द्वादशाह कर्म

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" - मासिक श्राद्ध, सपिंडीकरण श्राद्ध, उत्सर्ग

मासिक श्राद्ध एकादशाह और द्वादशाह दोनों ही दिन किया जा सकता है क्योंकि शास्त्रों में दोनों ही दिन (अपकृष्ट होने पर) करने का विधान मिलता है। मिथिला में द्वादशाह के दिन अपकृष्ट मासिक श्राद्ध करने का पक्ष स्वीकार किया गया है। अस्तु द्वादशाह के दिन मासिक श्राद्ध और सपिंडीकरण श्राद्ध दोनों किया जाता है। मासिक श्राद्ध के पृथकत्व को अनेक प्रकार खंडित करते हुये तंत्र से ही करने की सिद्धि की जा चुकी है।

जब तंत्र से मासिक श्राद्ध किये जायेंगे तभी शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन संभव है अन्यथा उल्लंघन होगा ही होगा। जब मासिक श्राद्ध तंत्र से किया जायेगा तो कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां भी सामने आएंगी।

व्यावहारिक समस्या

जब इस प्रकार तन्त्र से मासिक श्राद्ध किया जायेगा तो एक व्यावहारिक समस्या उत्पन्न होगी उसका कारण उचित प्रकार से आसनादि न लगाना होगा। जिस प्रकार १० – १२ हाथ की भूमि पर मासिक श्राद्ध के आसनादि लगाये जाते हैं यदि यथावत लगाया जाये तो तन्त्र से बैठे-बैठे संपन्न नहीं किया जा सकता है और जहां तन्त्र से किया जाता है वहां ये समस्या होती भी है। श्राद्धकर्त्ता लगभग आसन से आगे कि क्रियायें खड़े-खड़े, चल-फिर कर करता है।

तन्त्र ही प्रशस्त और उचित है इसका तात्पर्य यह नहीं होगा कि फिर भी व्यावहारिक दोष के कारण शास्त्रविरुद्ध ही करें। तन्त्र से भी किया जायेगा तो बैठे-बैठे ही होगा, खड़ा होकर, चलते-चलते नहीं। इसके लिये यह आवश्यक है कि श्राद्धकर्ता जितने स्थान में बैठे-बैठे ही सभी क्रिया संपन्न कर सके आसनादि उतने ही स्थान में लगाये जांय।

लगभग ३ से साढ़े तीन हाथ की भूमि में आसनादि लगाने पर सभी क्रियायें एक ही स्थान पर बैठकर की जा सकेंगी अस्तु ३ हाथ की भूमि में ही आसनादि लगाकर करना होगा। आगे पिंडवेदी की बात आयेगी जो एक ही होगा और इतना बड़ा होगा कि सभी पिंड उसपर पड़ सकें। उल्लेखन एक ही (दक्षिणाग्र) किया जायेगा किन्तु पिण्ड अपसव्य (पश्चिम पूर्व) क्रम से दिये जायेंगे। अर्चन की सामग्रियां (गन्धादि में उत्सर्ग किया जाने वाला वस्त्रादि) यथाक्रम जितने बड़े स्थान पर लगें लगाया जायेगा, उत्सर्ग बैठे-बैठे हो जायेगा।

मासिक श्राद्ध आरम्भ करने से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी

मुख्यं श्राद्धं मासि मासि अपर्याप्तावृतुं प्रति । द्वादशाहेन वा कुर्यादेकाहे द्वादशापि वा ॥
मरीचि (वीरमित्रोदय में उद्धृत)

  • द्वादशाह को प्रातः काल उठकर स्नानादि करके श्राद्ध सामग्री आदि लेकर श्राद्धस्थला जाये एवं श्राद्धभूमि कल्पित करे। ध्यान रखें यह एक महत्वपूर्ण विधान है। आवश्यक लिपाई आदि के लिये निर्देश देकर स्नान करे।

  • ब्राह्मण को निमंत्रण स्वयं दे या प्रतिनिधि द्वारा दे, लेकिन ब्राह्मण को निमंत्रण भी पवित्र होकर ही दे ।

  • तत्पश्चात नित्यकर्म (संध्या-वन्दनादि) करे। संध्या-वंदनादि से ही सिद्ध हो जाता है कि प्रातःकाल न कि मध्याह्न में। वो धूर्ताचार्य हैं जो मध्याह्न में संध्या कराकर अपनी विद्वत्ता और शास्त्रनिष्ठा का पाखंड करते हैं।

  • सामान्यजन नित्यकर्म से रहित ही होते हैं अस्तु निःसंदेह ब्राह्मण ही करायेंगे और कराते हैं। उक्त स्थिति में सूर्यनारायण को अर्घ्य प्रदान करके १० बार गायत्री जप करे। फिर तर्पण, पंचदेवता-विष्णु पूजन करे।

  • द्वादशाह को प्रायश्चित्तांग गोदान की पुनरावश्यकता नहीं होगी।

  • श्राद्ध का आरम्भ मध्याह्न काल में करना चाहिये। मध्याह्न काल में श्राद्ध आरम्भ करने का तात्पर्य श्राद्ध आरम्भ करना है न की पाकारम्भ करना।

  • रक्षादीप पज्ज्वलन, दिग्बन्धन आदि करके पाचक को पाक करने कहे।

पाकक्रिया

श्राद्ध में भोजन के अन्न का उष्ण होना आवश्यक कहा गया है और यह तभी संभव है जब पाक होने के उपरांत श्राद्ध आरम्भ कर दिया जाय इसके लिये यह आवश्यक हो जाता है कि पाचक (पाककर्ता) भी अवश्य ही हो अन्यथा उचितकाल में श्राद्ध होना संदिग्ध रहेगा। समस्या उत्पन्न होगी। आगे सपिंडीकरण श्राद्ध भी करना होगा और यदि प्रारम्भ में ही दोनों का कर लिया जाय तो सपिंडीकरण का पाक उष्ण नहीं रहेगा।

यदि अशौच परक विघ्न की संभावना न हो तो एक साथ दोनों पाक न करे अपितु पहले मासिक श्राद्ध का पाक करके मासिक श्राद्ध आरम्भ करे और जबतक मासिक श्राद्ध संपन्न होगा तब तक सपिंडीकरण का पाक बनाये,ऐसा तभी संभव है जब एक पाचक भी हो। दो परिस्थति में दोनों पाक एक साथ किया जा सकता है और दोष का अभाव हो जायेगा :

  • यदि पाचक का सर्वथा अभाव हो तो।

  • यदि किसी अन्य सपिण्डादि की मृत्यु संभावित हो अर्थात विघ्न की संभावना हो तो।

पिण्ड निर्माण

पिण्ड निर्माण का जो व्यवहार मूर्खाचार्यों ने बना दिया है निंदनीय है, धिक्कार के योग्य है। श्राद्ध के आरम्भ में ही १४ पिण्ड निर्माण करा लेते हैं जो इनके मूर्खत्व को प्रकाशित करता है। भोजन से पूर्व पिण्डनिर्माण नहीं किया जा सकता क्योंकि पिण्डनिर्माण होने के पश्चात शेष अन्न ही पिण्डशेषान्न संज्ञक होता है अर्थात जो मूर्ख श्राद्ध के प्रारम्भ में ही पिण्ड निर्माण करा लेते हैं वो स्वयं के पांडित्य पर स्वयं ही हंस लें।

पिण्ड निर्माण उस काल में किया जाता है जब पिण्डदान करना हो उससे पूर्व नहीं, पिण्ड निर्माण के पश्चात् जो किञ्चित अवशिष्ट-रसादि हाथ में लगा रहता है उसी को पिण्डतलस्थ कुशा में पिंडभाजी को अर्पित किया जाता है अर्थात पिण्डनिर्माण के पश्चात् हस्तप्रक्षालन भी नहीं करना चाहिये अपितु पिण्डदान करके पिण्डतलस्थ कुशाओं में हाथ में जो पिण्ड का कुछ अवशिष्ट शेष हो या रसमात्र हो वही पिंडतलस्थ कुशा में पोंछे।

यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि प्रथम पिण्डनिर्माण के पश्चात् क्या शेष अन्न जो है वो पिण्डशेषान्न नहीं होगा क्या ? इसमें किञ्चित सावधानी की आवश्यकता है। चूँकि एक पाक से अनेक पिण्ड की आज्ञा शास्त्रप्राप्त है अस्तु अनेक पिण्ड निर्माण में कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु यदि एकत्रित पाक से ही पिण्ड निर्माण किया जायेगा तो शेष अन्न जो है वो पिण्डशेषान्न संज्ञक होगा।

इस दोष से बचने के लिये पृथक-पृथक पात्रों (ढकनी या पत्ता आदि) में १४ स्थानों पर पहले पाक को पृथक कर ले एवं क्रम से रखे ताकि पिण्डशेषान्न विकिरण करने में त्रुटि भी न हो। इस प्रकार प्रथम आदि पात्र से क्रमशः पिण्ड निर्माण, दान, कुशा में हाथ पोंछना, हस्तप्रक्षालन सभी क्रियायें करे।

शास्त्रानुकूल विधि समझें

“देशाचार तभी मान्य है जब वह शास्त्र के स्पष्ट सिद्धांतों का बाध न करे।”

विहितकाल में मासिक श्राद्ध, सपिण्डीकरण संपन्न करने हेतु स्वतंत्र पाचक होना आवश्यक है अन्यथा तन्त्र से करने पर भी एक न एक दोष उत्पन्न होगा ही होगा। या तो विहितकाल में नहीं होगा अथवा अन्न उष्ण नहीं रहेगा। विहितकाल निर्धारित है और उसी में करना चाहिये यह भी सुनिश्चित है, आपात स्थिति में अथवा प्रमादादि से विलम्ब होना स्वीकृत है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि मतिपूर्वक विहितकाल का अतिक्रमण किया जाय।

वर्त्तमान में जिस प्रकार से श्राद्ध किया जाता है उसमें अधिकांश विषय मतिपूर्वक शास्त्र का उल्लंघन सिद्ध होता है। ऐसी अवस्था में यजमान तो ब्राह्मण के अधीन होने से दोषमुक्त माना जायेगा किन्तु सम्पूर्ण दोष (शास्त्रविरुद्ध कर्म का) ब्राह्मण का ही होता है। अंत में संक्षित्प रूप से बिंदुवार क्या-क्या शास्त्रविरुद्ध किया जा रहा है यह भी स्पष्ट करना अनिवार्य है, मूर्खाचार्यों को यह भी ज्ञात नहीं है। संशोधन का तात्पर्य यही है कि जो कुछ शास्त्रविरुद्ध सिद्ध हो गया उसका निस्तारण करते हुये शास्त्रानुकूल विधि :

  • विहितकाल का उल्लंघन किया जा रहा है जिसको खंडित करते हुये यहां विहितकाल में करना स्थापित किया गया है।

  • एक पाक होने पर भी पृथक-पृथक मासिक किया जा रहा है, इस विषय में तन्त्र को सिद्ध किया गया है।

  • सव्यापसव्य का त्याग करते हुये माला बनाकर श्राद्ध किया जा रहा है, जिसको खंडित किया गया है।

  • मंत्रादि को लोप किया जा रहा है (देवताभ्यः, मधुव्वाता), जिसको खंडित किया गया है।

  • वेदमन्त्र में परिवर्त्तन (ऊह) किया जा रहा है, यहां वेदमंत्रों का यथावत प्रयोग किया गया है क्योंकि ऊह नहीं किया जा सकता। वेदमंत्र में किञ्चित परिवर्तन होने से वह स्खलित होकर वेदबाह्य हो जाता है।

  • जब तन्त्र किया जाता है तो तन्त्र निषेध का पालन नहीं किया जाता, इसका खंडन करते हुये अर्घ्य, अक्षय्योदक, पिण्ड, अवनेजन (अत्रावन और प्रत्यवन) में तन्त्र नहीं किया जा सकता ऐसा सिद्ध किया गया है।

  • अनुष्णान्न परिवेषण किया जा रहा है, इसका खंडन करते हुये उष्ण अन्न परिवेषण की विधि स्थापित की गई है। एक दिन में ही करना है स्वयं इस विषय का ध्यान रखे कि प्रमादवश पाक और श्राद्ध के मध्य समयांतराल अधिक न हो। प्रमाद न करके विहितकाल में श्राद्ध करने का प्रयत्न करे।

  • आचमन का विलोप कर दिया गया है, यहां आचमन को भी प्रमाणानुसार स्थापित किया गया है।

  • दक्षिणा हस्तोदक पूर्वक महापात्र को दिया जा रहा है जिससे अपात्रकत्व खंडित होता है, यहां सम्पूर्ण रूप से अपात्रकत्व विधि स्थापित की गई है।

यदि हम एक विसंगति की चर्चा करें तो वो है भूमि संस्कार, सपिण्डीकरण में इसे भूमि संस्कार न समझकर पिण्डाधार क्रिया समझ लिया गया और प्रेत-पिण्ड आधार में एवं पितृपिण्ड आधार में दोनों ही स्थानों पर उल्लेखन, अंगारभ्रमण किया जाता है जबकि सामान्यतः वेदी एक ही होती है। यहां स्पष्ट यह होता है कि वास्तव में प्रेतपिंडवेदी और पितृपिंडवेदी पृथक होनी चाहिये तो दोनों ही वेदी पर भूमिसंस्कार अनिवार्य है और किया जायेगा किन्तु जब वेदी एक हो जाती है तो एक ही वेदी पर दो बार भूमिसंस्कार अनपेक्षित है, औचित्यविहीन है। तीन रेखा प्रामाणिक है किन्तु एक ही दर्भ से होगा न कि तीन दर्भ से :

किन्तु यह सूक्ष्म अन्वेषण है जो मात्र शास्त्रज्ञों में भी जो शास्त्रनिष्ठ हैं उन्हीं की प्रज्ञा का विषय है, सबकी प्रज्ञा पहुँच ही नहीं रखती। अब पुनः प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या एक ही वेदी पर प्रेतपिंड और पितृपिंड दिया जाना उचित है तो इसका उत्तर है नहीं, प्रेतपिण्ड की वेदी भिन्न होनी ही चाहिये, पिण्डच्छेदन का पश्चात् पिण्ड-सम्मलेन में प्रेतपिण्ड पितृवेदी पर आएगा ही नहीं अपितु पिंड से सम्मिलित भी किया जायेगा। अब विद्वद्जन विचार करें जो श्राद्ध पद्धति प्रचलन में है वह भी इस विषय को स्पष्ट करता है कि भिन्न-भिन्न वेदी बनायीं जायें किन्तु :

मण्डलं चतुरस्रं वा दक्षिणाप्रवणं शुभम् । त्रिरुल्लिखेत्तस्य मध्यं दर्भेणैकेन चैव हि ॥
कूर्मपुराण/उत्तरभाग/२२/५०

  • लगभग सर्वत्र एक ही वेदी बनाई जाती है अथवा नहीं ?

  • क्या मूर्खाचार्यों ने शास्त्रविस्थापन में कोई भी कमी छोड़ा है ?

  • क्या वर्त्तमान कर्मकाण्डियों के पास तनिक भी विवेक अवशिष्ट मात्र भी शेष है ?

  • इनको मूर्खाचार्य कहकर क्यों न दुत्कारा जाय ?

श्राद्ध विषयक अनेकानेक विमर्श पूर्वकृत हैं और समझने के लिये अवलोकनीय हैं किन्तु संशोधन के विषय में ही समझने के लिये एक विशेष आलेख भी है जिसका लिंक यहां समाहित किया गया है जो अवलोकन करना चाहें कर सकते हैं। इस आलेख से आपको ज्ञात होगा कि वर्त्तमान काल में श्राद्धकर्म पूर्णरूपेण शास्त्रविरुद्ध स्वरूप ले चुका है। आलेख अवलोकन करना चाहें तो यहां क्लिक करें।

सपिण्डीकरण में देव-पितृ-प्रेत स्थान

इसी प्रकार मूर्खाचार्यों को प्रेतस्थान के विषय में भी वृथाप्रलाप करते देखा जाता है और सर्वत्र देखा जाता है। किसी के पास न तो कोई प्रामाणिक तथ्य होता है न ही समझने की प्रज्ञा, अल्पसंख्यक होने के कारण और अपयशभयात् भी विद्वद्जन ही अपनी वाणी को विराम देते हैं अथवा यदि स्पष्ट कर भी दें तो ये मदांधी मूर्खाचार्य दुराग्रहवश शास्त्र और विद्वान दोनों की वंचना तक भी करते हैं।

जिन मूर्खाचार्यों को इतनी प्रज्ञा नहीं कि विषय को समझ भी सकें वो अपना पांडित्य समझकर अपण्डितत्व ही स्थापित कर लेते हैं श्राद्ध के स्वरूप को ही विकृत कर चुके हैं एवं श्राद्ध ही क्यों कहें दृष्टि का विस्तार करने पर तो सम्पूर्ण कर्मकांड ही विकृत दृष्ट हो रहा है। शास्त्र की अवहेलना करके शास्त्रविरुद्ध में प्रवृत्त, कर्मकांड के स्वरूप को नष्ट-भ्रष्ट कर देने वाले ये मूर्खाचार्य दुत्कारने-धिक्कारने योग्य ही हैं एवं मैं तो निःसंदेह सुधार होने तक ऐसे मूर्खाचार्यों को नहीं छोड़ने वाला।

स्पष्ट रूप से सावधान कर रहा हूँ मूर्खाचार्यों यथाशीघ्र विवेक का आश्रय ग्रहण करो और शास्त्रसिद्ध विषयों में आस्थावान् बन जाओ, अन्यथा तुम्हारे कुकर्मों (कर्मकांड को नष्ट-भ्रष्ट करना) को इस प्रकार से जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत करूँगा कि तुम्हारी वंचना जनसामान्य करने लगेगी, तुम्हारा अपण्डित होना इस प्रकार से सिद्ध कर दूंगा और तुम्हारा यजमान वर्ग भी तुम्हें अपण्डित समझ जायेगा।

यहां सामान्य पुरोहित वर्ग को ग्रहण नहीं किया गया है, यह वर्ग तो स्वयं अल्पज्ञता स्वीकार करता ही है इसे अपेक्षित ज्ञान देने की आवश्यकता है, विद्वद्जनों के प्रति भी नहीं है वो तो शास्त्रसिद्ध विषय को अस्वीकार नहीं करते एवं शास्त्रीय विमर्श में शास्त्र का ही आश्रय लेते हैं। केवल और केवल ऐसे मूर्खाचार्य को दुत्कारा-धिक्कारा जा रहा है जो अपने पिता के श्राद्ध में भी एकोद्दिष्ट का काल अपराह्न बताने की धृष्टता तक कर देते हैं अथवा मात्र व्याकरण/ज्योतिष/साहित्य आदि का ज्ञाता होने के कारण स्वयं कर्मकांड का ज्ञाता समझने नहीं लगते अपितु स्थापित भी करते हैं।

सपिण्डीकरण में देव-पितृ-प्रेत स्थान विषयक एक श्लोक “आदौ देवः ततो प्रेतः पितरस्तदनंतरं” जो मुझे किसी के मुख से प्राप्त हुआ था उसका मूल उन्होंने जो बताया वहां मिला ही नहीं अपितु वहां क्रम भी इससे भिन्न मिला। “सुगम श्राद्ध विधि” का संपादन करते समय मैं भी मात्र व्यावहारिक दृष्टिकोण से ही विचार करता था अस्तु निष्कर्ष यही देना पड़ा कि जहां जैसा चल रहा है वही करे, सब सही है। किन्तु अब शास्त्र के आधार पर ही विचार किया जायेगा। एक प्रमाण देखें :

सपिण्डीकरणे श्राद्धे देवपूर्वं नियोजयेत्। पितॄनावाहयेत्तत्र पृथक्प्रेतं विनिर्दिशेत्॥
मत्स्यपुराण/१८/१७, पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्ड)/१०/२३ – २४, कूर्मपुराण/उत्तरभाग/२३/७६ – ७७

यह प्रमाण स्पष्टरूप से सिद्ध करता है कि देव और पितृ से पृथक स्थान में प्रेत का स्थान सुनिश्चित करें, पृथक का तात्पर्य दोनों के मध्य में भी नहीं होगा यह भी है। विश्वेदेव का निमित्त पितृश्राद्ध ही है प्रेतश्राद्ध नहीं। प्रेतश्राद्ध के निमित्त सपिण्डी हेतु पितृ श्राद्ध है। स्पष्ट हो जाता है देव कर पितर के आसन से पृथक तो प्रेत का आसन वेदी आदि होगा ही साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि मध्य में भी नहीं होगा। क्योंकि मूर्खाचार्य मध्य में होना ही कहते हैं। मध्य में पितर ही होंगे इसका प्रमाण :

उत्तरेऽवटे विश्वेदेवयोः पादान् प्रक्षाल्ल्य मध्यमे पितॄणां दक्षिणे प्रेतस्य पादौ प्रक्षाल्ल्य तानाराध्य ताम्बूलं दद्यात् ।
इत्याग्निवेश्यगृह्यसूत्रे तृतीयप्रश्ने प्रथमोऽध्याये

मध्य भाग पितरों का ही है “मध्यमे पितॄणां” अर्थात यह तो स्वीकार्य हो सकता है कि देव पश्चिम हो सकते हैं किन्तु प्रेत मध्य में नहीं हो सकता। देव पूर्व रहें तो प्रेत पश्चिम होगा एवं पितर मध्य में होंगे, इसी प्रकार यदि देव पश्चिम हों तो प्रेत पूर्व होगा और मध्य में पितर होंगे यह तो प्रमाण से सिद्ध हो जाता है एवं इस विवाद का समापन भी हो जाता है। यह विवाद पश्चिम में देव करने पर होता है कि प्रेत पूर्व में नहीं हो सकता, पश्चिम में होना चाहिये।

प्रमाण से सिद्ध कर दिया गया है कि प्रेत मध्य में नहीं हो सकता, मध्य में पितर ही होंगे। इस विषय में खंडन का अवकाश यदि है तो वो यह कि देव पश्चिम ही होंगे पूर्व नहीं। प्रमाण पूर्वक यदि इस तथ्य को स्थापित कर दिया जाय तो पूर्व में देव पक्ष खंडित हो जायेगा अन्यथा नहीं। खंडन का स्वागत करने हेतु उत्सुक हूँ एवं प्रामाणिक खंडन को स्वीकार किया जायेगा, खंडनकर्ता का नाम-चित्र भी समाहित किया जायेगा। यदि देव पूर्व हों तो प्रेत पश्चिम होगा और यदि देव पश्चिम हों तो प्रेत पूर्व होगा।

दोनों ही स्थिति में मध्य में पितर रहेंगे प्रेत नहीं होगा। वृद्धिश्राद्ध में आसनादि (स्थान क्रम) अवलोकन करते हैं :

मातरः प्रथमं पूज्याः पितरस्तदनन्तरम्। ततो मातामहा राजन्विश्वेदेवास्तथैव च॥
प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकैः॥
मत्स्यपुराण/१७/६५ – ६६

वृद्धिश्राद्ध में प्रदक्षिण (सव्य) क्रम स्पष्ट है जिसका तात्पर्य यदि कर्त्ता पूर्वाभिमुख हो तो उत्तर से दक्षिण एवं यदि उत्तराभिमुख हो तो पश्चिम से पूर्व है यदि पश्चिमाभिमुख हो तो दक्षिण से उत्तर और यदि (मान लिया जाय) दक्षिणाभिमुख हो तो पूर्व से पश्चिम होगा। अपसव्य क्रम से एक छोड़ पर मातृपक्ष तो दूसरे छोड़ पर मातामह पक्ष एवं उसके पश्चात् विश्वेदेव होंगे। ये आसन (स्थान) मात्र का क्रम स्पष्ट करता है। वृद्धिश्राद्ध में यह क्रम सामान्य पितृकर्म के क्रम से विपरीत है वृद्धिश्राद्ध के अतिरिक्त अन्यत्र अपसव्य (अप्रदक्षिण) क्रम होता है। अब इस क्रम से निर्धारित करके देखते हैं :

श्राद्धकर्त्ता दक्षिणाभिमुख है (देव में पूर्व-उत्तर आवश्यकतानुसार होगा), इसके समक्ष अपसव्य (अप्रदक्षिण) क्रम का तात्पर्य है पश्चिम से पूर्व। प्रेत पृथक होगा, पितर और देव का क्रम क्रमशः इस प्रकार पश्चिम से पूर्व स्थापित होता है – पितामह, प्रपितामह, वृद्धप्रपितामह, देव। उपरोक्त क्रम में प्रेत का स्थान पृथक पश्चिम में शेष बचता है क्योंकि पितर के निकट ही होगा एवं पश्चिम पूर्व कहने वालों को भी उचित लगेगा किन्तु एक दुराग्रह तो और पाल बैठे हैं कि देव का आसन पश्चिम ही होगा। इसीलिये तो मूर्खाचार्य कहता हूँ विवेकरहित, शास्त्रविरुद्ध, मदांध व्यक्ति दुराग्रह नहीं पालेगा तो क्या शास्त्र का पालन करेगा ?

प्रमाणपूर्वक सिद्ध किया गया तथ्य भी मूर्खाचार्यों को स्वीकार्य नहीं होता है और यदि कहें कि तुम अपना प्रमाण दो तो मुंह फाड़ देते हैं, कुछ बड़े मूर्खाचार्य ऐसा सुना देंगे जिसका मूल भी नहीं बता सकते और कुछ भी अनर्गल ऐसा बतायेंगे की वो पुस्तक (ग्रन्थ नहीं) अप्राप्य हो, स्मृति-पुराणादि ही मूल ग्रन्थ होते हैं। अरे मूर्खाचार्यों तुम जो प्रमाण देते हो वो दिखाना भी तुम्हारा ही दायित्व बनता है ये आवश्यक नहीं कि वो ग्रन्थ अगले के लिये भी उपलब्ध हो किन्तु तुम तो उपलब्ध सिद्ध करके ही प्रमाण बोलते हो न यदि तुम्हारे लिये भी अनुपलब्ध ही है तो वो प्रमाण तुमने दिया किस आधार से ?

“सपिण्डीकरणे श्राद्धे देवपूर्वं नियोजयेत्” – ये आवाहन और स्थान दोनों को ही स्पष्ट करता है; क्योंकि दोनों ही उचित है, किन्तु वास्तव में यहां स्थान (आसनादि) ही स्पष्ट किया गया है। देव का पूर्व से तात्पर्य पहले देव का करे यह तो है ही साथ ही यह भी है कि देव का पूर्व दिशा में करे। “पितॄनावाहयेत्तत्र” उसके पश्चात् पितरों का आवाहन करे यह आवाहन करने का क्रम नहीं कह रहा है क्योंकि प्रथम तो प्रेत का ही किया जायेगा, यह स्थान को ही स्पष्ट कर रहा है।

पूर्व में देव हो गये एवं कर्त्ता पूर्वाभिमुख होगा, तत्र कहां तो वहीं दक्षिणाभिमुख होने पर सामने अपसव्य क्रम से। “पृथक्प्रेतं विनिर्दिशेत्” किससे पृथक – पितरों से भी पृथक तो कहां स्थान मिला सबसे पश्चिम भाग में। क्योंकि दोनों ही उचित है, किन्तु वास्तव में यहां स्थान (आसनादि) ही स्पष्ट किया गया है। एक और अकाट्य प्रमाण दे रहा हूँ जो इस क्रम को पूर्णतः सिद्ध करता है :

चतुरो निर्वपेत्पिण्डान्पूर्वन्तेषु समापयेत् ॥ गरुडपुराण/२/५/५८

यहां ये तो पूर्णतः सिद्ध है कि ये सपिंडीकरण से ही संबद्ध है क्योंकि चार पिंड तो सपिंडीकरण में ही होते हैं। अब देखें “पूर्वं तेषु समापयेत्” का तो तात्पर्य यही होता है कि

अब यहां फिर मूर्खाचार्यों के लिये आसनक्रम में अप्रदक्षिण का पेंच आयेगा कि देव यदि पूर्व दिशा में हों तो यह क्रम भंग होता है क्योंकि प्रथम तो देव का ही कर्म होगा अर्थात पूर्व दिशा में आरम्भ होगा। नहीं मूर्खों ऐसा तुम्हारी प्रज्ञा की कमी के कारण है अप्रदक्षिण क्रम मात्र पितरों के लिये है – “पितॄणामप्रदक्षिणं” अर्थात पितरों का अप्रदक्षिण क्रम से आसनादि होगा, इसमें देव सन्निहित हैं ही नहीं।

निष्कर्षतः पश्चिम में विश्वेदेव का स्थान देना स्पष्ट खंडित नहीं होता अर्थात इसका पालन किया जा सकता है किन्तु उस अवस्था में प्रेत का स्थान पूर्व होगा मध्य में नहीं। जो लोग पंडित प्रेत का स्थान पश्चिम होने का पक्ष ग्रहण करते हैं वो कदापि अनुचित नहीं कहे जा सकते किन्तु उनका अनुचित पक्ष यह होता है कि एकांगी विचार करते हैं, यदि प्रेत का स्थान पश्चिम होगा तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है किन्तु इसमें विश्वेदेव का स्थान पूर्व होगा जिसका विचार नहीं किया जाता।

सभी पक्षों पर विचार करना आरम्भ करें मात्र एक दृष्टिकोण से नहीं। एक दृष्टिकोण से विचार करने वालों के लिये यहां जो इतना व्यापक और विस्तृत विश्लेषण किया गया है उसमें भी अनेक स्थानों पर त्रुटियां ही दिखेंगी दोष उनकी दृष्टि का होगा क्योंकि सर्वांग विचार ही नहीं करेंगे। इतने तथ्यों को यहां स्पष्ट करते हुये प्रामाणिक रूप से उत्तर दिया गया है सिद्ध किया गया है जो करने के लिये कहा जाय तो आजीवन नहीं कर सकते ऐसे व्यक्ति भी दोष एक दृष्टिकोण मात्र से गलत कहने में नहीं चूकते हैं इसी कारण मूर्खाचार्य सिद्ध होते हैं, क्योंकि विचार करने का भी तरीका है।

सपिंडीकरण श्राद्ध का उचित काल

सपिंडीकरण श्राद्ध एक विशेष श्राद्ध है और विधिपूर्वक के नाम पर द्वादशाह को एक-एक मासिक कहकर कराने वाले नितांत रूप से सपिण्डीकरण निषिद्धकाल में ही करते हैं। विधिपूर्वक एक मासिक करने का तात्पर्य यह है कि न्यूनतम ३५ मिनट/प्रति मासिक और ये विधिपूर्वक कराने वाले मूर्खाचार्य सभी विधियों, अनेकों मंत्रों का विलोप करके १२ मिनट में मासिक कराकर तीसमारखां बनते फिरते हैं, अरे नरकगामी बन गये हो आज तक जितना कराया अज्ञानता के नाम पर दोषमुक्त हो सकते हो किन्तु अब जो कराओगे वो अज्ञानता में तो नहीं होगा न।

स्पष्ट कर दिया गया न कि एक-एक करके मासिक कराते तो हो किन्तु मंत्रों का भी लोप कर देते हो, आचमन, सव्यापसव्य सबकुछ समाप्त करके करते हो अर्थात विधिविरुद्ध करते हो एवं पूर्वाह्ण से अपराह्न तक करके शास्त्रविहित काल का भी अतिक्रमण करते हो। प्रमादादि से अतिक्रमण होने में छूट है किन्तु मतिपूर्वक अर्थात एक-एक करके जानबूझकर अतिक्रमण करना दोषपूर्ण है।

एकोद्दिष्ट श्राद्ध का मुख्यकाल कुतप है जो दिन का ८वां मुहूर्त होता है इससे आगे अधिक के लिये मध्याह्न भी प्रशस्त है जिसका औसत तात्पर्य २ घंटा २४ मिनट मध्याह्नकाल होता है। इसके पश्चात् अपराह्न काल में पार्वण प्रशस्त है एवं सायाह्न और चतुर्थ प्रहर निषिद्ध है। सपिंडीकरण पार्वण विधि के अंतर्गत आता है अर्थात अपराह्न प्रशस्त है। अपराह्न के पश्चात सायाह्न ही आता है और ये लोग सायाह्न का क्या कहें रात्रि में एकोद्दिष्ट (एकादशाह को) भी कराते हैं, सपिंडीकरण तो कराते ही हैं।

विहित काल अर्थात प्रशस्त काल अपराह्न होने का तात्पर्य है पूर्णरूपेण संपन्न करने का प्रयास करो, यदि संपन्न न हो सके तो आगे के काल में भी किया जा सकता है किन्तु आरम्भ विहित काल में हो सके ऐसा सुनिश्चित करना ही होगा। विघ्नादिवश यदि विहित काल में आरम्भ भी न किया जा सका तो भी आगे किया जा सकता है किन्तु विघ्न-प्रमाद कहां होता है सबके-सब मतिपूर्वक ही ऐसा करते हैं।

प्रातःकाले मुहूतांस्त्रीन्संगवस्तावदेव तु। मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तः स्यादपराह्णस्ततः परम् ॥४॥
सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत्। राक्षसीनाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु ॥५॥
अह्नो मुहूर्ता विख्याता दशपंच च सर्वदा। तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः ॥६॥
ऊर्ध्वं मुहूर्तात्कुतपाद्यन्मुहूर्तचतुष्टयम्। मुहूर्तपञ्चकं चैव स्वधाभवनमिष्यते ॥१०॥
स्कन्दपुराण/७ (प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्य/२०५

समझाने पर भी नहीं समझते ऐसे दुराग्रह से युक्त मदान्धों को ही मूर्खाचार्य कहा जा रहा है क्योंकि विद्वान तो ऐसा दुराग्रह रखते ही नहीं, त्रुटि को स्वीकार करके सुधार करना विद्वानों का अनिवार्य लक्षण होता है। आओ सपिण्डीश्राद्ध के विहितकाल को भलीभांति समझ लेते हैं यदि १२ घंटे का दिन मान लें और सूर्योदय-सूर्यास्त ६ बजे माने तो दिनमान ३० घटी, १२ घंटे का होगा। दिन का पांच भाग करने पर प्रत्येक भाग २ घंटा २४ मिनट का होगा। मूर्खाचार्यों देखो और समझो :

अब देखो सपिण्डीकरण का विहित या पशस्त काल दिन १:१२ से ३:३६ बजे तक होता है जो सूर्योदय-सूर्यास्त व दिनमान से कुछ भिन्न होगा। इससे आगे सायाह्न है जो सभी श्राद्धों के लिये निषिद्ध है अर्थात पूर्व में जो श्राद्ध आरम्भ हो गया हो वह तो किया जा सकता है किन्तु जिस श्राद्ध का आरम्भ ही नहीं किया गया हो उसका आरम्भ नहीं कर सकते। यदि विघ्नवश आरम्भ न हो सका हो (जैसे वर्षा आदि होने पर) तो आरम्भ भी किया जा सकेगा।

सपिंडीकरण श्राद्ध का उचित काल

किन्तु न तो प्रमाद हो रहा है न ही विघ्न हो रहा है फिर भी निषिद्ध काल में ही करने का दुराग्रह बांध बैठे हो तो मूर्खाचार्य हो, धिक्कार के योग्य हो। एक-एक मासिक करके करना स्वयं ही विधिविरुद्ध सिद्ध होता है एवं उसके कारण सपिंडीकरण पूर्णतः निषिद्ध काल में होता है और या मतिपूर्वक (इस दुराग्रह के कारण की एक-एक करके ही मासिक किया जायेगा) होता है। आशा है विद्वद्जन तो इस विषय को भलीभांति समझ ही गये होंगे और ग्रहण भी करेंगे।

इस विश्लेषण को अब और अधिक विस्तार देना उचित नहीं होगा, अब मूल विषय संशोधित सपिंडीकरण विधि है और उसको समझने के लिये कुछ विमर्श अनिवार्य था अन्यथा ये मूर्खाचार्य इस संशोधित विधि को ही गलत कहते, इनको धिक्कारा इसीलिये गया है कि तुम अपनी त्रुटियों को देखो और सुधार करो।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति