पार्थिव पूजनं – मंडल

धर्माचरण हो शास्त्रानुसार

मंडल विषयक चर्चा में एक तथ्य विशेष महत्वपूर्ण है कि यदि ५० – ६० वर्ष के वृद्ध से पूछें तो कहेंगे कि पहले एक भी मंडल नहीं बनता था और यदि नयी पीढ़ी से बात करें तो ज्ञात होगा कि जितने मंडल बनें उतनी विशेष पूजा। पार्थिव पूजन में मंडल विषयक चर्चा बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि आप पार्थिव पूजन का विधान जानना चाहते हैं तो पार्थिवार्चा का विशेष रूप से अवलोकन करके समझने का प्रयास करें ।

पार्थिव पूजन में एक भी मंडल बनाने की चर्चा नहीं है । ये मतिभ्रम और अज्ञान है जो कर्मकाण्ड में प्रवृत्त होने पर भी स्वेच्छाचारी ही बना रहा है, कारण अन्न-धन का दोष है । जब वैदिक विधि से पार्थिवार्चा विधान में भी मंडल प्रयोग नहीं मिलता तो किस आधार से किया जा रहा है यह गंभीर प्रश्न है और उन सबसे पूछना आवश्यक है।

आइये संक्षेप में मंडल की आवश्यकता को बिन्दुवार समझते हैं :

वृद्धिश्राद्ध जब हो तब मातृका पूजन व वसोर्द्धारा अनिवार्य है, वृद्धिश्राद्ध न करते हुए जहां कहीं भी मातृका मंडल बनाया जाता है वह हास्यास्पद शास्त्र विधान के विपरीत है।

वास्तु शांति के अतिरिक्त जब आहुति की संख्या सहस्राधिक हो अथवा कुण्ड निर्माण किया गया हो तो वास्तु शांति आवश्यक है और वास्तु मंडल बनाया जायेगा। पार्थिव पूजन में वास्तु मंडल की कहीं से कोई आवश्यकता नहीं होती है। हां तब अवश्य आवश्यकता होगी जब १००० से अधिक पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया गया हो और १००० से अधिक आहुति भी देनी हो। केवल पार्थिव निर्माण के अनुसार ही वास्तु मंडल का निर्णय नहीं होगा अपितु कुण्ड बना या नहीं, आहूति की संख्या कितनी है इसके आधार पर होगा।

हवन काल में जब सविधि हवन करें तो वहां नवग्रह मख आवश्यक होता है। हवन कुण्ड के ईशान कोण में नवग्रह मंडल बनाने का विधान है। अर्थात केवल नवग्रह मंडल बनाकर ईशान कोण में लगा दिया और हवन करेंगे ही नहीं अथवा हवन कहीं अन्यत्र करेंगे तो त्रुटि है। हवन जहां करेंगे वहीं ईशान कोण का विचार किया जायेगा।

प्रधानदेवता से संबंधित मंडल अथवा सर्वतोभद्र, अष्टदल आदि सामान्य विधान है।

पार्थिवार्चा का एक निषेधात्मक नियम भी है कि पार्थिव निर्माण करके पार्थिव (सांग/सपरिवार) पूजन ही करे अन्य किसी देवता की न करे । अर्थात् कलश स्थापन-पूजनादि भी पार्थिव निर्माण से पूर्व ही करे । यदि पूर्व न किया गया हो तो पार्थिव निर्माण के पश्चात् वो भी निषिद्ध हो जाता है। फिर ये मंडल बनाकर इस निषेधाज्ञा का उल्लंघन ही किया जाता है।

प्रकृत्यपार्थिवं लिंगं योन्यदेवं प्रपूजयेत् ।
वृथा भवति सा पूजा स्नानदानादिकं वृथा ॥

चतुर्लिंगतोभद्र वा सर्वतोभद्र एक अवस्था में बनाई जा सकती है यदि पार्थिव को उस मंडल पर स्थापित करके पूजन करना हो । प्राधान मंडल की आवश्यकता प्रधान देवता के लिये ही होती है।

इस प्रकार उपरोक्त सभी तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि पार्थिव पूजन में ढेरों मंडल बनाना पाण्डित्य सिद्धि नहीं करता है अपितु अपाण्डित्य सिद्ध करता है।

विशेष प्रामाणिक तथ्य सम्पूर्ण कर्मकाण्ड विधि पर द्रष्टव्य। पांडित्य का मूल मंडलों की कतार बनाने में समझना एक बड़ा भ्रम है और इस भ्रम का सर्वथा परित्याग अपेक्षित है। मंडल की कब-कहां-क्यों आवश्यकता होती है इसको भलीभांति समझे बिना मंडल बनाना शास्त्र उल्लंघन की श्रेणी में ही आता है। क्योंकि जहां जिस मंडल की शास्त्रज्ञा हो वहां उसका निर्माण करे और जहां न हो वहां न करे। सभी पूजन में यज्ञ की विधियां प्रचलित नहीं हो सकती।

प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि