पार्थिव पूजनं – निर्माण
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार


बहुत लोगों के लिये ये आश्चर्य का विषय हो सकता है कि पार्थिव शिवलिंग निर्माण के लिये मिट्टी को लाने का भी विधान है। मिट्टी ही तो लाना है यह भाव त्याग करके यदि विधान को समझा जाय एवं पूरी प्रक्रिया विधिपूर्वक करी जाय तो अत्यधिक शुभफल की प्राप्ति संभव है। हम मृदाहरण के महत्वपूर्ण नियम और विधियों को भी समझेंगे।
पार्थिवलिङ्गविधानं बालगणेश्वरमन्त्रश्च
अथ पार्थिवलिङ्गस्य विधानमभिधीयते ॥
स्नातो नित्यं विधायादौ गत्वा शुद्धां भुवं सुधीः।
उपरिष्टामपाकृत्य षडणेनाधिमन्त्रयेत् ॥
आकाशः पृथिवीरोषस्थितो बिन्दुसमन्वितः ।
पथिवी तु चतुर्थ्यन्ता नमोऽन्तः स्यात्षडर्णकः ॥
ततो मृदमुपादाय कृत्वा निःशर्करां ततः ।
पात्रे निदध्यात् संशुद्धे प्रत्यहं पूजनाय ताम् ॥
सुदिने सद्गुरोर्मन्त्री गणेश्वरकुमारयोः।
हराद्याश्च मनून्सप्त गृह्णीयाद्यागसिद्धये ॥
अथार्चनं शुभे घस्त्रे आरभेतेष्टसिद्धये ।
कृत नित्यक्रियः शुद्धः प्रदायाऱ्या विवस्वते ॥
मृदमादाय तोयेन सुधया मन्त्रितेन च ।
आसिञ्च्य पिण्डये स्वेष्टमानां पात्रे निधापयेत् ॥
मृदाहरण
पार्थिव पूजन के लिये मृदाहरण का भी विधान है, जिस मिट्टी से पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करना हो उसको विशेष पवित्रता पूर्वक ग्रहण करे यह आवश्यक होता है। मृदाहरण करने के लिये स्नानादि भस्म, रुद्राक्ष धारण करे, उत्तर दिशा की ओर शमी, पीपल आदि वृक्षमूल अथवा अन्य पवित्र (जो पत्थर, बांस, कीड़े, केश, अस्थि,बालू दोषों से रहित हो) स्थान से मिट्टी लेने जाये। मृदाहरण में भी जूते-चप्पल आदि न पहने। सर्वप्रथम पृथ्वी को पुष्पादि अर्पित करे और प्रार्थना करे कि शिवपूजन के लिये मैं मृदा आहरण करूँगा। सर्वप्रथम भूमि की प्रार्थना करे –
ॐ सर्वाधारे देवि त्वद्रूपां म्रुत्तिकामिमाम।
ग्रहीष्यामि प्रसन्ना त्वं लिंगार्थं भव सुप्रभे॥
तत्पश्चात इस मंत्र से भूमि (मिट्टी) को अभिमंत्रित करे : ॐ ह्रां पृथिव्यै नम:॥
पूजन : “ॐ हराय नमः” मंत्र से गन्धपुष्पादि अर्पित करते हुये पूजा करके ईशानकोण से अगले मंत्र को जपते हुये मिट्टी ग्रहण करे। मिट्टी ग्रहण करने का मंत्र :
ॐ उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके त्वां च गृह्णामि प्रजया च धनेन च॥
फिर न्यूनतम ८ अंगुल ऊपर की मिट्टी हटाकर मृत्तिका ग्रहण करे। मृत्तिका लेकर वापस आते समय मौन रहे, किसी अपवित्र व्यक्ति से वार्तालाप आदि भी न करे।
इस प्रकार पार्थिव पूजन हेतु शुद्ध मिट्टी को भी पूर्व में ही ग्रहण करके उसे महीन चूर्ण बनाकर, कंकर आदि ध्यानपूर्वक छान कर हटा दे। फिर किसी पात्र आदि में संचित करके या पिंड बनाकर शुद्ध स्थान (पीठादि) पर रख ले। इस प्रकार से संचित मिट्टी से ही शिवलिंग का निर्माण करे; न कि शीघ्रता पूर्वक कहीं से भी किसी प्रकार की मिट्टी लेकर बिना कंकर आदि निकाले।
शुद्ध कंकर आदि रहित जितनी मिट्टी उपलब्ध हो सके उतने से ही पार्थिव बनाये। वर्त्तमान में एक व्यवहार देखा जा रहा है मिट्टी की शुद्धता का विचार किये बिना लाखों शिवलिंग बनाकर पूजा करना जो शास्त्रोचित नहीं है। मिट्टी में एक विशेषता और होती है वो है यदि उपलब्ध हो तो गंगा जी की मिट्टी मिश्रित करना।
एक प्रश्न : उपरोक्त विधि से मृदाहरण में समस्या क्या है जो विधि का पालन नहीं करते ?
यदि ऐसा कोई कारण नहीं मिलता तो दूसरा प्रश्न स्वयं से करना चाहिये :
दूसरा प्रश्न : ऐसा क्या कारण है कि शास्त्रोचित विधान का पालन नहीं करना चाहते हैं ?
शिवलिंग की संख्या का निर्धारण भी कामना के अनुसार निर्धारित किया जाता है। ये आवश्यक नहीं है कि सभी कामनाओं के लिये विधि का पालन किये बिना सवालाख शिवलिंग का निर्माण करें ही करें। उचित विधि से ग्रहण की गयी मिट्टी पर्याप्त मात्रा में हो तो सवालाख शिवलिंग का निर्माण-पूजन करे, किन्तु यदि शुद्ध मिट्टी कुछ सौ/सहस्र लिंग निर्माण करने के लिये ही उपलब्ध हो तो कामना के अनुसार उतनी मिट्टी में बनने योग्य संख्या का ही ग्रहण करे। विभिन्न कामनाओं के लिये शिवलिंग की संख्या के विषय में यह प्रमाण प्राप्त होता है :
दैशिकात्सकलं ज्ञात्वा कुर्य्यालिङ्गफलप्रदम् ।
विद्यार्थी लिंगसाहस्रं धनार्थी च तदर्द्धकम् ॥
पुत्रार्थी सप्तसाहस्रं कन्यार्थी तु शतत्रयम् ।
वन्ध्या लिगायुतं कुर्यात्सर्वपापहरं शुभम् ॥
राज्यार्थी शतसाहस्रं कांतार्थी शतपञ्चकम् ।
मोक्षार्थी कोटिगुणितं भूकामश्च सहस्रकम् ॥
रूपार्थी तु त्रिसाहस्रं तीर्थार्थी द्विसहस्रकम् ।
सुहृत्कामः सहस्रं स्याद्वस्त्रार्थी शतमष्टकम् ॥
मारणार्थी सप्तशतं मोहनार्थी शताष्टकम् ।
उच्चाटनपरश्चैव सहस्रं तु यथोक्तवत् ॥
स्तम्भनं तु सहस्रेण जारणं च तदर्द्धवत् ।
निगडान्मुक्तिकामस्तु सहस्रं सार्द्धमीरितम् ॥
महाराजभये पञ्चशतं चौरादि संकटे ।
शतद्वयं च डाकिन्या भये पञ्चशतं परम् ॥
दरिद्रः पञ्चसाहस्रमयुतं सर्वकामदं ॥
इस प्रकार उपरोक्त प्रमाणों से यह भी स्पष्ट होता है कि पार्थिव संख्या का निर्धारण करने के विषय में मतिभ्रम होता है और केवल संख्या को अधिक करने वाली सोच रखकर पूजा करते हैं अपने सामर्थ्य के अनुसार एक ही दिन में सवा लाख तक पार्थिव पूजन करते हैं किन्तु सवालाख में से एक भी पार्थिव के लिये नियम और विधि-विधानों का पालन नहीं करते।
निर्माण
यहां हम केवल निर्माण विधि को समझने का प्रयास कर रहे हैं, इसका यह तात्पर्य ग्रहण नहीं करना चाहिये की सर्वप्रथम पार्थिव का निर्माण ही किया जायेगा। ये चर्चा पूजन प्रकरण में अनावश्यक विस्तार न हो मात्र इस विचार से प्रथम कर रहे हैं।
मृदाहरणसंघट्टप्रतिष्ठाह्वानमेव च ।
स्नपनं पूजनं चैव विसर्जनमतः परम् ॥
हरो महेश्वरश्चैव शूलपाणिः पिनाकधृक् ।
पशुपतिः शिवश्चैव महादेव इति स्मृतः ॥
हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाकधृक्, पशुपति, शिव, महादेव इन नामों से क्रमशः मृदाहरण, संघट्ट (निर्माण), प्रतिष्ठा, आवाहन, स्नपन, पूजन और विसर्जन करे। अर्थात इस विधान के अनुसार भी पार्थिव निर्माण के पश्चात् अन्य पूजन संभव नहीं है, अस्तु कलशस्थापनादि पूर्व ही करे न कि पार्थिव निर्माण करके। एक-एक पार्थिव निर्माण करके तत्काल उनकी स्थापना भी करते चले, ऐसा न कि निर्माण करके और कहीं संग्रह करे, गिराकर रखे।


मन्त्रेणावाहयेद्देवं प्रतिलिङ्ग पिनाकिनः ।
ततो लिङ्गस्थितं ध्यायेत्सुप्रसन्नं महेश्वरम् ॥
अर्थात प्रत्येक लिंग में पिनाकी नाम से आवाहन करे अर्थात एक-एक करके निर्माण करे और तत्क्षण स्थापित करके पिनाकी नाम से अक्षत-पुष्पादि लेकर पिनाकी नाम से आवाहन करे और प्रत्येक लिंग में आवाहन करे।
यदि एक बार में निर्माण के लिये लिंग संख्या की बात करें तो वह एक ही पुष्ट है, इसकी चर्चा इसलिये अपेक्षित है कि यदि कोई एक लिंग निर्माण करता है तो उसे अन्य लोग निषेध बताकर दो-दो निर्माण करने के लिये कहते हैं। ऐसा संभव ही नहीं है यदि पार्थिव निर्माण के विधि से किया जाये तो। दो-दो करके पार्थिव निर्माण करना ही शास्त्रानुकूल नहीं है।
हरमन्त्रेण गृह्णीयादक्षमात्राधिका मृदम् ।
महेश्वरस्य मन्त्रेण लिङ्गं कुर्यात्तया शुभम् ॥
हर मन्त्र से मृदा ग्रहण करे और अक्ष (रुद्राक्ष या बहेड़ा) के आकार से कुछ अधिक मात्रा में ग्रहण करे तदनन्तर महेश्वर मन्त्र से पुनः शुभ-सुन्दर लिङ्ग का निर्माण करे।
अंगुष्ठमानादधिकं वितस्त्यवधिसुन्दरम् ।
पार्थिवं रचयेल्लिङ्गं न न्यूनं नाधिकं च तत् ॥
यदि विधि के अनुसार सावधानी पूर्वक पार्थिव लिंग निर्माण किया जाय तो एक व्यक्ति अधिकतम ११०० ही निर्माण कर सकते हैं किन्तु ५०००/७०००/८००० तक निर्माण करते देखा जाता है। इस प्रकार से पार्थिव निर्माण-पूजन में प्रदर्शन मात्र ही प्रकट होता है क्योंकि प्रामाणिक स्वरूप में कोई भी पार्थिव लिंग नहीं बनता, और यह देखकर ही स्पष्ट हो जाता है।
न्यूनतम ४ अंगुल और अधिकतम द्वादशांगुल होने चाहिये और मोटाई इतनी हो कि प्रत्येक लिंग स्वतंत्र रूप से स्थापित किये जा सकें एवं सुन्दर हों अर्थात यदि श्रद्धा / आस्था हो तो एक-एक पार्थिव लिंग पूरी विधि से बनाये यह आवश्यक है।
किन्तु वर्त्तमान दशक में (२०२१ – २०३०) एक नया शास्त्रविरुद्ध व्यवहार भी प्रचलित हो गया है वो है मुख्य लिंग का बड़ा आकार और उसमें नाक-मुंह आदि बनाना, ये शास्त्रविरुद्ध है और निंदनीय है। आँख-नाक-मुंह-मूंछ आदि का शिवलिंग में कोई निर्देश नहीं है और सुंदर रचना करे का भी ऐसा अर्थ नहीं है एवं यह अनर्थ वर्त्तमान दशक में भी आरम्भ हुआ है। इस अनर्थ से बचें इसमें दोष ही उत्पन्न होगा, मुख्य महादेव (बुढ़वा महादेव) के संबंध में दो महत्वपूर्ण तथ्य है :
न्यूनतम ४ अंगुल से अल्प भी न हो और अधिकतम १२ अंगुल से अधिक भी न हो।
साथ ही दो भागों में (अर्घा और लिंग) न हो, एक ही भाग में केवल लिंग हो।
रत्नजं हेमजं लिंगं पारदं स्फाटिकं तथा ।
पार्थिवं पुष्परागोत्थमखंडं तु प्रकारयेत् ॥
जहां लक्षपूजन की बात हैं वहां ऐसा नियम नहीं कि एक दिन में ही करे और एक दिन में ही करना हो तो भी विधिपूर्वक ही करे। इस संबंध में प्रतिनिधि विचार पृथक किया गया है। किन्तु यहां इतना संकेत आवश्यक है कि जो कोई भी पार्थिव लिंग निर्माण करे वह पूजा भी करे, निर्माण करके त्याग न करे।
लक्षपार्थिवलिङ्गानां पूजनाद् भुवि मुक्तिभाक् ।
लक्षं तु गुडलिङ्गानां पूजनात् पार्थवो भवेत् ॥
ध्यातव्य : लक्षपूजन का माहात्म्य है किन्तु विधान का पालन करना भी आवश्यक है।
एक प्रश्न : आपने जीवन में कितनी बार विधिपूर्वक पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया है ? (स्वयं से ही प्रश्न करें और स्वयं ही उत्तर ढूंढें)
अब निर्माण विधि को थोड़ा और अधिक समझने का प्रयास करते हैं, ऊपर मुख्य विषय था एवं नीचे उसके और विस्तार हैं :
लिंग निर्माण “ॐ महेश्वराय नमः” मंत्र से किया जाता है यह मंत्र प्रत्येक लिंग निर्माण में पढ़ें न कि लिंग निर्माण करते समय वार्तालाप-हंसी-मजाक आदि करे।
“ॐ वं” इस मंत्र को पढकर मिट्टी को सिक्त करे, जल मिलाकर भलीभांति अवलोकन पूर्वक कंकड आदि निकाले और मिट्टी को गूंथ ले। गूंथे हुये मिट्टी को शुद्ध पात्रादि (व्यवस्थानुसार) में रखे ।
संकल्प्यैवं मृदः पिण्डादादायाल्पां मृदं सुधीः ।
एकादशार्णमन्त्रेण कुर्याद बालगणेश्वरम् ॥
थोड़ी मृदा ग्रहण करके “ॐ ह्रीं ग्लौं गं गणपतये नमः ग्लौं गं ह्रीं” इस एकादशाक्षर मंत्र से बालगणपति का निर्माण करके आसन पर स्थापित करे ।
हरमन्त्रेण गृह्णीयादक्षमात्राधिका मृदम् ।
महेश्वरस्य मन्त्रेण लिङ्गं कुर्यात्तया शुभम् ॥
मृदा ग्रहण : “ॐ हराय नमः” इस मंत्र से लिंग निर्माण हेतु मिट्टी ले ।
लिंग गठन : “ॐ महेश्वराय नमः” कहकर लिंग निर्माण करे ।
शूलपाणेस्तु मन्त्रेण लिङ्गं पीठे निधापयेत ।
एवमन्यानि कुर्वीत यथा संकल्पमादरात् ॥
लिंग स्थापन : “ॐ शूलपाणये नमः” मंत्र से ताम्र/कांसा आदि के पात्र/वस्त्र/पीठ (मंडल) आदि जो व्यवस्था हो उसपर स्थापित करें । संकल्पानुसार इसी प्रकार और अर्थात जितनी संख्या संकल्प में उद्धृत किया हो उतना निर्माण करे। यहां पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि संकल्प पूर्व ही होगा एवं अन्यत्र यह स्पष्ट है कि पार्थिव निर्माण के पश्चात् अन्य किसी देवता की पूजा भी निषिद्ध है।
अवशिष्टमृदा कुर्यात्कुमारं तस्य मन्त्रतः ।
स्थापयेल्लिङ्गपंक्त्यन्ते स्वमन्त्रेणार्चयेच्च तम् ॥
तत्पश्चात शेष मृदा से गणपति, कीर्तिमुख आदि का भी निर्माण करे। “ॐ ऐं हुँ क्षुं क्लीं कुमाराय नमः” मंत्र से षण्मुख (कार्तिक) की प्रतिमा का निर्माण करके स्थापित करे।
इस प्रकार विधि पूर्वक पार्थिव निर्माण करके तदुपरांत पार्थिव पूजन और अंगस्वरूप वर्णित विशेष पूजन ही करे, न कि अन्यान्य पूजन। अन्यान्य सभी पूजन, संकल्प, कलशस्थापन आदि पूर्व ही करे।
प्रतिनिधि
प्रतिनिधित्व विषय में मुख्य विचारणीय तथ्य यह है कि पार्थिव निर्माण का जो वर्त्तमान व्यवहार है वो विकृत है। व्रत-जप-पूजनादि में स्वयं अक्षम हो तो अन्य को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है और प्रतिनिधित्व में सर्वोपरि स्थान ब्राह्मण का है। कारण कि “देवो भूत्वा देवं यजेत्”, यदि अन्यान्य को प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाय तो “देवो भूत्वा” का नियम संदिग्ध ही रहेगा किन्तु ब्राह्मण के विषय में यह नियम स्वतः परिपूर्ण रहता है, ब्राह्मण को देवता बनने की आवश्यकता नहीं होती अपितु ब्राह्मण देवता ही होते हैं। ब्राह्मण में मनुष्य बुद्धि, गाय में पशु बुद्धि, गंगा में नदी का भाव, पीपल में वृक्ष का भाव रखना भी पाप कहा गया है।
चूंकि ब्राह्मण देवता ही होते हैं इसलिये प्रतिनिधित्व में सर्वोपरि स्थान रखते हैं – आचार्य, होता, जापक, ऋत्विज आदि प्रतिनिधित्व वाले पद ही हैं। एवं इन पदों में केवल और केवल ब्राह्मण को ही प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है उसमें दो महत्वपूर्ण शर्त भी लगते हैं :
प्रथम वो जन्मना ब्राह्मण हों।
द्वितीय शास्त्र के ज्ञाता हो अर्थात शास्त्रीय विधि से करने में सक्षम हों।
जब ब्राह्मण को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा तो केवल पार्थिव निर्माण का नहीं, निर्माण के साथ पूजन का भी प्रतिनिधित्व दिया जाता है और यह वरण पूर्वक देना चाहिये। वर्तमान में जो व्यवहार देखा जा रहा है उसमें निर्माण करने वाले की योग्यता को नहीं अपितु पार्थिव संख्या को अधिक महत्व दिया जाता है। जिसे देखो ११००० करेंगे, क्यों, कहां से तो कोई उत्तर नहीं।
शास्त्रीय संख्या क्या है वो अयुत १०००० है फिर ११००० क्यों ?
१००० दशांश
दशांश का प्रमाण ?
नहीं मिलेगा, केवल तर्क मिलेगा हवन के लिये दशांश।
अरे हवन की आहूति भी जितने पार्थिव उतने होने चाहिये फिर दशांश कैसे ?
एक बार मान लिया जाय तो – यदि एक ज्ञानी ब्राह्मण को प्रतिनिधित्व दिया जाय और विधि के अनुसार करें तो ११०० से १५०० ही कर सकेंगे, और ऐसे में मात्र १०००० के लिये ही १० ब्राह्मणों की आवश्यकता होगी जो स्वयं केवल निर्माण न करें अपितु पूजन भी करें। तदन्तर उतनी ही आहूतियां देकर हवन भी करें। यदि हवन नहीं होता है तो हवन के रूप में यदि पार्थिव की संख्या बढ़ाना पड़े तो कितना बढ़ेगा ? १००० या १०००० विचार करें।
ब्राह्मण के द्वारा किया गया कर्म अधिक श्रेयस्कर होता है क्योंकि ब्राह्मण स्वयं ही देवता होते हैं। यजमान को स्वयं भी करे, ब्राह्मणों के साथ ही स्वयं भी जितना पार्थिव लिंग निर्माण कर सके करे और जिस प्रकार सभी ब्राह्मण पूजन करें उनके साथ ही उसी प्रकार स्वयं भी पूजन करे। यदि न कर सके तो केवल ब्राह्मण से ही कराये।
वर्तमान में समस्या यह है कि दो प्रकार का मतिभ्रम है :
एक संख्या अधिक करने की।
दूसरी स्वयं ही पूजा करने की।
अरे यहां दोष उत्पन्न होता है, ब्राह्मण कोई शिल्पी नहीं होते जो शिवलिंग निर्माण करके प्रदान करें। स्वयं भी जितना पार्थिव बनाये वो ब्राह्मण को ही पूजा करने के लिये दिया जा सकता है किन्तु ब्राह्मण से पार्थिव निर्माण कराके लिया नहीं जा सकता, यहां उनसे दिया गया प्रतिनिधित्व पुनः छीना जा रहा है यह भाव निकलता है, ब्राह्मण से अधिक योग्य स्वयं हैं ऐसा भाव प्रकट होता है। स्वयं उतने ही पार्थिव की पूजा करे जितना निर्माण किया हो।
जिन ब्राह्मणों ने जितना पार्थिव निर्माण किया उनकी पूजा भी वो स्वयं ही करेंगे, हां बाद में यजमान भी चाहे तो गंध-पुष्पाक्षतादि अर्पित कर सकता है किन्तु यह आवश्यक नहीं है। ब्राह्मण के द्वारा की गई पूजा का फल यजमान को ही प्राप्त होगा।
