पार्थिव पूजनं – कलश स्थापन
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार
कलश स्थापन-पूजन
तदनन्तर कलश स्थापन-पूजन करके नवग्रह-दशदिक्पालादि का पूजन करे। यहां पुनः ध्यातव्य है कि यदि हवन किया जायेगा तो नवग्रह मंडल ईशानकोण (वेदी से) में बनेगा और यदि हवन नहीं होगा तो कलश पर ही नवग्रह व दशदिक्पाल का आवाहन-पूजन किया जायेगा; विशेष चर्चा पूर्वकृत है।


कलश स्थापना सामग्री
कलश, पूर्णपात्र, नारियल, वस्त्र, चावल, दूर्वा, कुश, सुपारी, पान, गोबर, गंगाजल या अन्य जल, पंचपल्लव या आम्रपल्लव, रोली, धान्य, दीप आदि।
कलश पूजन सामग्री
जल, पंचामृत, वस्त्र, चन्दन, पुष्प, माला, दूर्वा, बिल्वपत्र, माला, सुगंधित द्रव्य, अबीर, हल्दी चूर्ण, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा आदि।
कलश स्थापना से पूर्व वेदी या कुंकुम आदि से भूमि पर अष्टदल बनाकर उसपर धान्यपुञ्ज या चावल पुञ्ज बना ले।
भूमि का स्पर्श करें : ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री। पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ ᳪ ह पृथिवी ᳪ माहि ᳪ सीः ॥
सामान्यतः भूमि स्पर्श मंत्र पूर्वक ही आगे की क्रिया की जाती है तथापि कलश स्थापन से पूर्व भूमि पूजन करने का भी विधान मिलता है। तत्पश्चात गोबर से भूमि को लीपे, किन्तु सामान्यतः पूर्व ही लीपा जाता है अथवा पक्की भूमि होती है अतः गोबर का स्पर्श मात्र ही किया जाता है। भाव लीपने का ही रहता है। तदनुसार प्रयोग विधि यह है की थोड़ा सा गाय का गोबर वेदी या अष्टदल के बगल में कलश के आगे रखें और उसका स्पर्श कर यह मन्त्र पढ़ें :
ॐ मानस्तोके तनयेमानऽआयुषिमानो गोषुमानोऽअश्वेषुरीरिष: । मानो विरान्रुद्रभामिनो वधीर्हष्मन्तः सदमित्वा हवामहे ॥
अष्टदल के मध्य में सप्तधान्य या धान-गेंहूँ-चावल जो भी शुद्ध उपलब्ध हो उसका पुंज बना दें : ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वो दानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धान्देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि॥
धान्यपुंज पर सुवासित कलश स्थापित करे : ॐ आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः पुनरुर्जा निवर्तस्व सा नः। सहस्रं धुक्ष्वोरु धारा पयस्वतिः पुनर्म्मा विशताद्रयिः॥
कलश में गंगाजल या गंगाजल मिश्रित सामान्य जल दें :- ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्त्थो वरुण्स्य ऽऋतसदन्न्यसि वरुणस्य ऽऋतसदनमसि वरुणस्यऽऋत सदनमासीद् ॥
गन्धप्रक्षेप (चन्दन-हल्दी इत्यादि) :- ॐ त्वां गन्धर्वा ऽअखनँस्त्वामिन्न्द्रस्त्वाँ बृहस्पति: । त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्न्यक्ष्मादमुच्च्यत ॥
सर्वौषधि प्रक्षेप :- ॐ या ओषधी: पूर्वा जाता देवेब्भ्यस्त्रियुगं पुरा। मनैनु बब्भ्रूणावहᳪशतं धामानि सप्त च॥ सर्वौषधि शुद्ध हो तो दे अन्यथा अशुद्ध का प्रयोग न करे या विकल्प हरिद्रा का ग्रहण करे।
दूर्वाप्रक्षेप : ॐ काण्डात् काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्त्रेण शतेन च॥
पञ्चपल्लव : ॐ अश्वत्थे वो निषदनं पर्ण्णे वो वसतिष्कृता। गोभाजऽइत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम् ॥
सप्तमृदा प्रक्षेप : ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथाः ॥
(अश्वस्थानाद गजस्थानाद वल्मिकात्संगमात्हृदात् । राजग्द्वाराच्च गोगोष्ठान मृदमानीय निक्षिपेत्) सप्तमृत्तिका शुद्ध हो तो दे अन्यथा अशुद्ध का प्रयोग न करे या विकल्प गंगा की मिट्टी अथवा गोशाला की मिट्टी का ग्रहण करे।
कुश प्रक्षेप : ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥
फलप्रक्षेप (बड़ा और अच्छा सुपाड़ी दें) :- ॐ याफलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी। बृहस्पति प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वᳪ हस:॥
पञ्चरत्न प्रक्षेप : ॐ परि वाजपति: कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् । दधद्रत्नानि दाशुषे ॥
(पंचरत्न शुद्ध उपलब्ध हो तो दें अन्यथा बाजारू निकृष्ट वस्तु न दें, यदि शुद्ध पंचरत्न उपलब्ध न हों तो उसके स्थान पर स्वर्ण अथवा पुराने ५ सिक्के ही दे दें। १-२-५ रूपये का पुराना सिक्का लौहमय नहीं होता है, किन्तु नया सिक्का देना हो तो १० या ५० का ही दें )
हिरण्य प्रक्षेप (अथवा द्रव्य-सिक्का दें किन्तु लौहद्रव्य न हो) : ॐ हिरण्यगर्ब्भ: समवर्त्तताग्ग्रे भूतस्य जात: पतिरेकऽआसीत । स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
रक्तवस्त्र या मौली कलश में लपेटें :- ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्मवरूथमासदत्स्वः । वासोअग्ने विश्वरूप ᳪ संव्ययस्व विभावसो ॥
पूर्णपात्र (कलश पर पूर्णपात्र दें) :- ॐ पूर्णादर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत । वस्न्नेव विकृणावहा इषमूर्ज ᳪ शतक्रतो ॥
(पिधानं सर्ववस्तूनां सर्वकार्यार्थसाधनम्। संपूर्ण: कलशो येन पात्रं तत्कलशोपरि) कलश पर पूर्णपात्र रखें ।
श्रीफलं (नारियल) :- ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुम्मऽइषाण सर्वलोकम्मऽइषाण । पूर्णपात्र पर नारियल रखें।
एक दीप इस मन्त्र से रखें : ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्योज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निवर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्योवर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥ दीप रखकर हाथ धो लें।
अक्षत पुष्प लेकर कलश में वरुण का आवाहन करें :-
ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश ᳪ समा न आयुः प्र मोषीः॥ भगवन्वरुणागच्छ त्वमस्मिन कलशे प्रभो । कुर्वेऽत्रैव प्रतिष्ठाम् ते जलानां शुद्धिहेतवे ॐ सांग सपरिवार सायुध सशक्तिक वरुण इहागच्छ अस्मिन्कलशे सुप्रतिष्ठितो भव । ॐ अपांपतये वरुणाय नम: ॥
कलशस्थितदेवानां नदीनाम् तीर्थानाम् च आवाहनम् :- (अक्षत पुष्प लेकर कलश में अन्य देवताओं का भी आवाहन करें) – अगले मन्त्रों का उच्चारण कर अक्षत छोड़ते जायें :
कलाकला हि देवानां दानवानां कलाकला:।
संगृह्य निर्मितो यस्मात् क्लशस्तेन कथ्यते॥
कलशस्यमुखे विष्णु: कण्ठेरुद्रः समाश्रित:।
मूलेत्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्येमातृगणा: स्मृता:॥
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा च मेदिनी।
अर्जुनी गोमती चैव चन्द्रभागा सरस्वती ॥
कावेरी कृष्णवेणा च गंगा चैव महानदी ।
तापी गोदावरी चैव माहेन्द्री नर्मदा तथा ॥
नदाश्च विविधा जाता नद्य: सर्वास्तथापरा:।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि कलशस्थानि तानि वै॥
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा: ।
आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका: ॥
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण: ।
अंगैश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता: ॥
अत्र गायत्री सावित्री शान्ति पुष्टिकरी तथा ।
आयान्तु मम शान्त्यर्थम् दुरितक्षयकारकाः ॥
अक्षतान् गृहीत्वा प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात् (अक्षत पुष्प से प्राण-प्रतिष्ठा करें)
प्राण-प्रतिष्ठा : ॐ मनो जूतिर्ज्जुषतामाज्ज्यस्य बृहस्पतिर्य्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं य्यज्ञᳪ समिमं दधातु। विश्वे देवासऽइह मादयन्तामों३ प्रतिष्ठ ॥ ॐ गणेश-नवग्रह-दशदिक्पालादिदेवता इह सुप्रतिष्ठिता भवन्तु ॥
तदनंतर समय, व्यवस्था आदि के अनुसार पूजन करे।
॥ ॐ शांतिपूर्णकलशस्थ गणेशाय नमः ॥
पूजा के अनन्तर पुष्प लेकर इस प्रार्थना करें -
देवदानव संवादे मथ्यमाने महोदधौ ।
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयं॥
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठताः॥
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापति।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः॥
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफ़लप्रदाः।
त्वत्प्रसादादिमां पूजां कर्तुमीहे जलोद्भव॥
सांनिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥
नमो नमस्ते स्फटिकप्रभाय
सुश्वेतहाराय सुमंगलाय।
सुपाशहस्ताय झषासनाय
जलाधिनाथाय नमो नमस्ते॥
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय
लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
तदनन्तर नवग्रह और दशदिक्पाल का भी पूजन क्रमशः कलश में ही कर लें। :
नवग्रह : ॐ सूर्यादि नवग्रहेभ्यो नमः ॥
दशदिक्पाल : ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः ॥
