दशगात्र

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" - दशगात्र पिण्डदान

गात्र का अर्थ शरीर होता है। अशौच मध्य में क्षौरकर्म दिन तक प्रेत के निमित्त १० पिण्ड उत्सर्ग किये जाते हैं जो प्रेत का भोजन होता है और उससे शुभाशुभ कर्मफल भोग करने के लिये प्रेत के शरीर का निर्माण (पुष्टि) होती और और अंगुष्ठमात्र का शरीर हस्तप्रमाण आकार प्राप्त करता है। इसका प्रमाण गरुडपुराण में इस प्रकार मिलता है : दग्धेदेहे पुनर्देहेः पिण्डेरुत्पद्यते खग। हस्तमात्रः पुमान् येन पथि भुंक्ते शुभाशुभं॥ इस प्रकार देह की पुष्टि के लिये दश दिन दिया जाने वाला पिण्ड दशगात्र संज्ञक होता है।

शिरस्त्वाद्येन पिण्डेन प्रेतस्य क्रियते सदा । द्वितीयेन तु कर्णाक्षिनासिकाश्च समासतः ॥
गलांसभुजवक्षांसि तृतीयेन यथाक्रमात् । चतुर्थेन तु पिण्डेन नाभिलिंग
गुदानि च ॥
जानुजंघे तथा पादौ पंचमेन तु सर्वदा । सर्वमर्माणि षष्ठेन सप्तमेन तु नाडयः ॥
दन्तलोमाद्यष्टमेन वीर्यं तु नवमेन च । दशमेन तु पूर्णत्वं तृप्तता क्षुद्विपर्ययः ॥

पिण्डों के भाग भी किये जाते हैं। गरुडपुराण में बताया गया है कि दशगात्र के पिण्डों के चार भाग किये जाते हैं जिसमें से दो भाग पञ्चभूतों का होता है, एक भाग यमदूतों का और एक भाग प्रेत को प्राप्त होता है।

अतो दद्यात्सुतः पिण्डान दिनेषु दश सुद्विज। प्रत्यहन्ते विभाज्यंते चतुर्भागैः खगोत्तम्॥
भागद्वयं तु देहस्य पुष्टिदं भूतपञ्चके। तृतीयं यमदूतनां चतुर्थं सोपजीवति॥
- गरुडपुराण

  • दशगात्र में गात्र निर्माण करने वाले 10 पिण्ड दिये जाते हैं।

  • लेकिन तिलाञ्जलि और तिलतोय पात्र प्रतिदिन बढ़ते क्रम से दिये जाते हैं। पहले दिन १ से अंतिम दिन १० तक।

  • प्रथम पिण्ड जिस वस्तु की दी गयी हो सभी पिण्ड उसी वस्तु की देनी चाहिये।

  • जब त्रिरात्राशौच हो तो उसमें प्रथम दिन १, द्वितीय दिन ४ और तृतीय दिन ५ पिण्ड दे।

  • अशौच शङ्कर होने पर जब अशौचदिन में वृद्धि हो रही हो तो प्रथम मृतक के ९ पिण्ड देने के बाद न दे, दशम पिण्ड क्षौरकर्म के दिन दे।

  • यदि अशौचशङ्कर होने पर दिन में वृद्धि न हो रही हो तो द्वितीय मृतक के १० दिन पूर्ण नहीं होंगे। उसके लिये प्रतिदिन १ पिण्ड देकर शेष पिण्ड क्षौरकर्म के दिन दे।

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

पिण्डदाता स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करे । मिट्टी के नए बर्तन में पाककर्म कर ले । बालु की दक्षिणप्लव वेदी बना कर वेदी पर दक्षिणाग्र तीन कुश रख दे । पवित्रीकरण करके धूप, दीप जला ले ।

अपसव्य-दक्षिणाभिमुख होकर एक पीपल के पुड़े में तिल, चंदन, जल देकर बांये हाथ में ले ले । बायां जंघा गिराकर बैठते हुए दाहिने हाथ में मोड़ा, तिल, जल लेकर अत्रावन का उत्सर्ग करे :-

अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

अत्रावन का उत्सर्ग करके पितृतीर्थ से कुछ जल वेदी के कुशों पर गिरावे व कुछ जल शेष रखकर अपने बांए भाग में प्रत्यवन वास्ते पूड़ा रख ले वाजसनेयी (छन्दोगी का प्रत्यवन अलग पुड़े से होता है)। भात में तिल, मधु, घी, दुग्धादि मिलाकर बिल्वाकार पिण्ड बना कर बांए हाथ में ले ले, दाहिने हाथ में मोड़ा-तिल-जल लेकर पिण्डोत्सर्ग करे :

पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत एष शिरः पूरकः प्रथमः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ पिण्डोत्सर्ग कर वेदी के कुशों पर दोनों हाथ से पिण्ड प्रदान करे । दोनों हाथों का तात्पर्य यह भी है कि पिण्ड वेदी पर स्थिरता पूर्वक रखा जा सके।

फिर वाजसनेयी अत्रावन का अवशेष जल ही प्रत्यवन रूप में दे और छन्दोगी नये पूड़े में तिल, जल, चंदन, फूल दे बाएं हाथ में लेकर दाहिने हाथ में मोड़ा-तिल-जल लेकर उत्सर्ग करे :

प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ प्रत्यवन का उत्सर्ग कर जल पिण्ड पर दे ।

पिण्ड पूजा बिना मंत्र के ही करे। पिण्ड पूजनार्थ :- चंदन, फूल, धूप, दीप, केला, पान, सुपारी, दूध, शीतल जल उनी धागा आदि पिण्ड पर चढ़ावे ।

फिर मोड़ा, तिल, जल लेकर मंत्र पढ़ते हुए पिण्ड के उत्तर भाग में एक बार गिरावे :

तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एष तिलतोयांजलिस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ पीपल के एक पूड़े में तिल, जल लेकर उत्सर्ग करके पिण्ड के उत्तर भाग में रखे :-

तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत इदं तिलतोयपात्रं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ (छन्दोगी में विशेषता ये है कि अत्रावनादि के उपरांत जलस्पर्श कर ले)। फिर त्रिकुश, तिल, जल लेकर दक्षिणा करे :-

दक्षिणा :- ॐ अद्य ....….. गोत्रस्य पितुः .......... प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् शिरः पूरक प्रथम पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं ........ गोत्राय ........ शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

दक्षिणा करके पिण्डादि सभी वस्तु जल में प्रवाहित कर दें । इसी तरह प्रतिदिन एक-एक पिण्ड-दान करना चाहिए । अत्रावन एवं प्रत्यवन मंत्रों में परिवर्तन नहीं होगा । पिण्डदान और दक्षिणा के मंत्रों में अंग एवं दिन वाचक दो परिवर्तन होगा । तिलतोयांजलि और तिलतोयपात्र के मंत्रों में विशेष अंतर होगा यह ध्यान रखें । इस प्रकार कुल ५५ तिलतोयांजलि और तिलतोयपात्र देना चाहिए ।

दशगात्र विधि

प्रथम-पिण्ड-दान :

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

द्वितीय-पिण्ड-दान

प्रथम दिन के तरह ही दूसरे दिन भी अत्रावन-पिण्डदान व प्रत्यवन प्रदान कर दो तिलतोयांजलि देकर दो तिलतोयपात्र प्रदान करे :

  • अत्रावन : ॐ अद्य ........... गोत्र पितः ........... प्रेत (…..… गोत्रे मातः ......... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत कर्णाक्षिनासापूरकः एष द्वितीयः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एतौ द्वौ तिल तोयांजली ते मया दीयेते तवोपतिष्ठेताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एते द्वे तिलतोयपात्रे ते मया दीयेते तवोपतिष्ठेताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् कर्णाक्षिनासापूरक द्वितीय पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं ......... गोत्राय ........ शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

तृतीय-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत गलांसभुजवक्षःपूरकः एष तृतीयः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते त्रयः तिल-तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि त्रीणि-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् गलांसभुजवक्षः पूरक तृतीय पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं ............ गोत्राय ......... शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

चतुर्थ-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत नाभिलिंगगुद-पूरक एष चतुर्थः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते चत्वारः तिल-तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि चत्वारि-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् नाभिलिंगगुदपूरक पूरक चतुर्थ पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं ........... गोत्राय ...........शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

पंचम-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत जानुजंघापाद-पूरक एष पंचमः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते पंच तिल-तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि पंच-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् जानुजंघापादपूरक पंचम पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं .......... गोत्राय .......... शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

षष्ठ-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत सर्वमर्म पूरक एष षष्ठः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते षट् तिल-तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि षट्-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् सर्वमर्मपूरक षष्ठ पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं .......... गोत्राय ........ शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

सप्तम-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत सर्वनाड़ी पूरक एष सप्तमः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते सप्त तिल-तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि सप्त-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् सर्वनाड़ीपूरक सप्तम पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं ............ गोत्राय .......... शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

अष्टम-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत नख-दन्त-लोमादि पूरक एष अष्टमः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते अष्ट तिल-तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि अष्ट-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् नखदन्तलोमादिपूरक अष्टम पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं .......... गोत्राय .......... शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

नवम-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत वीर्य पूरक एष नवमः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते नव तिल-तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि नव-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् वीर्यपूरक नवम पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं .......... गोत्राय ........... शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

दशम-पिण्ड-दान

  • अत्रावन : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ......... प्रेत (…… गोत्रे मातः ....... प्रेते) अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • पिण्ड : ॐ अद्य ......... गोत्र पितः ...….. प्रेत पूर्णत्व-तृप्तता-क्षुद्विपर्यय-पूरक एष दशमः पिण्डस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • प्रत्यवन : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ........ प्रेत अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

  • दो तिलतोयांजलि : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः .......... प्रेत एते दश तिल तोयांजलयः ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • तिलतोयपात्र : ॐ अद्य ........ गोत्र पितः ......... प्रेत एतानि दश-तिलतोय-पात्राणि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

  • दक्षिणा :- ॐ अद्य ..….. गोत्रस्य पितुः ........ प्रेतस्य (गोत्राया मातुः प्रेतायाः) कृतैतत् पूर्णत्वतृप्तताक्षुद्विपर्यय पूरक दशम पिण्डदान प्रतिष्ठार्थम् एतावत् (यद्दीयमान) द्रव्यमूल्यकं रजतं चन्द्रदैवतं .......... गोत्राय ........... शर्मणे ब्राह्मणायदक्षिणां अहं ददे ॥ (दातुमहमुत्सृज्ये)

दशगात्र पिण्डदान में अशौच वृद्धि होने पर नौ पिण्ड दान करके; दशवां पिण्ड क्षौर दिन देने का शास्त्रीय विधान है । त्रिरात्राशौच में क्रमशः ३, ४ और ३ पिण्ड देते हुए तीन दिन में ही १० पिण्ड देना चाहिए। सद्यः शौच में दशो पिण्ड स्नान के बाद ही दे देना चाहिए । क्षत्रियादि वर्णों को नौ पिण्ड प्रतिदिन देकर दशवां पिण्ड क्षौर कर्म के दिन देना चाहिए ।

द्वितीयादि पिण्डदान

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

तैल खल्ली :- ॐ अद्य ....... गोत्र ......... प्रेत इमे तैलखल्ली ते मया दीयेते तवोपतिष्ठेताम् ॥

तैल खल्ली

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति

सौरि-सूर्य-कुज वार क्षौर दोष शान्ति मंत्र :- ॐ केशवमानर्त्तपुरं पाटलीपुत्रपुरीमहीक्षत्राम् । दितिमदितिं स्मरतां क्षौरकर्मसु भवति कल्याणम् ॥

वार क्षौर दोष शान्ति

"सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं" (प्रथम खण्ड) : संशोधित मिथिलादेशीय श्राद्ध पद्धति