क्रिया और मंत्रादि प्रयोग
"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं"
स्नान
हस्तद्वयमितं कार्यं वैश्वदेविक मंडलम्। तद्दक्षिणे चतुर्हस्तं पितृणामङ्घ्रिशोधनम् ॥
लौगाक्षि उद्धृत (वीरमित्रोदय श्राद्ध प्रकाश)
क्रिया और मंत्रादि प्रयोग वह भाग है जो कर्त्ता श्राद्ध में कर्म करता है अर्थात यह मुख्य भाग है। इसे मुख्य भाग स्वीकार करते हुये भी वर्त्तमान कालीन अर्थातुर अपण्डितों (कथित पण्डित) ने छिन्न-भिन्न कर रखा है और ये विभिन्न क्रियाओं की चर्चा से पूर्णतः सिद्ध हो जायेगा।
स्नान : स्नान में दो महत्वपूर्ण तथ्य है प्रथम यह कि दो बार स्नान करे एवं दोनों स्नान की भिन्न विधियों को भी स्मरण रखे :
मौसल स्नान : एकादशाह (आद्यश्राद्ध) के दिन सूर्योदय से पूर्व प्रथम मौसल स्नान करे अर्थात खड़ा रहकर स्नान करे, सामान्य स्नान बैठकर ही किया जाता है। एक अन्य बात यह भी है कि प्रेतस्नान शिखा ग्रंथि खोलकर विहित है।
द्वितीय स्नान : द्वितीय तथ्य यह है कि श्राद्ध स्थलादि कल्पित (व्यवस्थित) करके पुनः स्नान करे इसमें एक विशेषता यह है कि सचैल स्नान कहा गया है अर्थात दो वस्त्रों को धारण करके एक धोती कमर से नीचे धोती की तरह और एक गमछा (द्वितीय वस्त्र) को शरीर पर धारण करके। द्वादशाह को भी इसी विधि से सचैल स्नान करे।
मौसलस्नान के संबंध में एक वचन इस प्रकार प्राप्त होता है : निरुद्धकर्णनासस्तु मुसलस्नानमाचरेत्।
देवीभागवतपुराण में मौसल स्नान विषयक वर्णन कुछ इस प्रकार से प्राप्त होता है जो गंगा स्नान (माहात्म्य) प्रकरण में मिलता है :
कोटिजन्मार्जितं पापं भारते यत्कृतं नृभिः । गंगाया वात स्पर्शेन नश्यतीति श्रुतौ श्रुतम् ॥
स्पर्शनाद्दर्शनाद्देव्याः पुण्यं दशगुणं ततः । मौसलस्नानमात्रेण सामान्यदिवसे नृणाम्॥
शतकोटिजन्मपापं नश्यतीति श्रुतौ श्रुतम् । यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ॥
जन्मसंख्यार्जितान्येव कामतोऽपि कृतानि च । तानि सर्वाणि नश्यंति मौसलस्नानतो नृणाम् ॥
पुण्यं दशगुणं चैव मौसलस्नानतः परम् । ततस्त्रिंशद्गुणं पुण्यं रविसंक्रमणे दिने ॥
देवीभागवतपुराण/९/११/२३ - २९
ब्रह्मवैवर्तपुराण/२ (प्रकृतिखण्डः)/१० में भी इसी प्रकार प्राप्त होता है। पुनः कामधेनुतंत्र में इस प्रकार :
ततोऽस्याञ्च च वरारोहे गङ्गायांस्नानमित्यहम् ॥
करिष्ये इति सङ्कल्प्य शिरःस्नानं समाचरेत् । अर्को धर्मपयो देवि अमाद्यर्थश्च मूर्तिमान् ॥
श्रवणञ्च महेशानि साक्षात्कामश्च मूर्तिमान् । व्यतीपाते महेशानि स्वयं मुक्तिः प्रगीयते ॥
माद्यस्तु चञ्चलापाङ्गि स्वयमेवेश्वरः प्रिये । एतत्तु कथितं देवि पञ्चयोगं परात्परम् ॥
कायिकं वाचिकं चैव मानसं पापमुत्कटम् । तत्सर्वं नाशमायाति गङ्गादर्शनमात्रतः ॥
कोटिजन्मार्जितं पापं जलस्पर्शाद्विनश्यति । ततस्तु मौशलं स्नानं कोटिसूर्यग्रहैः समम् ॥
कामधेनुतन्त्र/२२/१० - १५
मौसल स्नान के विषय में अंततः जो स्पष्ट होता है वो यह कि शांत भाव से हाथ-पैर हिलाये बिना जो स्नान किया जाता है वह मौसल स्नान कहलाता है। उसमें एक विशेष विधि यह भी है कि “निरुद्धकर्णनासस्तु मुसलस्नानमाचरेत्” अर्थात कान-नाक को बंद करके मौसल स्नान करे, यह संभवतः नदी आदि जलाशय में स्नान करें उसका नियम है, अन्यत्र भी पालन करें तो शास्त्रोचित ही प्रतीत होता है।
पूर्वक्रिया
यदि हम कर्मारम्भ से पूर्वक्रिया की बात करें तो उसकी अनदेखी देखने को मिलती है जबकि उसका भी विधान है। पूर्वक्रिया में लगभग सभी विधानों का परित्याग देखा जा रहा है अस्तु उसे गंभीरता से समझना आवश्यक है। मौसल स्नान सर्वप्रथम क्रिया में है जो शौचादि के उपरांत सूर्योदय से पूर्व होगा। शौचादि कथन में दन्तकाष्ठ (दातुन) का निषेध है अस्तु अन्य प्रशस्त पत्रादिचूर्ण का प्रयोग तो होगा किन्तु ब्रश-पेस्ट का भी प्रयोग नहीं हो सकता।
तदनन्तर मौसल स्नान के पश्चात् श्राद्ध सामग्री लेकर प्रातः काल ही श्राद्धभूमि पर जाने का विधान है न कि मध्याह्न में।
वहां जाकर सर्वप्रथम श्राद्धभूमि कल्पित करने का विधान है अर्थात श्राद्धभूमि सुनिश्चित करे, मण्डपादि निर्माण, वस्त्रादि से घेरना, समतल करके श्राद्धभूमि को ऊँचा करना, झाड़ू आदि से सफाई करना इस भाग में आता है। तत्पश्चात शुद्धस्थान को प्रोक्षित करके सामग्री रखे। दो वस्त्रों से युक्त होकर स्नान (सचैल स्नान) करे - तथैव यन्त्रितो दाता प्रातः स्नात्वा सहाम्बरः । आरभेत नवैः पात्रैरन्वारम्भं च बान्धवैः ॥ - देवल
स्नानोपरांत नित्यकर्म (संध्यावंदन, तर्पण, पंचदेवतादि पूजन) करे। संध्यावंदन में विशेषता यह है कि यदि विधि ज्ञात हो तो करे अन्यथा ब्राह्मण को कराने की आवश्यकता नहीं है। जो ब्राह्मण कराते हैं और अनिवार्य सिद्ध करते हैं उनसे प्रश्न होना चाहिये कि क्या सत्यनारायण पूजा, पार्थिव पूजा, नवरात्रा, लक्ष्मीपूजा, मकरसंक्रांति आदि में संध्यावंदन कराते हैं ? जो करता हो उसके लिये निषेध नहीं किया जा रहा है किन्तु जो कभी करता ही नहीं उसे केवल श्राद्ध में ही क्यों कराया जायेगा अन्यत्र क्यों नहीं कराया जायेगा। अन्यत्र कहीं नहीं कराया जाता इस कारण श्राद्ध में भी कराया नहीं जायेगा। सूर्यार्घ्यपूर्वक १० बार गायत्री जप किया जायेगा, अन्यथा यदि श्राद्ध में कराया जाये तो सर्वत्र कराना होगा।
तदूत्तर श्राद्धभूमि में अंगारभ्रमण करे, फिर पंचगव्य लेपन करे (प्रोक्षण करके) गोबर-गोमूत्र से लेपन करे, फिर गौरमृत्तिका आच्छादन करे। तदनन्तर तिल-पीला सरसों बिखेरे - अपहतेति मन्त्रेण द्वारदेशे विचिक्षिपेत्। पद्मपुराण/खण्डः ५ (पातालखण्ड)/११७/८३
तदनन्तर पवित्र छाग को श्राद्धदेश में बांधकर अपसव्य हो, तिल-जल-त्रिकुशा लेकर प्रोक्षित करे - "ॐ पित्रे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि"
ततः प्रातः समुत्थाय प्रातः कृत्यं समाप्य च । श्राद्धं समाचरेद्विद्वान्काले कुतपसंज्ञिते ॥ - नारदपुराण (पूर्वार्ध)२८/२१
पाकारम्भ
काल, देश, अधिकारी आदि की चर्चा तो की जा चुकी है अब श्राद्ध के मुख्य भाग में पाक क्रिया से आरम्भ होता है। श्राद्ध मध्याह्न से अपराह्न अथवा स्वधाभवन (कुतुप से अगले पांच मुहूर्तों तक होना चाहिये। श्राद्ध का आरम्भ पाक से ही होता है इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि पाक भी उसी कालखण्ड में किया जाय किन्तु ऐसा नहीं है। पाकक्रिया पूर्व में कर सकते हैं मुख्य काल में श्राद्ध ही होना चाहिये। किन्तु उतना ही पूर्व किया जा सकता है जितने पूर्व करने से अन्न की ऊष्मा परिवेषण काल तक बनी रहे क्योंकि अन्न का उष्ण होना अनिवार्य है।
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावद्भुञ्जन्ति वाग्यताः अश्नन्ति पितरस्तावद्यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
यमस्मृति/प्रायश्चित्तवर्णन/३८, स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/४०९४
यावदूष्मा भवत्यन्ने यावदश्नन्ति वाग्यताः । तावदश्नन्ति पितरो यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
विष्णुस्मृति/८१/२१, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/१/१४०/४५
पाकारम्भ में कुछ सावधानी की आवश्यकता होती है कि पाकारम्भ से पूर्व यदि अशौच हो जाये तो श्राद्ध नहीं हो सकेगा किन्तु पाकारम्भ होने से वह श्राद्ध हो सकेगा। अस्तु दानादि करके पाकारम्भ किया जाय तो विघ्न संभावित होती है एवं समस्या होगी अर्थात पाचक का होना अनिवार्य सिद्ध होता है।
क्योंकि यदि पाचक नहीं है तो कर्त्ता स्वयं यदि पाक करके दानादि करता है तो उष्णता समाप्त हो जायेगी एवं यदि प्रथम दानादि करता है और यदि अशौच प्राप्ति हो जाये तो विघ्न हो जायेगा। इस प्रकार पाचक होना अनिवार्य सिद्ध होता है जिससे एक और पाक होता रहेगा और दूसरी ओर दानादि कार्य जिससे न तो विघ्न उपस्थित होने पर श्राद्ध अवरुद्ध होगा और न ही उष्णता समाप्त होगी।
अन्यान्य महत्वपूर्ण क्रिया
हरि स्मरण : आद्यंत और मध्य तीन स्थानों पर तो विष्णु स्मरण का विधान है ही किन्तु श्राद्ध में विकिरदान एवं पिण्डदान (लेपभाजी भाग देने) के पश्चात् भी "हरिस्मरण" है। ये दो वो विशेष स्थान हैं जहां पितरों के निमित्त प्रेत से भिन्न के प्रति भी भाग उत्सर्जित किया जाता है या दिया जाता है। प्रेत के भोजन में गायत्री जप व सूक्त-स्तोत्रादि का पाठ करना चाहिये किन्तु उनसे भिन्न के निमित्त जो प्रदान किया जाता वो जब तक हरिस्मरण किया जाता है तभी तक में भाग ग्रहण कर लेते हैं।
भूस्वामि भाग : वर्त्तमान पद्धतिकारों ने श्राद्ध विधि को कितना विकृत किया है इसका एक सर्वोत्तम उदाहरण भूस्वामि पितरों को भाग प्रदान करना है।
परकीयगृहे यस्तु स्वान्पितृस्तर्पयेज्जडः । तद्भूमिस्वामिनस्तस्य हरन्ति पितरो बलात् ॥
अग्रभागं ततस्तेभ्यो दद्यान्मूल्यं च जीवताम् ॥
यह वीरमित्रोदयादि में ब्रह्मपुराण का वचन बताया गया है एवं इसका तात्पर्य अन्नोत्सर्ग से पूर्व अग्रभाग प्रदान करना स्वीकार नहीं किया गया है अपितु आरम्भ में ही प्रदान करने का पक्ष स्वीकारा गया है। किन्तु गंभीर विषय तो यह है कि इसे श्राद्ध का अंग सिद्ध कर दिया गया एवं स्वभूमि में श्राद्ध करे तो भी करना ही होगा क्योंकि श्राद्ध का अंग हो गया न। ये विकृति वर्त्तमान पद्धतिकारों ने उत्पन्न किया है।
संभव है आप मेरे संशोधन को स्वीकारने का साहस न कर सकें किन्तु इस विषय को तो स्वीकार करेंगे ही कि जो श्राद्ध स्वगृह में ही किया जाता है जैसे सांवत्सरिक, पार्वण, वृद्धि आदि उसमें कहीं से भी भूस्वामी का भाग अर्पित करना उचित नहीं है अपितु विकार है, किन्तु करते हैं अथवा नहीं ? परस्पर चर्चा करना एक सामान्य सी बात है किन्तु संशोधन करना बड़ी बात है। परस्पर चर्चा से विसंगति का निवारण नहीं होता किन्तु संशोधन से होता है। यहां जो संशोधन शब्द प्रयोग किया जा रहा है उसका तात्पर्य विकार निवारण के भाव में है।
पारक्ये भूमिभागे तु पितॄणां नैव निर्वपेत् । स्वामिभिस्तद् विहन्येत मोहाद्यत्क्रियते नरैः॥
अटव्यः पर्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च । सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न ह्येतेषु परिग्रहः ॥
कूर्मपुराण (उत्तरभाग)/२२/१६ - १७
तस्मात्क्रीत्वा महीं दद्यात्स्वल्पामपि विचक्षणः। पिण्डः पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वतः॥
महाभारत/१३/१०१/३३
सव्यापसव्य : सर्वप्रथम सव्यापसव्य क्रिया का विषय है जिसमें सूक्तादि पाठ, आचमन आदि सव्य होकर ही कर्तव्य होते हैं एवं शेष अपसव्य होकर। किन्तु सव्यापसव्य विधान विलुप्त होता जा रहा है और निवीति (कण्ठीवत जनेऊ) होकर कराया जाता है एवं यह तर्क दिया जाता है कि इस प्रकार से सव्य और अपसव्य दोनों का ही यथायोग्य विधान हो जाता है जबकि इसका तात्पर्य यह है कि न ही सव्य है न ही अपसव्य। ऐसा करने का कारण सव्यापसव्य का ज्ञान न होना है अर्थात अयोग्यता है। यदि सव्यापसव्य का ज्ञान पंडित को हो तो कराने में कोई समस्या नहीं है अपनी अयोग्यता को आवरण देने के लिये निवीति कराते हैं।
पितृगायत्री : पितृगायत्री श्राद्ध में तीन स्थानों पढ़ जपने के लिये कहा गया है और प्रत्येक स्थान पर ३ – ३ बार। प्रथम स्थान आरम्भ है अर्थात संकल्प के पश्चात्, द्वितीय स्थान मध्य है जो अंगारभ्रमण के पश्चात् अत्रावन से पूर्व होगा एवं अंत में अर्थात दक्षिणा के पश्चात्। तीनों स्थानों पर प्रयोग तो होता है किन्तु एक बार यह त्रुटि है। ३ बार का तात्पर्य ३ बार है एक बार पाठ करके दो बार नमो नमः अथवा भवन्त्विति (अंतिम शब्द) बोलने से तीन बार नहीं होता है। यथा यदि एक माला गायत्री मन्त्र का जप करना है तो प्रथम बार पूरा गायत्री मंत्र पढ़कर तत्पश्चात प्रचोदयात् – प्रचोदयात् मात्र करना अमान्य होगा अर्थात इस प्रकार से एक माला जप की मान्यता नहीं होगी।
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव भवन्त्विति॥
आद्यावसाने श्राद्धस्य त्रिरावृत्त्या जपेत्तदा। पिण्डनिर्वपणे वाऽपि जपेदेवं समाहितः॥
क्षिप्रमायान्ति पितरो राक्षसाः प्रद्रवन्ति च। प्रीयन्ते त्रिषु लोकेषु मन्त्रोऽयं तारयत्युत॥
ब्रह्मपुराण/२२०/१४३ – १४५
पितृगायत्री के पूर्व गायत्री जब विधान से प्राप्त नहीं होता किन्तु इसको वाचस्पति मिश्र द्वारा शिष्टाचार रूप में ग्रहण किया गया। इसमें शास्त्रविरोध भी सिद्ध नहीं होता अस्तु इसके लिये अधिक विचार करना अनपेक्षित है। अन्नोत्सर्गोपरान्त गायत्री जप का प्रमाण :
त्रिर्जपित्वा तु गायत्रीमुपवीती पुरोमुखः । प्राचीनावीतवान्ब्रूयान्मधुत्रयमतः परम् ॥
पद्मपुराण/खण्डः ५ (पातालखण्ड)/११७/१२३
अन्नोत्सर्ग के पश्चात् दक्षिणाभिमुख और अपसव्य में गायत्री जप को ही कुछ पद्धतिकारों ने उचित सिद्ध किया है एवं पूर्वाभिमुख का प्रमाण देने में संकोच किया। यहां पूर्वाभिमुख और उपवीति (सव्य) होकर गायत्रीजप का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है जो श्राद्धकर्म में रुचि रखने वाले विद्वद्जनों के लिये महत्वपूर्ण है।
मधुमती ऋचा : श्राद्ध में न्यूनतम ४ और अधिकतम ५ बार मधुमती ऋचा (मधुव्वाता) का प्रयोग है। प्रथम तो भोजन में तदनन्तर अन्नहीनं से पूर्व पुनः सूक्तपाठ से पूर्व, तदनन्तर विकिरदान से पूर्व और पर। किन्तु एक बार प्रयोग करके अन्यत्र मधु मधु मधु करके काम चलाया जाता है यह भी लोप ही सिद्ध होता है । मधुमती ऋचा के साथ ॐ मधु मधु मधु भी जप होगा न कि मधुमती ऋचा का त्याग करके।
आचमन : यदि हम आचमन की बात करें तो ६ स्थानों पर आचमन का विधान है आरम्भ और समापन, पादशौच (अपात्रक में नहीं होता), विकिरदान, पिण्डदान और अर्चन के पश्चात्। किन्तु व्यवहार में आरम्भ के पश्चात् अन्यान्य सभी आचमनों का लोप किया जाता है जो लोप है अर्थात विधि का उल्लंघन है।
तन्त्रनिषेध : एक विषय तंत्रनिषिद्ध क्रियाओं का भी आता है अर्थात श्राद्ध तंत्र से कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष क्रियाओं में तंत्र का निषेध है। जो इस प्रकार हैं : अर्घ्य, अवनेजन (अत्रावन और प्रत्यवन), पिण्ड, अक्षय्योदक और स्वधावाचन (स्वधावाचन अपात्रक श्राद्ध में नहीं होता है); इन ६ क्रियाओं में तंत्र का निषेध है अर्थात इन ६ क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य सभी क्रियायें एक साथ कर सकते हैं जैसे सपिण्डीकरण श्राद्ध (व्यवहार) में देखने को मिलता है।
अर्घेऽक्षय्योदके चैव पिण्डदानेऽवनेजने । तन्त्रस्य तु निवृत्तिः स्यात्स्वधावाचन एव च ॥
गोभिल स्मृति/३/७४
इसके साथ एक अन्य तथ्य भी है कि पृथक-पृथक श्राद्ध हेतु पाक भी पृथक-पृथक होना चाहिये। इस प्रकार यहां भी स्पष्ट होता है कि मासिक श्राद्ध एक बार में ही होना चाहिये न कि एक-एक करके।
गरुडपुराण के वचन में यही स्पष्ट होता है कि यदि एक पाक से श्राद्ध किया जा रहा है तो तंत्र से ही करे, विकिर एक ही करे अर्थात एक पाक से अनेक बार विकिरदान न करे, भले ही बहुत सारे पिण्ड भी क्यों न देना हो। एक विकिरदान का तात्पर्य तंत्र विधि से ही है कि एक बार में करे पृथक-पृथक न करे। यदि पृथक-पृथक करेंगे तो विकिरदान अनेक हो जायेंगे। यह एक प्रमाण ही इतना सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि १४ मासिक श्राद्ध तंत्र से ही होने चाहिये।
एकेनैव तु पाकेन श्राद्धानि कुरुते सुतः । एकं तु विकिरं कुर्यात्पिण्डान्दद्यद्बहूनपि ॥
गरुडपुराण/२/२६/४७
और भी प्रमाण हैं जो द्वादशाह को संक्षेप में श्राद्ध करने के लिये कहते हैं और यदि इसकी पुष्टि हो रही है तो कहना ही क्या :
श्राद्धं संवत्सरं कुर्यादथवाऽप्यर्थवत्सरं। द्वादशाहेऽथ वा सर्वं संक्षेपेण समाचरेत् ॥
अंत में एक-एक करके मासिक श्राद्ध का खंडन भी किया जायेगा।
ऐसा तो नहीं है कि कभी तन्त्र करते ही नहीं, तन्त्र से करते भी हैं कुछ एक-एक करते तो कुछ दो-दो, तीन-तीन आदि करके आवश्यकतानुसार। इससे यह सिद्ध करने की तो आवश्यकता ही नहीं कि तन्त्र किया जा सकता है, जबकि सिद्ध कर भी दिया गया है। किन्तु मन के भीतर (पाण्डित्य का अहंकार होने से) दुराग्रह स्थापित हो जाता है कि किसी अन्य का कथन स्वीकार मत करो भले ही वो शास्त्रसिद्ध भी क्यों न हो।
ऐसे मूर्खाचार्य जब तन्त्र करते हैं तो निषेध का पालन नहीं करते और तन्त्र करने पर इन क्रियाओं का निषेध भी यही सिद्ध कर देता है कि तन्त्र से हो सकता है। किन्तु जब दो-तीन मासिक करके यही मूर्खाचार्य कराते हैं तो पिण्ड एक-एक करके इस कारण देते हैं कि एकबार में देना संभव नहीं अन्यथा पिण्ड भी तन्त्र से ही दिलवा दें। अस्तु ऐसे मूर्खाचार्यों के मत-विचार का कोई महत्व नहीं होता। ये लोग विरोध करते हुये ही अच्छे लगते हैं जिन्हें ज्ञात तो कुछ भी नहीं, शास्त्र में प्रवेश भी नहीं और बने घूमते हैं पण्डित।
पिण्ड वेदी : पिंडवेदी प्रथम ही निर्मित होता है इससे कोई बाधा नहीं है यदि अत्रावन से पूर्व उस वेदी को पुनः व्यवस्थित कर दिया जाय क्योंकि पिंडवेदी का निर्माण उसी काल में होना चाहिये। साथ ही आकर के विषय में हस्तमात्र (लम्बाई-चौड़ाई) व चार अंगुल ऊँची कहा गया है न कि ५ – ६ अंगुल का। सपिण्डीकरण में पिंडवेदी पर विशेष विमर्श अपेक्षित है क्योंकि एक ही पिंडवेदी पर प्रेतपिण्ड व पितृपिण्ड प्रदान करने का असंगत प्रचलन है। प्रेतपिण्डवेदी और पितृपिण्डवेदी दोनों भिन्न होना चाहिये।
पिंड निर्माण : पिंड का निर्माण जब उत्सर्ग करना हो तभी करना चाहिये और भोजन से पूर्व नहीं किया जा सकता अन्यथा शेष अन्न पिण्डशेषान्न हो जाता है, किन्तु व्यवहार में जो दिखता है वो श्राद्ध आरम्भ से पूर्व ही निर्माण करते दिखता है यह विधि का उल्लंघन है। अपण्डितों को जब सामान्य बातें समझ नहीं आती तो ये सूक्ष्म ज्ञान होना संभव ही नहीं है। किन्तु पंडित होने के अहंकार में चूर रहते हैं एवं कुतर्क से ही सब कुछ सिद्ध करते रहते हैं।
पिण्ड निर्माण करके तत्क्षण हस्तप्रक्षालन के बिना उसका उत्सर्ग होना चाहिये और उत्सर्ग के पश्चात् हाथ में पिण्ड का जो भी अवशेष हो रसमात्र भी वही पिण्डतलस्थ कुशाओं में लेपभाजी का भाग होता है। उसके साथ अतिरिक्त घृत-मधु भी संलिप्त करे जिसका रस हाथ में शेष रहे।
पितामहाय चैवान्यं तत्पित्रे च तथापरम् । दर्भभूले लेपभुजः प्रीणयेल्लेपघर्षणैः ॥
विष्णुपुराण/३/१५/४२
ऊह, सूक्त, वेदमंत्र
वेद मंत्रों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है किन्तु ये व्याकरण-व्याकरण चिल्लाते हुये वेदमंत्रों में भी परिवर्तन कर देते हैं। परिवर्तन होते ही वह वेद से बाहर का हो जाता है और मन्त्र संज्ञक नहीं रहता है।
उदाहरण : आयन्तु नः पितरः में पितरः का परिवर्तन, मधुमती में पिता का परिवर्तन, इहलोकं परित्यज्य गतोसि में गतासि परिवर्तन, अत्र पितरो में पितरो का परिवर्तन, पितृन् अहम् आवाहयिष्ये में पितृन् का परिवर्तन, पितृन् हविषे अत्तवे में पुनः पितृन् का परिवर्तन, अमीमदन्त पितरो में पुनः, तर्पयत मे पितृन् में पुनः पितृन् का परिवर्तन करना अनुचित है।
सीधा तात्पर्य यह है कि जैसे ही हम वेद मंत्र में किञ्चित भी परिवर्तन करते हैं वह वेद का भाग नहीं रहता अर्थात वेदमंत्र नहीं रहता। इस कारण वेदमंत्रों में ऊह नहीं करना चाहिये हाँ जिन शाखाओं में ऊह की आज्ञा हो वो कर सकते हैं किन्तु इसका प्रमाण तो चाहिये न कि हमारी शाखा में ऊह करने की आज्ञा है।
ऊह प्रसङ्ग में व्यावहारिक पक्ष तो ग्रहण करने का ही है किन्तु कहीं कोई स्थिरता नहीं मिलती। श्राद्ध पद्धतियों में मंत्र ऊहपूर्वक दिया गया है किन्तु नीचे टिप्पणि में नोहः कार्यः भी बताया गया है और उन मंत्रों का भी उल्लेख किया गया है जिसमें ऊह न करे। समस्या श्राद्ध कराने वालों को होती है और कोई ऊह करते हैं, तो कोई कुछ मंत्रों का लोप करते हैं तो वहीं को ऊह नहीं भी करते अथवा कई स्थानों पर करते हैं और कई स्थानों पर नहीं करते हैं।
जैसे अत्र पितरमादयस्व, तर्पयत् मे पितरं में ऊह किया गया और मधुद्यौरस्तु नः पिता में ऊह नहीं किया गया और ये स्थिति श्राद्ध पद्धतियों की भी है अर्थात किसी भी पक्ष में स्थिरता का अभाव है। यहां एक पक्ष ऊह निषेध को स्थिर किया जा रहा है कि कहीं भी ऊह न करे क्योंकि यही सर्वाधिक उचित पक्ष है।
प्रथम पक्ष ऊह निषेध का है।
द्वितीय पक्ष कुछ विशेष स्थानों में ऊह करने का भी है जैसे आवाहन में।
तृतीय पक्ष उन मंत्रों के त्याग का है जिनमें ऊह की आवश्यकता लगे। यह पक्ष भी बहुवचन होने पर ग्रहण करने को कहता है, मात्र बहुवचन न होने पर त्याग की बात करता है।
इनमें से प्रबल पक्ष की बात करें तो ऊह निषेध का पक्ष ही प्रबल है क्योंकि यदि ऊह की सिद्धि करें तो सर्वप्रथम “देवताभ्यः पितृभ्यश्च” में देवता और पितृ दोनों का ऊह सिद्ध हो जायेगा जिसपर किसी का ध्यान भी नहीं जाता है। यदि इसमें ऊह नहीं करते हैं जबकि यह पौराणिक मन्त्र है तो वेदमंत्रों में ऊह करना ही नहीं चाहिये।
फिर भी यदि आप इस पक्ष में स्थिर न हो सकें तो आपके पास अन्य दो विकल्प हैं या तो कहां-कहां ऊह होगा कहां नहीं, कब होगा कब नहीं इसको सुनिश्चित कर लें अथवा ऊहपरक मंत्रों का त्याग करें और यह अतिदुष्कर है। ऐसी अवस्था में ऊह न करने का पक्ष ही उचित है जिससे विसंगति उत्पन्न न हो, अन्यथा तो “देवताभ्यः पितृभ्यश्च” में भी ऊह करना आवश्यक हो जायेगा।
मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥
पाणिनीयशिक्षा (खण्ड १०) ५२
स्वरश्चैव तु हस्तश्च द्वावेतौ युगपद्भवेत्। हस्तभ्रष्टः स्वरभ्रष्टो न वेदः फलमश्नुते ॥
न करालो न लम्बोष्ठो नाव्यक्तो नानुनासिकः। गद्गदो बद्धजिह्वश्च न वर्णान्वक्तुमर्हति ॥
याज्ञवल्क्यशिक्षा
ऊह निस्तारण : ऊह सदैव विवादित रहा है और आज भी है किन्तु हम इस विवाद का निस्तारण करना चाहते हैं अस्तु दोनों ही पक्षों को समझना आवश्यक है। ऊह की सिद्धि करने वाले मुख्य वचन इस प्रकार हैं :
एकवन्मन्त्रानूहेदेकोद्दिष्टे ॥ विष्णु स्मृति/२१/२
मन्त्रोहाश्चात्र कर्तव्यास्तथैकवचनेन च ॥ विष्णुधर्मोत्तरपुराण/२/७७/२
आवाहने स्वधाकारे मन्त्रा ऊह्या विसर्जने । अन्यकर्मण्यनूह्याः स्युरामश्राद्धविधिः स्मृतः ॥ - मरीचि
आवाहनमन्त्रे "पितॄन्हविषे अत्तव" इत्यत्र स्वीकर्तव इत्यूहः | विसर्जनमन्त्रे "तृप्ता यातु" इत्यत्र तवतेत्यूहः | स्वधाकारमन्त्रे "नमोवः पितर इष" इत्यत्रामा येत्यूह इति हेमाद्रिः ।
अब ऊह निषेध :
सर्वपितृवाचित्वे उत्तरमन्त्रद्वयवैयर्थ्यात् ॥
बहुवचनन्तुनोह्यते ॥
ऋगंतेचनोहः ॥
एकोद्दिष्ट में भी ऊह करने की आज्ञा दी गयी है किन्तु समस्या यह है कि ऋचाओं में ऊह किया ही नहीं जा सकता और यदि ऐसा है तो ऊह की आज्ञा निरर्थक हो जायेगी। यह ऊह की आज्ञा भी निरर्थक नहीं हो सकती एवं ऋचाओं में ऊह किया भी नहीं जा सकता अब निर्णयसिन्धु में कमलाकरभट्ट लिखते हैं : “यद्यपितस्मादृचंनोहेदितिऋच्यूहोनिषिद्धस्तथापि वचनाद्भवति” - यद्यपि वेदमंत्रों (ऋचाओं) में ऊह निषिद्ध है तथापि वचन में होता है और यही संगति है। किन्तु समस्या यहां भी समाप्त नहीं होती क्योंकि वचन का अर्थ भी अनेक होता है और दुर्भाग्य से इसका जो सामान्य रूप से अर्थ ग्रहण किया गया वो है बहुवचन और एकवचन। अर्थात बहुवचन का एकोद्दिष्ट में एकवचन करना यह अर्थ ग्रहण करना ही मूल समस्या है। यहां वचन के तीन भाव होंगे :
एकवचन-द्विवचन-बहुवचन परक (यह पक्ष खंडित होता है किन्तु वैयाकरणों का मुख्य पक्ष यही है)
जप न होकर वाक्य परक (ऋचाओं में जप भी कहा गया है इसका ध्यान करें), यह ऋचा के एक अंश वाले का ही अगला स्वरूप समझा जा सकता है जहां पूरी ऋचा होती है वहां जप कहा गया है और जहां ऋचा का अंश मात्र होता है उसका जप नहीं कहा गया है अपितु उस वाक्य से क्रिया का निर्देश किया गया है। यह पक्ष भी खंडित होता है क्योंकि अनेकों ऋचाएं हैं जिनसे क्रिया भी होती है : “मधुद्यौरस्तु नः पिता, पितृन्लोकान्”
पूर्ण ऋचा न होकर एक अंश (जैसे विष्णु, हारीत, शातातप, यम, याज्ञवल्क्य आदि का वचन कहकर कोई अंश बताया जाता है), वास्तव में यही मुख्य पक्ष है। जहां पूर्ण ऋचा न हो वहां ऋचा/मंत्र न होकर वाक्य होगा और उसमें ऊह किया जायेगा।
बहुवचन का एकवचन ऊह वाला पक्ष है उसका पूर्णतः खंडित होता है क्योंकि जिसने भी ऊह ग्रहण किया है उसने “आयन्तु नः पितरः, मधुद्यौरस्तु नः पिता, पितृन्लोकान्” आदि में ऊह नहीं किया है किन्तु “पित्रे स्थानमसि, एतत्ते पितर्वासः, अत्रपितर, अघोरः पितास्तु, तर्पयत मे पितरं” आदि ऊह किया है। इसमें एक मुख्य पक्ष क्रिया को तो लिया गया है किन्तु सम्पूर्ण ऋचा होने वाले पक्ष को ग्रहण नहीं किया गया है और ये विसंगति है - जैसे “नमस्तेपिता, तर्पयत मे पितरं” यह अंश मात्र नहीं है अपितु पूर्ण ऋचा है एवं इसमें ऊह नहीं होगा। इसके अतिरिक्त शेष स्थानों पर अंश है : “पित्रे स्थानमसि, एतत्ते पितर्वासः, अत्रपितर, अघोरः पितास्तु”, यहां अंश होना ही मुख्य रूप घटित हो रहा है, क्रिया गौण पक्ष है कि इनमें क्रिया भी होगी है अर्थात निष्कर्ष क्रिया में प्रयोग से न करके ऋचा और अंश के आधार पर होगा।
सीधी सी बात है कि वेदमंत्रों में रत्तीभर उच्चारण के अंतर का भी निषेध है। यहां यदि “पितृस्थानमसि, अत्रपितर, एतत्ते पितरवासः, अघोरः पितास्तु” को स्वीकार किया गया है तो वो वाक्यमात्र (अंश) मानकर क्योंकि ये पूर्ण ऋचा नहीं हैं। किन्तु “आयान्तु नः पितरः, तर्पयत मे पितृन्” आदि पूर्ण ऋचा होने से इसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता अस्तु यथावत ही लिया गया है।
सूक्त पाठ : रक्षोघ्नादि सूक्त पाठ हेतु पृथक वैदिक रहते हैं यद्यपि वेदज्ञ को ही श्राद्ध कराना भी चाहिये किन्तु अवैदिक (मात्र व्याकरण को प्रधान सिद्ध करते हुये) श्राद्ध कराते हैं और सूक्त पाठ अन्य वैदिकों के द्वारा कराते हैं। यहां अन्य ब्राह्मण के पाठ से कोई व्यतिक्रम नहीं है समस्या यह है कि वो कर्त्ता श्रवण भी नहीं कर पाता है जब तक वैदिक रुची-रुची रुचिः करते हैं तब तक कर्ता दक्षिणा करने पहुंच जाता है अर्थात श्राद्ध कराने वाले श्रवण नहीं करने देते हैं श्राद्ध कराते रहते हैं। सूक्त में ऊह का पूर्णतः निषेध है।
ये पाठ भी कर्त्ता का ही कार्य है यदि स्वयं न पढ़ सके तो श्रवण करे यही विकल्प है किन्तु इसके लिये तो वहां कर्म को रोकना होगा न, यदि कर्त्ता आगे की क्रिया कर रहा है तो वह सूक्त कैसे श्रवण कर रहा है ?
वेदमंत्र पढ़ाना : वर्त्तमान में सामान्य उत्सर्गादि वाक्यों के अनुसार ही वेद मन्त्र भी पदच्छेदपूर्वक पूर्वक पढ़ाये जाते हैं और इसी कारण “मुतोषसो” वाला विवाद भी उत्पन्न होता है। वेदमंत्र को स्वरपूर्वक पाठ करना चाहिये जैसे रक्षोघ्नादि सूक्त पाठ करते हैं न कि पदच्छेद पूर्वक पढ़ाना चाहिये। ऐसा करने से भी विसंगति आती है और वेदमंत्र का प्रभाव विलुप्त हो जाता है। यदि रक्षोघ्न सूक्तादि का श्रवण फलदायी है तो क्या अन्य वेदमंत्रों का श्रवण फलदायी नहीं होगा ? कर्त्ता को मात्र उत्सर्गादि वाक्य ही पढ़ाना चाहिये वेदमंत्र नहीं। यदि कर्त्ता को भी मन्त्र आता हो तो वो साथ-साथ ही पढ़ सकता है अन्यथा श्रवण मात्र करे।
