घटदान

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" - सायं कृत्य

जब किसी की मृत्यु होती है तो उस मृतात्मा की शांति व कल्याण के लिये मृत्यु के बाद भी कई प्रकार के कर्मकांड किये जाते हैं। सबसे पहले तो दाह-संस्कार करके मृतक के पाञ्चभौतिक देह को पंचतत्वों में विलीन किया जाता है जिसकी विधि पूर्ववर्णित है।

मरने के बाद मृतात्मा (अंगुष्ठमात्र) जब देह से बाहर निकलता है तो यमदूत उसे यातना शरीर का बंधन प्रदान करके पाश में बांधकर मुहूर्तमात्र में भयङ्कर यममार्ग द्वारा यमलोक ले जाकर पुनः पृथ्वीलोक में वापस लाते हैं। यातना शरीर से ढंका हुआ वह जीव पीड़ित रहता है, यात्रा-श्रम-क्षुधा-तृष्णा-ताप आदि से व्याकुल और पीड़ित रहता है।

यातनादेहमावृत्य पाशैर्बद्ध्वा गले बलात् । नयतो दीर्घमध्वानं दण्ड्यं राजभटा यथा ॥ - गरुडपुराण

अशौच समाप्ति से पूर्व श्राद्ध नहीं किया जा सकता जिससे प्रेतत्व का निवारण होता है, इसलिये अशौच में भी प्रेत को यात्रा-श्रम-क्षुधा-तृष्णा-ताप आदि निवारण के लिये जल, पिण्डादि प्रदान किये जाते है जिसके दो भाग होते हैं सायंकृत्य व दिवाकृत्य। सायंकाल में जल, दुग्ध, माला, दीप आदि प्रदान किये जाते हैं जो घट टांगकर दिया जाता है। दिन में पिण्ड व तिलाञ्जलि दी जाती है।

कुछ लोग घटदान को लोकाचार मात्र समझने की भूल भी करते हैं किन्तु उनके भ्रम निवारण हेतु इसके शास्त्रोक्त प्रमाण भी प्रस्तुत किये जा रहे हैं :- तस्मान्निधेयमाकाशे दशरात्रं पयस्तथा। सर्वथा तापशान्त्यर्थमध्वश्रम विनाशनं ॥ - मत्स्यपुराण

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

॥ घटदान-विधि ॥

दाह करके घर आने के बाद यदि समय शेष हो तो सायंकाल में घट बांधे, यदि समय शेष न हो तो अगले दिन सायंकाल में घट बांधे। कहीं घर से बाहर पीपल आदि वृक्ष में घट बांधने का व्यवहार देखा जाता है तो कहीं घर के द्वार पर। लेकिन प्रक्रिया समान ही होती है। मिट्टी के छोटे से घड़े (चुकिया) के नीचे एक छोटा सा छेद करके उसमें कुशा देकर, घट के कंठ में मूँज की रस्सी बांधकर त्रिकाष्ठिका (तीन लकड़ियों को बांधकर) या किसी सहारे से दीवार में टांगा जाता है। घट के नीचे बालू की वेदी बना दी जाती है।

यह विधि दाह-संस्कार के दिन या अगले दिन घटदान वहां किया जाता है जहां गङ्गा तट पर दाह संस्कार किया गया हो और दाह संस्कार के समय ही अस्थि को गङ्गा में विसर्जित भी कर दिया गया हो। किन्तु जहां ऐसा नहीं होता वहां तीसरे दिन स्पर्शाशौच समाप्त होने के बाद चतुर्थ दिन अस्थिसंचय किया जाता है और अस्थिसंचय के बाद सायंकाल घटदान किया जाता है।

द्वार, पीपलवृक्ष आदि जगहों पर पहले-दूसरे या चौथे दिन कुलाचार से घटदान करना चाहिए । शवदाहकर्ता पवित्र होकर दक्षिणाभिमुख-अपसव्य मोड़ा, तिल, जल लेकर संकल्प करे -

संकल्प : ॐ अद्य ............... गोत्रस्य पितुः .............. प्रेतस्य सर्वपाप प्रशान्त्यध्व श्रम विनाश कामः अद्यादि दशरात्रं (रात्रि की गिनती करके ही तदनुसार रात्रि संख्या का उच्चारण करे) यावत् आकाशाधिकरणक जलदानमहं करिष्ये ॥ यह संकल्प मात्र प्रथम दिन होगा प्रत्येक दिन नहीं।

सर्वतापोपशमनमध्वश्रम निवारकं। प्रेततृप्तिकरं वारि पिब प्रेत सुखी भव॥ - श्राद्ध पारिजात से प्राप्त

सायंकाल घट के नीचे गाय के गोबर से चौका लगा कर पवित्र हो जाय । दीप, अगरबत्ती जला कर दक्षिणाभिमुख अपसव्य हो जाय । दो सर्वा (कच्चा सर्वा) लेकर एक में जल दूसरे में गाय का दूध व पत्ते पर फूल-माला रखे वहीं धूप, दीप आदि भी जला ले । बांया जांघ गिराकर बैठे।

श्मशानानल दग्धोऽसि परित्यक्तोऽसि बांधवैः। इदं नीरमिदंक्षीरमत्रस्नाहि इदं पिब॥ - श्राद्ध पारिजात से प्राप्त

मोड़ा, तिल, जल लेकर सभी वस्तु का उत्सर्ग करते हुए सभी वस्तुएं (धूप-दीप छोड़कर) घट में अर्पित करे -

जल :- ॐ अस्यां सन्ध्यायां‌ ............ गोत्र ............ प्रेत इदं जलं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अत्र स्नाहि ॥ जल वाले पात्र को बांये हाथ में लेकर मंत्र से उत्सर्ग करके दाहिने हाथ के पितृतीर्थ से जल घट में दे ।

दूध :- ॐ अस्यां सन्ध्यायां ............ गोत्र .......….. पितः प्रेत इदं दुग्धं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ इदं दुग्धं पिब॥ दूध वाले पात्र को बांये हाथ में लेकर उत्सर्ग करते हुए दाहिने हाथ के पितृतीर्थ से दूध घट में दे दे ।

माला :- ॐ अस्यां सन्ध्यायां ........... गोत्र पितः ............ प्रेत इदं माल्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ इदं माल्यं परिधेहि ॥ माला पर तिल, जल छींट कर माला घट में पहना दे ।

दीप :- ॐ अस्यां सन्ध्यायां ........... गोत्र पितः ........... प्रेत एष दीपः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अनेन पश्य ॥

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति