पार्थिव पूजनं – हवन
धर्माचरण हो शास्त्रानुसार


हवन का तात्पर्य विधिपूर्वक स्थापित अग्नि में सावधानी से उत्तम द्रव्यों की आहुति देना होता है न कि अलाव लगाना। प्रायः देखा यही जाता है कि अलाव लगाकर उसमें शाकल्यादि नामक द्रव्य देना मात्र ही हवन समझा जाता है जो की सर्वथा भ्रम है। यदि ठंड में ऐसे अलाव लगायें तो एक लाभ आग सेंकना प्राप्त हो भी सकता है किन्तु गर्मी में तो वो भी दग्ध ही करने वाला होता है।
शास्त्रों में देवताओं के दो मुख कहे गये हैं :- १. अग्नि और २. ब्राह्मण का मुख । पूजा के समय जो भोग (नैवेद्य) अर्पित किया जाता है उसमें भाव को प्रधान कहा गया है, भगवान उस भोग का नहीं अपितु भाव का भोग लगाते हैं और अर्पित किया गया भोग प्रसाद स्वरूप पुनः हम ही ग्रहण करते हैं।
शतपथ ब्राह्मण – देवा अग्निमुखा अन्नमदन्ति, यस्यै कस्यै च देवतायै च जुह्वति, अग्नावेव जुह्वति, अग्निमुखा हि तद्देवा अन्नमकुर्वत।
ये सिद्ध होता है कि हवन में हम परोक्ष देवता को प्रत्यक्ष भोजन करा रहे होते हैं ।
हवन में भाव व श्रद्धा तो आवश्यक होता ही है साथ-साथ मन्त्र, विधान, वस्तु, शुद्धता, संस्कार आदि भी अनिवार्य होता है।
होमकर्म में असंस्कृत कुछ भी प्रयुक्त होने पर वह आसुरी-श्रेणी प्राप्त कर लेता है।
पहले होत्री स्वयं संस्कारित होकर अग्निस्थापन से पूर्व भूमि, स्थण्डिल या कुण्ड का संस्कार करे, फिर अग्नि को भी संस्कारित करके स्थापित करे, फिर जो पात्र (स्रुव,स्रुक् आदि) प्रयुक्त होंगे उसे संस्कारित करे, फिर जो द्रव्य (आज्य, चरु आदि) प्रयुक्त होंगे उसे भी संस्कारित करके ही आहुति देना चाहिए।
यत्संख्याकं यजेल्लिङ्गं तन्मितं होममाचरेत् ।
आज्यान्वितैस्तिलैरग्नौ घृतैर्वा पायसेन वा ॥
इष्ट देवताकी प्रीति के लिये अनुष्ठित यज्ञमें ब्राह्मण और अग्नि के लिये जो कुछ अश्रद्धा से समर्पित किया जाता है, उससे देवगणों की तृप्ति नहीं होती । दाता का वह दक्षिणा आदि द्रव्य निरर्थक ही जाता है। विधिरहित किया गया हवन सर्वथा निष्फल होता है यही शास्त्राज्ञा है।
इसलिए हवनकाल में जो मन्त्र, विधि व वस्तु शास्त्रों में वर्णित है उसका श्रद्धापूर्वक पालन करना अनिवार्य होता है और यदि उसका पालन नहीं किया जाय तो वह हवन आसुरी कहलाता है।
प्रायः ऐसा देखा जाता है कि पूजा/ अनुष्ठान आदि तो बहुत वृहद् करते हैं परंतु हवन बहुत संक्षित्प में करते हैं या मन्त्र, विधि व वस्तु आदि का शास्त्रीय अनुपालन नहीं करते वह हवन आसुरी हो जाता है ।
पार्थिव पूजन में हवन विहित अथवा निषिद्ध : पार्थिव पूजन में हवन को विहित अथवा निषिद्ध; इस भाव से नहीं देखा जा सकता, अनिवार्य है अथवा नहीं इसका विचार हो सकता है। जप में दशांश हवन की अनिवार्यता होती है और उसका (हवन) भी विकल्प होता है (विंशांश जप बढ़ाना)।
विहित ही कहा जा सकता है किन्तु अनिवार्य नहीं, क्योंकि हवन तो अन्यान्य दिनों में भी स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं फिर जब पूजन कर रहे हैं तो क्यों न करें। किन्तु विकल्प का मार्ग अवरुद्ध नहीं होगा क्योंकि जहां जप में अनिवार्य कहा गया है वहां भी विकल्प प्राप्त है। यहां यदि अनिवार्य भी सिद्ध हो तो इसका विकल्प पुनः ब्राह्मण भोजन हो सकता है।
निषेध तो हो ही नहीं सकता किन्तु अनिवार्य है इस भ्रम का त्याग करना होगा। जो लोग प्रत्येक मास सहस्र (११००) आदि संख्या पार्थिव पूजन करते हैं वो तो हवन नहीं करते। किन्तु इससे निषिद्ध नहीं कहा जा सकता।
इस प्रकार पार्थिव पूजन में हवन किया तो जा सकता है किन्तु यह भाव की अनिवार्य है शास्त्रसम्मत नहीं है। जब हवन करे तो हवन की विधि से सम्यक् करे, अलाव लगाकर हुआ-हुआ न करे। हवन करें में हवन विधि की अनिवार्यता को संक्षेप में ऊपर बताया गया है और यदि विधिपूर्वक हवन नहीं करेंगे तो आसुरी संज्ञक होगा जिसका शुभ परिणाम नहीं हो सकता।
हवन विधि की भी अनेकों आलेखों में विस्तृत चर्चा “सम्पूर्ण कर्मकांड विधि” पर उपलब्ध है।
प्रामाणिक तथ्य : ये उसके लिये समझने का विषय है जो विधिरहित हवन करते हैं, अब जो विधिपूर्वक हवन करने वाले हैं उनके लिये विहित ही नहीं पार्थिव लिंग की संख्या के अनुसार आहूति का भी विधान है :
अश्रद्धया च यद्दत्तं विप्रेऽग्नौ दैविके क्रतौ ।
न देवास्तृप्तिमायान्ति दातुर्भवति निष्फलम् ॥
इस प्रकार जब हवन विहित का प्रामाणिक पक्ष लिया जायेगा तो किसी भी द्रव्य से स्वेच्छापूर्वक संख्या का निर्धारण नहीं किया जा सकता। पार्थिव लिंग की संख्या के अनुसार ही आहूति देकर हवन करे। आहूति के मुख्य द्रव्य घृताक्त तिल अथवा घृत अथवा पायस।
निष्कर्ष : हवन विहित है अथवा नहीं इस प्रश्न का मूल कारण विधिरहित हवन करना है। विधिरहित हवन कल्याणकारी नहीं होता अपितु दुष्परिणाम देने वाला ही होता है इसलिये यदि हवन करे तो विधिपूर्वक पार्थिव लिंग की संख्या के अनुसार करे अथवा न करे। ब्राह्मण भोजन में ब्राह्मणों की संख्या अधिक कर दे और ब्राह्मणों की पूजा करके भोजन कराये और दान-दक्षिणादि से संतुष्ट करे।
