अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" - वृषोत्सर्ग, उत्सर्ग सामग्री पर अधिकार, भोज का विचार, दान, पञ्चदान एवं गोदान
वृषोत्सर्ग
शास्त्रों का अवलोकन करने पर सामर्थ्यवानों के लिये वृषोत्सर्ग पूर्वतः अनिवार्य प्रतीत होता है। जो सक्षम ही नहीं है उसके लिये अनिवार्य नहीं हो सकता क्योंकि अक्षम होने पर तो श्राद्ध का भी परिहार हो जाता है। अस्तु वर्त्तमान में बहुत सारे लोग श्राद्ध में भोज का तो सीमा से अधिक विस्तार करते हैं एवं प्रदर्शन के नाम पर न जाने श्राद्ध में भी क्या-क्या नहीं करते। उन लोगों के लिये यह गंभीरता से समझने का विषय है कि उन्हें वृषोत्सर्ग करना चाहिये था। अब प्रश्न यह आता है कि फिर किये क्यों नहीं या करते क्यों नहीं ?
इसका उत्तर है मदान्ध दुराग्रही मूर्खाचार्यों की अल्पज्ञता के कारण ऐसा नहीं होता। कारण कि वृष उपलब्ध नहीं, यदि है भी तो दोष व्याप्त है उसकी व्यवस्था नहीं की जा सकेगी और उक्त स्थिति में वैकल्पिक मार्ग इन मूर्खाचार्यों को ज्ञात ही नहीं क्योंकि ऐसा विधान करके कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं है। इन मूर्खाचार्यों का ज्ञान तो तभी दिखता है न जब कोई कर्मकांड की पुस्तक उपलब्ध हो, शास्त्र में तो प्रवेश ही नहीं है।
एकादशाहे प्रेतस्य यस्य चोत्सृज्यते वृषः । मुच्यते प्रेतलोकात्स स्वर्गलोके महीयते ॥
नारदपुराण/पूर्वार्द्ध/१४/८६, अग्निपुराण/२११/१३
यदि हम शास्त्रों का अवलोकन करते हैं तो एकादशाह में वृषोत्सर्ग आवश्यक प्रतीत होता है और इससे संबंधित ढेरों प्रमाणों का संकलन पूर्वकृत (संपूर्ण कर्मकांड विधि पर) है अस्तु यहां सभी प्रमाणों की आवश्यकता नहीं होगी केवल कुछ आवश्यक प्रमाणों का ही ग्रहण किया जायेगा। जिन्हें वृषोत्सर्ग विषयक विधि व अन्यान्य प्रमाणों का अवलोकन करना हो उनके लिये यहां आलेख का लिंक दिया गया है; इस आलेख - "प्रेतश्राद्ध (एकादशाह) में वृषोत्सर्ग की अपरिहार्यता व विकल्प" - https://karmkandvidhi.in/pretshraddh-aur-vrishotsarg/, इस आलेख में ढेरों प्रमाण संकलित है।
अकृत्वा तु वृषोत्सर्गं कुरुते पिण्डपातनम् । नोपतिष्ठति तच्छ्रेयो दातुः प्रेतस्य निष्फलम् ॥
एकादशाहे प्रेतस्य यस्य नोत्सृज्यते वृषः । प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि ॥
गरुडपुराण/प्रेतकाण्ड (धर्मकाण्ड)/१३/७ – ८, स्कन्दपुराण/६ (नागरखण्डः)/२५९/७१
उपरोक्त रूप से अनिवार्यता सिद्धि के पश्चात् विकल्प का प्रमाण गरुडपुराण से प्राप्त होता है और यहां उसी प्रमाण के आधार पर विकल्प को ग्रहण करते हुये वर्त्तमान युगानुकूल वृषोत्सर्ग विधि बताई गयी है। विकल्प जो बताया गया है वो इस प्रकार है :
दर्भैः पिष्टैस्तु सम्पाद्य तं वृषं मोचयेद्वुधः । वृषोत्सर्जनवेलायां वृषाभाव कथञ्चन ॥
मृत्तिकाभिस्तु दर्भैर्वा वृषं कृत्वा विमोचयेत् । यदिष्टं जीवतस्तस्य दद्यादेकादशेऽहनि ॥
गरुडपुराण/प्रेतकाण्ड (धर्मकाण्ड)/५/३९ – ४६
इस विकल्प के अनुसार एकादशाह को वृषभाव में दर्भ-पिष्टि से वृष निर्मित करने की आज्ञा है अथवा उसका भी यदि अभाव हो तो मृत्तिका वा दर्भ का ही वृष निर्मित करके उत्सर्ग करे ऐसा कहा गया है अर्थात जब "लोकविरुद्धं" से "नाचरणीयं" सिद्ध हो रहा है तो मृत्तिका का वृष बनाकर भी उत्सर्ग किया जा सकता है। एवं यहां वैकल्पिक वृषोत्सर्ग विधि का ही संपादन किया गया है इससे उन लोगों को सुविधा होगी जो (पिष्टि आदि का प्रयाग करके) वैकल्पिक वृषोत्सर्ग कराते तो हैं किन्तु इसकी कोई पद्धति प्राप्त नहीं होती अर्थात मूल वृषोत्सर्ग पद्धति से ही कराना होता है।
मदनपरिजातकार कहते हैं - "जीवद्वृषाभावे पिष्टमयं वृषभं कृत्वा तस्योत्सर्गं कुर्यात्।" इसी प्रकार गरुडपुराण के प्रेतकल्प की कुछ पुस्तकों में भी यह वचन प्राप्त होता है - "अभावे जीववृषस्य दानं पिष्टमयादिभिः। तद्गोत्रनाममन्त्रैश्च पितृणां तृप्तिहेतवे॥" ऊपर अन्य प्रमाण किया गया है एवं अनेकों क्षेत्र में यह व्यवहार भी है भले ही पद्धति के अभाव में वो यथोचित विधि से न होता हो। हेमाद्रि दान काण्ड और चतुर्वर्गचिन्तामणि' 'दानखण्ड' में भी ऐसा एक वचन दृष्ट है - “शालिचूर्णेन वा कृत्वा गोवृषं लक्षणान्वितम्। तस्यैव पूजयेद् देवं रुद्रं सर्वेश्वरं विभुम्॥"
जब वृष हेतु विकल्प प्रयोग किया जायेगा तो वहां वत्सरीचतुष्टय की बात भी आयेगी और उसके लिये मूल्य प्रयोग संबंधी प्रश्न उत्पन्न होगा अथवा वत्सरी के लिये भी प्रतीक पिष्टवत्सरी ही क्यों न हो ऐसा प्रश्न भी उत्पन्न हो सकता है।
प्रथम प्रसंग में पिष्ट वत्सरी प्रयोग उचित और तर्कसंगत प्रतीत हो सकता है किन्तु शास्त्र में इसकी आज्ञा नहीं दी गई है। शास्त्र में गो के लिये निष्क्रय का विकल्प कहा गया है और गो-निष्क्रय प्रयोग तो वत्सरी के विषय में प्रभावी माना जा सकता है किन्तु पिष्ट वत्सरी नहीं। गोदान और वत्सरी के विषय में विकल्प की इच्छा अधिकांश लोगों के लिये अक्षमतावश होती है तो कुछ लोगों के लिये अन्यान्य करणों से। अन्यान्य कारण इस प्रकार हैं :
गो हेतु जिसका चयन करना चाहिये वो अब सामान्यतः उपलब्ध नहीं है।
गाय के नाम पर जो उपलब्ध है वो संकर श्रेणी की है। एक बार इसको स्वीकार किया भी जा सकता है क्योंकि देश-काल-परिस्थिति के अनुसार ही धर्म संपादन संभव है।
किन्तु यह कारण गोदान या वत्सरी के विषय में उचित है कि शृङ्गरहिता होती है और यह व्यावहारिक समस्या है।
शृङ्ग का अपना महत्व है, वह गाय का एक अंग है और हेमशृङ्गां का उल्लंघन होता है। भले ही हेमादि के निमित्ति द्रव्य प्रयोग हो किन्तु शृङ्ग हेतु तो नहीं हो सकता, वहां तो विकलांगता की सिद्धि होती है।
धर्मसाधन प्रयोजन से भ्रष्ट करके अर्थसाधन का विषय बना दिया गया है और यहां दान के फल में विघ्न उत्पन्न होता है।
अस्तु गोदान में गाय और वृषोत्सर्ग में वत्सरीचतुष्टय के स्थान पर तदनुसार मूल्य कल्पित करना ही समीचीन है यदि उपरोक्त लक्षण को धारण न करे। दूसरी समस्या उसकी गति को लेकर भी है सामान्यतः जहां गोदान सद्यः हो वहां भी ऐसी गाय ही देखी जाती है जिससे धर्मसाधन नहीं हो सकता और (प्रतिग्रहीता) उसका उत्सर्ग कुछ ऐसा करने को बाध्य होता है जो निषिद्ध है। मूल्यनिर्धारण में सावधानी यह होनी चाहिये की स्वेच्छा से सामर्थ्य के अनुकूल व युगानुकूल हो।
उत्सर्ग सामग्री पर अधिकार
यदि हम श्राद्ध में उत्सर्ग सामग्रियों पर अधिकार की बात करें तो यह पूर्णरूपेण ब्राह्मण का ही है एवं ब्राह्मणेत्तर किसी का भी नहीं है। इसमें भी विभाग किया गया है जो केवल प्रेत कर्म में सम्मिलित होते हैं उन्हें महापात्र कहा जाता है और जो प्रेतकर्म के अतिरिक्त शेष कर्मों में सम्मिलित होते हैं वो पुरोहित कहलाते हैं। प्रेत के निमित्त जितने भी श्राद्ध किये गये अर्थात आद्य श्राद्ध, १४/१५ मासिक और सपिण्डीकरण के प्रेत श्राद्ध में प्रयुक्त/उत्सर्ग किये सभी सामग्रियों पर महापात्र का अधिकार होता है। इसी प्रकार एकादशाह को प्रेत के निमित्त किये जाने वाले दान पर भी महापात्र का ही अधिकार होता है।
सपिण्डीकरण में विश्वेदेव व तीन पितरों के श्राद्ध की सामग्री पर पुरोहित का अधिकार होता है साथ ही गरुडपुराण वाचक के निमित्त भी श्राद्ध की भांति ही सम्पूर्ण दान करना चाहिये जो द्वादशाह को करे और इसपर भी प्रथम अधिकार पुरोहित का ही होता है। इसी प्रकार कुटुम्बादि द्वारा भी दान किये जाते हैं उसपर भी पुरोहित का ही अधिकार होता है और किसी भी ब्राह्मणेत्तर का कोई भाग शास्त्रसिद्ध नहीं होता है। यजमान यदि सम्पूर्ण सामग्री भी ब्राह्मणेत्तर को देना चाहे तो दे सकता है किन्तु वहां ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होगी अर्थात मन्त्र प्रयोग ही नहीं होगा, कोई विधान ही नहीं होगा।
स्पष्ट है विधि और मन्त्र प्रयोग पूर्वक ब्राह्मण हेतु जो कुछ भी “ब्राह्मणाय” पद से दान दिया गया उसपर ब्राह्मण का ही होगा किसी ब्राह्मणेत्तर का नहीं होगा। हां यदि ब्राह्मणेत्तर को ही देना हो तो मन्त्र और विधान का प्रयोग किये बिना दिया जा सकता है, अर्थात वहां ब्राह्मण की आवश्यकता ही नहीं होगी।
कुछ स्थानों पर बकवास करने वाले बकवादी ब्राह्मणेत्तर “ब्राह्मणाय” को ब्राह्मनाय सिद्ध करते हुये ब्राह्म से ब्राह्मण और नाय से नाइ सिद्ध करते दिखते हैं, उन धूर्तों को यह समझ नहीं है कि नाइ के जो शब्द है वह नापित है नाय नहीं। एवं ब्राह्मणाय में जो णाय है यह तो कृष्णाय में भी है वहां क्या किया जायेगा। जब हम भगवान कृष्ण की पूजा करेंगे तो क्या भगवान कृष्ण के साथ नापित को भी बैठाकर अथवा उसकी प्रतिमा बनाकर पूजा करेंगे ?
ब्राह्मणाय के "णाय" का जो अर्थ लगाकर बहस किया जाता है वह असंस्कृत होने के कारण किया जाता है और यह मूढ़ता की पराकाष्ठा है।
ब्राह्मणेषु च यद्दत्तं यच्च वैश्वानरे हुतम्। तद्धनं धनमाख्यातं धनं शेषं निरर्थकम् ॥
वेदव्यास स्मृति ४/४१
ब्राह्मण के निमित्त उत्सर्ग करके नापितादि को प्रदान करना महादोष उत्पन्न करता है किन्तु यजमान की क्या बात करें यह विकृति तो ब्राह्मणों में भी देखने को मिलती है। ब्राह्मण वर्ग प्रथम स्वयं का तो सुधार करें। प्रथम स्वयंदत्त ब्राह्मण को प्रदान करना आरम्भ करें, अभी भी बहुत सारे स्थानों पर म्लेच्छाचारी कुटुम्बों को देने का प्रचलन है। ये तब उचित था जब वो ब्राह्मणवृत्ति से युक्त थे अब नौकरी भी कर रहे हैं कहीं से ब्राह्मणत्व धारण नहीं करते फिर भी उन्हें दिया जाता है, नापितादि को भी दिया जाता है।
श्राद्धकर्त्ता (यजमान) का ही यह दायित्व है कि जिसका जो भाग है उसी को प्रदान करे क्योंकि वचन तो दिया जाता है किन्तु वचन के उपरांत उसका पालन नहीं किया जाता यह बहुत बड़ा दोष है। वचन का पालन करने के लिये तो श्रीराम ने वचनपालन करते हुये १४ वर्ष वनवास किया था, और दूसरी ओर आज के लोग जो धर्माचरण करते हुये भी वचनभंग करते हैं, जिसका जो भाग है वही ग्रहण करे कोई दूसरा न छीने वो भी सामने में यह कौन विचार भी नहीं करते अपितु स्वयं ही कहते हैं सबका हिस्सा है।
सोचिये कलयुग का कितना प्रभाव है कि शास्त्रसम्मत आचरण हेतु कभी बाप-दादा का स्मरण नहीं होता, पाप में बाप-दादा की याद आती है और उनके नाम पर ही पार उतरने का प्रयास करते हैं अरे ऐसे में तो बाप-दादा स्वर्ग से भी भ्रष्ट होकर नरक चले जायेंगे। पितरों की सद्गति हेतु जो श्राद्ध किया उसी श्राद्ध में पितरों को नरकगामी बना देते हैं। महापात्र का भाग (प्रेतभाग) मन्दबुद्धि पुरोहित हड़पता है और जैसे को तैसा नियम से पुरोहित से नापितादि लड़कर छीन लेता है, लूट लेता है और यजमान उस कुकर्म का भागी होगा यदि वह रोकता नहीं है तो, किन्तु रोकने की बात कौन करे यजमान ही दने के लिये कहता भी है अर्थात पुरोहित से छीनकर स्वयं ही नापितादि को प्रदान करता है। यह बहुत बड़ा पाप (कलयुग प्रभाव) है जो धर्माचरण में रत होकर भी लोग कर रहे हैं।
दूसरी बात यजमान के यहां महापात्र का जो प्रेतभाग है उसको ग्रहण करना छोड़ें देव-पितृ भाग पर ही अधिकार बनता है एवं उसी पर अधिकार करें तब तो आगे भी सुधार का मार्ग प्रशस्त होगा। स्वयं का सुधार नहीं करना और शेष सबका सुधार करना ऐसा नहीं होगा पहले स्वयं का ही सुधार करें। प्रांगण में पुरोहित द्वारा एकोद्दिष्ट के निमित्त प्रयुक्त भोजनपात्र के लिये एक अतिरिक्त भोजनपात्र भी उत्सर्ग कराया जाने लगा है यदि ऐसे लोभी बनेंगे तो प्रसंशा कैसे की जा सकेगी। बिन्दुबार प्रतिग्रहाधिकार :
प्रेतकर्म में और प्रेतोत्सर्ग सामग्री पर प्रेतसंबंधी ब्राह्मण अर्थात महापात्र का पूर्व अधिकार और कर्तव्य होता है। अर्थात दाह-दशगात्र-संध्या-एकादशाह सभी कर्म महापात्र का ही है।
यदि महापात्र नहीं करा सकते तो धर्मार्थ पुरोहित करेगा ही और यदि पुरोहित सारे कर्म संपन्न कराएगा तो सामग्री निश्चितरूपेण ग्रहण करेगा।
यदि यहां कुछ विवाद है भी तो वो महापात्र व पुरोहित के बीच ही है। नापित-मालाकार आदि का कहीं से कोई अधिकार नहीं होता। श्राद्ध में उसका कोई कार्य भी नहीं है, नापित का कार्य क्षौरकर्म है जिसके लिये वह सेवाशुल्क ग्रहण कर सकता है। एवं अन्यान्य सेवा हेतु कर्त्ता द्वारा त्याग किया गया वस्त्रादि होगा।
पुरोहित वरण और दान : पुरोहित व अन्य देव ब्राह्मणों का वरण सपिण्डीकरण में करना चाहिए। देव सम्बंधी अन्य ब्राह्मणों का वरण भी इससे पूर्व एकादशाह में उचित नहीं है। इसी प्रकार पुरोहित को एकादशाह के दिन दान देना भी उचित नहीं है, सपिण्डन के पश्चात् द्वादशाह को देना चाहिये। इसी प्रकार पुरोहित एवं देव सम्बंधी अन्य ब्राह्मणों को एकादशाह के दिन भोजन कराना भी उचित नहीं है किन्तु वरण ग्रहण करने वालों का भोजन न करना भी उचित नहीं है। यदि एकादशाह को भोजन न करना हो तो वरण भी ग्रहण न करें और यदि वरण ग्रहण करते हैं तो भोजन हेतु शास्त्रबंधन है उसे भी स्वीकार करें । यदि उचित पक्ष की बात करें तो द्वादशाह को ही वरण, भोजन आदि उचित है।
देव-पितृ ब्राह्मण का वरण एकादशाह को एक ही परिस्थिति में किया जा सकता है और वो है यदि वृषोत्सर्ग किया जा रहा हो तो आचार्य/ब्रह्मा/होता। वर्त्तमान में महापात्र इन कर्मों के अधिकार से पूर्णतः रहित हैं, यदि योग्य हों तो श्राद्ध में नियोजित महापात्र से भिन्न महापात्र हो सकते हैं। किन्तु ऐसा होना कठिन है और कर्मलोप न हो इस कारण देव-पितृ ब्राह्मण को ही उक्त पदों पर नियोजित करना होगा। अब बात भोजन की आयेगी तो दो विकल्प है कि केवल फलाहार ही करें अथवा एक पृथक ब्राह्मण पाचक हो जो केवल इन्हीं के लिये पाक करे, इससे इतर कुछ भी पाक न करे। ये वैकल्पिक मार्ग निकाला गया है।
भोज का विचार
“भोज का विस्तार करना पितृ-कार्य को गौण और सामाजिक अहंकार को प्रधान बनाना है।”
भोज का विचार तो विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि भोज वाली व्यवस्था ने तो श्राद्ध को ही पूर्णतः विधिहीन कर दिया है। जितना बड़ा भोज होता है श्राद्ध का विधान उतना ही छोटा हो जाता है, सामग्रियों की मात्रा भले बढ़ जाती हो। यद्यपि यदि हम प्रमाणों के अनुसार विचार करें तो श्राद्ध में भोज के विस्तार का पूर्णतः निषेध किया गया है जो आगे अनेकों वचन से स्पष्ट हो जायेगा किन्तु शास्त्रविरोधी प्रवृत्ति और प्रदर्शन की भावना के कारण ही विस्तार दिया जाता है किन्तु कोई भी उसका निषेध नहीं करता।
अब तो जिला और राज्य स्तरीय भोज का भी आयोजन होने लगा है और जनसामान्य श्राद्ध का तात्पर्य भोज वाली व्यवस्था ही समझता है यदि वह प्रदर्शन न करना चाहे तब भी।
सर्वप्रथम देवश्राद्ध में दो ब्राह्मण और पितृश्राद्ध में तीन ब्राह्मण की बात कही गयी है, किन्तु अभाव होने पर अथवा असमर्थता में एक-एक की भी व्यवस्था दी गयी। यहीं एक वचन पुनः न्यूनतम १० ब्राह्मण का भी वचन प्राप्त होता है और उसके पश्चात् एकादशाह में ११ ब्राह्मण का नियम मिलता है। द्वादशाह के लिये यदि २ और तीन के पक्ष से विचार करें तो २ विश्वेदेव के निमित्त, ३ पितरों के निमित्त ९, एवं प्रेत के निमित्त ४५ हो सकते हैं कुल ५९ ज्ञात होते हैं अथवा १ – १ करने पर १९ ब्राह्मण होते हैं।
अब एक बात आती है कि भोजन हेतु ब्राह्मणों की संख्या के बारे में इतना विचार क्यों करें ? तो इसका विचार इस कारण कि अनेकानेक ग्राह्यग्राह्य विषयक तथ्य का त्याग करके भी एक विशेष विषय और है – पिता-पुत्र, दो भ्राता इनको एक साथ भोजन न कराने का अर्थात एक परिवार से एक भी ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिये क्योंकि उसके पुत्र और भाई का निषेध हो जाता है। हां यहां पर भोजन करने वाले ब्राह्मण के पूरे परिवार का भोजन भी प्रदान करें तो करें।
अब जाति, कुटुम्बादि के भोजन की बात आती है तो यहां पर एक अन्य तथ्य भी श्राद्धकर्त्ता ब्राह्मण को विदा करके बान्धवादि के साथ शांतिपूर्वक भोजन करे ऐसा होने से भोज के विस्तार की सिद्धि नहीं होती है, क्योंकि भोज के विस्तार का निषेध मिलता है। रही बात जाति आदि के भोजन सम्बन्धी महत्व का तो उसके लिये प्रथम, तृतीय, सप्तम और दशम का विधान शास्त्र से प्राप्त होता है क्योंकि इससे मृतक को अधिक तृप्ति होती है।
अथवा अन्यत्र विस्तार वाली व्यवस्था हेतु पूर्व-पर दिन का मार्गदर्शन भी किया गया है कि विस्तार करना भी हो तो श्राद्ध के दिन विस्तार न करे क्योंकि उससे श्राद्ध में ही विघ्न होता है।
एकादशेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दद्याद्देकादशेऽहनि। भोजनं तत्र वै कस्मै ब्राह्मणाय महात्मने॥ भविष्यपुराण
प्रथमेऽह्नि तृतीये च सप्तमे दशमे तथा। ज्ञातिभिः सह भोक्तव्यमेतत् प्रेतेषु दुर्लभं ॥ मरीचि
आसुरं तद्भवेच्छ्राद्धं दश यत्र न भुञ्जते ॥
द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा। भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्येत विस्तरे ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण/७/१५/३, पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/१३५
द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकं चोभयत्र वा। भोजयेदीश्वरोपीह न कुर्याद्विस्तरं बुधः ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/९६
एकैकमपि भोजनीयाश्च दैवे पित्र्ये च भोजयेत्। पुष्कलं फलमाप्नोति नाऽमन्त्रज्ञान् बहूनपि ॥ शंख
यद्यपि अन्य स्थानों पर भोज की अत्यधिक प्रसंशा भी प्राप्त है और अयुत भोजन कराने के लिये भी कहा गया है तथापि विचारणीय यह है कि भोज इस प्रकार से किये जायें कि श्राद्ध में विघ्न न हो।
दान, पञ्चदान एवं गोदान
शय्या, काञ्चन पुरुष, गाय, छाता, और उपानद् ये पञ्चदान कहे गए हैं। इनमें से शय्या और काञ्चन पुरुष श्राद्धारंभ से पूर्व, छाता और उपानद् प्रेत का आवाहन के बाद और गाय श्राद्ध के अंत में दक्षिणा से पूर्व दान करने का व्यावहारिक प्रचलन है। इस प्रकार से दान करने के पीछे का रहस्य तो रहस्य ही है किन्तु यहां यह देखना आवश्यक है कि क्या इससे किसी शास्त्रीय विधि का उल्लंघन भी होता है यदि होता है तो अनुचित अन्यथा व्यवहार/देशाचार के रूप में ग्राह्य। सपात्रक शब्द का प्रयोग अपात्रक को भलीभांति समझने के लिये किया गया है। श्राद्ध का तात्पर्य सपात्रक ही होता है, पात्राभाव विधि में अपात्रक शब्द प्रयुक्त होता है।
एकोद्दिष्ट के मध्य में जो दान का विषय है वो अन्यान्य सभी प्रकार से उचित सिद्ध होने पर भी अपात्रक श्राद्ध में अनुचित सिद्ध हो जाता है। अपात्रक श्राद्ध का तात्पर्य ही पात्राभाव में बिना पात्र (महापात्र) के कुशप्रयोग पूर्वक किया जाने वाला। पात्राभाव का तात्पर्य ब्राह्मण या महापात्र की अनुपस्थिति तो है ही किन्तु उपस्थित होते हुये भी पात्रता का अभाव होना मुख्य भाव है। श्राद्ध का वर्त्तमान स्वरूप जो देखा जाता है वह कहने को तो अपात्रक है किन्तु सपात्र का भी कुछ अंश उपस्थित है मात्र अर्चन-भोजनादि से अपात्रक और दान-दक्षिणादि से सपात्रक है।
नष्टशौचे व्रतभ्रष्टे विप्रे वेदविवर्जिते । दीयमानं रुदत्यन्नं किं मया दुष्कृतं कृतम् ॥
वेदपूर्णमुखं विप्रं सुभुक्तमपि भोजयेत् । न च मूर्खं निराहारं षड्रात्रं चोपवासिनम् ॥
वेदव्यास स्मृति ४/५३ – ५४
प्रमाण से यही सिद्ध होता है कि उत्सर्जित अन्न को ग्रहण करने के अधिकारी ही नहीं होते फिर क्यों बलात् ऐसा शास्त्रविरुद्ध व्यवहार किया जाता है। अनधिकार के कारण ही अपात्रक विधान किया गया है।
अपात्रक का तात्पर्य अपात्रक ही हो सकता है सपात्रक मिश्रित नहीं। अस्तु महापात्र को कुशोदक पूर्वक दान-दक्षिणा आदि देने से अपात्रक बाधित होता है और सपात्रक संभव नहीं इस कारण पूर्णरूपेण अपात्रक को ही ग्रहण करना उचित पक्ष है जिससे इसका भी बाध न हो और इसका तात्पर्य यह है कि दान-दक्षिणा भी अपात्रक विधि से ही संपन्न किये जायें अर्थात महापात्र को कुशोदक ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। पूज्यत्वेन कहकर वरण किया जाता है इसमें भी संशोधन किया जाय।
यथा वातबलो वह्निर्दहत्त्यार्द्रानपि द्रुमान् । तथा दहति वेदाग्निः कर्मजं दोषमात्मनः॥
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्भुञ्जानोऽपि यत्तस्ततः । ऋग्वेदं धारयन्विप्रो नैनः प्राप्नोति किंचन ॥
न वेदबलमाश्रित्य पापकर्मरतिर्भवेत् । अज्ञानाच्च प्रमादाच्च दह्यते कर्म नेतरत् ॥
वशिष्ठ स्मृति २७/२ – ४
इसके साथ ही कई विवेकशून्य मूर्खाचार्यों को दो विशेष कार्य के लिये विवाद करते भी देखा जाता है : प्रथम महापात्र के क्षौर हेतु और द्वितीय प्रेतोत्सर्जित अन्न के भक्षण हेतु। अरे मूर्खाचार्यों तुम प्रथम यह तो निर्धारित करो कि सपात्रक श्राद्ध करोगे अथवा अपात्रक। यदि सपात्रक करोगे तो उसकी विधि क्या होगी और यदि अपात्रक करोगे तो उसकी विधि क्या होगी ? अपात्रक श्राद्ध में भी महापात्र को उस अवस्था में क्षौर करना अनिवार्य होगा यदि उसने अशौच (यजमान का) में भोजन किया हो अन्यथा नहीं।
प्रेतोत्सर्जित भोजन का थोड़ा सा अन्न भक्षण करना भी दोषपूर्ण है। अपात्रक श्राद्ध में इसका कोई औचित्य ही नहीं सिद्ध होता किन्तु दोष सिद्ध होता है। ये भोजन उसी समय किया जा सकता है जिस समय उत्सर्ग किया गया हो, पिंडदान के पश्चात् नहीं अपितु भोजन के पश्चात् पिण्डदान होगा। द्वितीय तथ्य यह भी है कि जैसे-तैसे खड़े-खड़े भी थोड़ा से अन्न महापात्र बाध्यतापूर्वक ग्रहण करते हैं तदनन्तर भोजन करते हैं। यहां पुनर्भोजन दोष उत्पन्न होता है एवं बाध्य करने का दोष होगा सो पृथक।
अस्तु क्षौरकर्म हेतु यदि अशौच में भोजन किये हों तो कारण बनता है किन्तु प्रेतोत्सर्जित अन्नग्रहण का कोई कारण नहीं अपितु शास्त्रविरुद्ध सिद्ध होता है। इसी प्रकार आद्यश्राद्ध (एकोद्दिष्ट) के मध्य में छाता-जूता-गाय दान का भी औचित्य नहीं बनता। यदि करते हैं तो अपात्रक होना बाधित होगा। दान-दक्षिणा की विधि भी “यथानामगोत्राय” की ही होगी एवं कुशोदक ग्रहण नहीं किया जा सकता, करने से अपात्रक होना असिद्ध होगा।
दान प्रकरण में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि दाल-भात आदि के पाक पात्र में दो दाना डालकर शेष पृथक ही रख दिया जाता है। यह भी अनुचित है सभी दाल-चावल आदि पाकपात्र में ही होने चाहिये यदि उसे भर दिया जाय तो उत्तम। यहीं पर थाली में चूड़ा या पूड़ी आदि की आवश्यकता होती है, श्राद्ध में नहीं।
यहां मैं किसी पद्धतिकार की आलोचना नहीं कर रहा हूँ न ही उनके ज्ञान पर संदेह कर रहा हूँ अपितु उनकी तुलना में मैं सोलहवीं कला भी सिद्ध नहीं होता अर्थात ये दुस्साहस मैं कर ही नहीं रहा। किन्तु जिस काल में पूर्व के विद्वान उपस्थित थे और कालानुसार विवेकप्रयोगपूर्वक संशोधन किया तो ये अधिकार वर्त्तमान में उपस्थित विद्वानों को भी निःसंदेह है एवं परवर्तियों को भी प्राप्त होगा। वर्त्तमान में अधिकांशतः मूर्खाचार्य ही भरे-पड़े हैं और शास्त्रसम्मत विमर्श करने वालों की संख्या अत्यल्प होने से उनकी सरलतापूर्वक उपेक्षा कर दी जाती है।
उपरोक्त विमर्श का तात्पर्य यह है कि यदि अपात्रक श्राद्ध की शास्त्रोचित विधि के अनुसार समझने का प्रयास करें तो :
यदि महापात्र ने अशौच में भोजन नहीं किया है तो क्षौर कर्म निरर्थक है और कराने वाले धूर्ताचार्य। जहां अपात्रक -सपात्रक कुछ निर्धारित ही नहीं खिचड़ी कर दे वहां शास्त्रीय विधान कहकर क्षौर कराने वाला आचार्य नहीं मूर्खाचार्य है। पहले अपात्रक या सपात्रक यह निर्धारित करें । सपात्रक में ब्राह्मण का क्षौर अनिवार्य है चाहे अशौच में भोजन न किये हों तो भी।
यदि अपात्रक विधि से श्राद्ध करना चाहें तो पूज्यत्वेन कहकर महापात्र का वरण नहीं होगा अपितु अपात्रकश्राद्धे ब्राह्मणत्वेन कहकर किया जायेगा।
किसी भी दान में महापात्र को कुशोदक प्रदान नहीं किया जायेगा अपितु जिस प्रकार पुरोहित का भाग यथानामगोत्राय कहकर कुशब्राह्मण को दिया जाता है उसी प्रकार महापात्र के लिये भी किया जायेगा।
यदि पूर्ण अपात्रक नहीं कर सके तो योग्य ब्राह्मण को ढूंढकर सपात्रक ही करे किन्तु खिचड़ी न करे।
सभी दान एकोद्दिष्ट पूर्व ही किया जायेगा, एकोद्दिष्ट के मध्य में कोई दान नहीं हो सकता।
एकोद्दिष्ट की दक्षिणा भी यथानामगोत्राय उच्चारण करके कुशब्राह्मण को ही प्रदान किया जायेगा न कि महापात्र को हस्तोदक देकर।
प्रेतोत्सर्जित अन्न का भक्षण महापात्र नहीं करेंगे। उत्सर्जित अन्न का भक्षण सपात्रक श्राद्ध में ही किया जा सकता है और भोजन काल में ही।
