं, अपितु शास्त्रों की मर्यादा नष्ट करने वाले आचरण के प्रति ‘तिक्त ओषधि’ (कड़वी दवा) के रूप में प्रयुक्त हुए हैं, उद्देश्य केवल शुद्धि और परिष्करण है। इस ग्रंथ के शास्त्रीय निष्कर्षों पर प्रामाणिक और शास्त्रसम्मत खंडन का सदैव स्वागत है। इस आलेख के विश्लेषण और मौलिक संयोजन पर लेखक का वैधानिक बौद्धिक संपदा (कॉपीराइट) अधिकार सुरक्षित है। पुस्तक को शास्त्रीय दृष्टि से युक्त करके सम्पादित किया गया है किन्तु प्रयोग मतिपूर्वक स्वयं ही करना होता है।
त्रुटि-विसंगति आदि का विचार करके तदनुसार उचित-अनुचित निर्णय विद्वद्जन स्वयं ही करें। यदि कहीं बाध्यकारी पद भी प्रयुक्त है तो उसका तात्पर्य शास्त्र से सिद्ध निर्णय बाध्यकारी होते हैं ऐसा है न कि पुस्तक में मेरा निर्णय बाध्यकारी है। मेरा व्यक्तिगत निर्णय किसी व्यक्ति विशेष हेतु प्रत्यक्ष रूप से ही हो सकता है। पुस्तक के आधार पर विद्वद्जनों को निर्णय लेने में सहायता होगी न कि निर्णय दिया गया है।
विकृतियों को सर्वत्र स्पष्ट रूपेण उजागर किया गया है जिसका उद्देश्य सुधारात्मक प्रयास है किन्तु अविवकेकियों के लिये स्वीकार या अस्वीकार करना, उचित वा अनुचित सिद्ध करना संभव नहीं होता किन्तु एक दुस्साहस देखने को मिलता है जो पाण्डित्याहंकारवश प्रकट होता है ऐसे अपण्डितों के लिये अनेकानेक कटुशब्द प्रयुक्त किये गये हैं जो पंडितजन स्वयं के लिये ग्रहण न करें एवं पण्डितजनों से क्षमायाचना भी करता हूँ।
त्रुटियां - कोई कितना भी सजग रहे त्रुटि न करे ऐसा घटित होना दुष्कर है, उसमें भी मेरे जैसे अल्पज्ञों के लिये तो पग-पग पर त्रुटि संभावित ही है। जहां कहीं किसी प्रकार का त्रुटि देखने को मिले विद्वद्जन स्वविवेक पूर्वक सम्मार्जन करें और सुझाव-परामर्श प्रदान करके अनुगृहीत भी करें।
प्रयोग : प्रस्तुत संस्करण का प्रयोग विवेकीजन सहजता से कर सकते हैं किन्तु जो मतिभ्रष्ट अविवेकी आज भरे पड़े हैं उनको यह गंभीरता से सीखना और समझना आवश्यक होगा अन्यथा और विसंगति ही उत्पन्न करेंगे क्योंकि अविवेकी होते हुये भी कोई अपनी बुद्धि लगाने से वंचित नहीं रहता।
