पार्थिव पूजनं
सर्वे लिङ्गमया लोकाः सर्वे लिङ्गे प्रतिष्ठिताः।
तस्मादभ्यर्चयेल्लिङ्गं यदीच्छेच्छाश्वतं पदम्॥
संपूर्ण कर्मकांड विधि द्वारा “पार्थिव पूजनं” मोबाइल अनुप्रयोग भी विकसित किया गया है। किन्तु मोबाईल अनुप्रयोग में सम्पूर्ण सामग्री व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत करना कठिन कार्य होता है अस्तु वहां सरलता से सम्पूर्ण वैदिक पार्थिव पूजन की प्रस्तुति के लिये यहां “सम्पूर्ण कर्मकांड विधि” पर यह विधि प्रस्तुत की गई है।
भूमिका
कृते रत्नमयं लिंगं त्रेतायां हेमसंभवम् ।
द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे ॥
यथा सर्वेषु देवेषु ज्येष्ठः श्रेष्ठो महेश्वरः ।
एवं सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
श्रीमद्भगवद्गीता/१६/२३
हम जो भी शास्त्रोक्त कर्म करें वह यदि शास्त्रीय विधि से करें तभी सार्थक और फलदायक होता है, शास्त्रविधि का त्याग करके किया गया कर्म नहीं।
वर्त्तमान में सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि कर्म में प्रवृत्त होकर भी उसकी शास्त्रीय विधि को जानने की मति ही होती, उचित विधि से प्रवृत्ति की तो बात ही क्या करें। आगे क्रमशः पार्थिव पूजन की प्रामाणिक विधियां स्पष्ट होंगी और एक स्थान पर सम्पूर्ण विधि नहीं मिलेगी अपितु अनेकों अनुभाग होंगे। एक स्थान पर पार्थिवार्चा में निर्माण व पूजा की पूरी विधि का प्रमाण भी संकलित किया गया है।
लिङ्ग पूजन होने से पूजा विधि भी सरल हो जाता है क्योंकि प्रतिमा बनाने की आवश्यकता नहीं होती। अनेकानेक प्रकार के शिवलिङ्गों का शास्त्रीय विधान है और उसमें से एक पार्थिव शिवलिङ्ग भी है। पार्थिव लिङ्ग का भी तात्पर्य केवल मिट्टी का के शिवलिङ्ग नहीं हैं तदपि मुख्य भाव ग्रहण किया जाता है और मिट्टी का लिङ्ग बनाकर भगवान शिव का पूजन किया जाता है। यही कारण है कि जब हम पार्थिव पूजन की बात करते हैं तो एक ही भाव उत्पन्न होता है – मिट्टी का शिवलिङ्ग बनाकर उनकी पूजा-आराधना करना।
जब महादेव पूजा कहते हैं तो भी मुख्य भाव यही होता है मिट्टी का लिङ्ग बनाकर भगवान शिव की पूजा। यद्यपि यह मुख्य भाव है नहीं तदपि यही ग्रहण किया जाता है।
अस्तु भगवान शिव की उपासना में पार्थिव शिवलिङ्ग निर्माण करके उनकी पूजा करना अपना विशेष महत्व रखता है और मुख्य भाव के रूप में ग्रहण भी किया जाता है। वर्त्तमान में पार्थिव पूजन की विशेष वृद्धि हुई है और श्रावण मास में तो हर कोई पार्थिव पूजन ही करता है।
विगत दो-तीन दशकों में और मुख्य रूप से एक ही दशक में पार्थिव पूजन का जो शास्त्रीय विधान है उसमें बहुत बड़ी व्यावहारिक विकृति को समाविष्ट होते देखा गया है। पूजा होने को तो अधिक होती है किन्तु पूजा विधान की बात करें तो उसका परित्याग कर दिया गया है और शास्त्रीय सिद्धांतों का परित्याग दिखने को मिलता है।
वर्त्तमान युग में सभी ज्ञान इंटरनेट और मोबाईल ऐप से प्राप्त करने का भी प्रचलन हो गया है, शास्त्रों का अवलोकन तो विलुप्त होता जा रहा है। इसका निदान भी यही है कि शास्त्रीय विधान आदि भी मोबाईल ऐप के माध्यम से उपलब्ध हो जिससे सामान्य जन भी शास्त्रीय सिद्धांतों को जान सकें, और शास्त्रीय विधि से पूजनादि में प्रवृत्त हों।
इसी उद्देश्य से पार्थिव पूजनं ऐप को विकसित किया गया है कि केवल कर्मकांडी ही नहीं सामान्य जन भी शास्त्रीय विधानों एवं अन्यान्य नियमों को भी जान सकें। सही विधि यदि ज्ञात ही न हो तो पालन की कल्पना नहीं की जा सकती। उचित विधि से पार्थिव पूजन हो इसके लिये यह आवश्यक है कि उसका ज्ञान भी हो।
इस अनुप्रयोग में सभी आवश्यक तथ्यों को संकलित करने का प्रयास किया गया है और जो कुछ छूटा भी हो उसे भविष्य में संकलित किया जा सकेगा। मुख्य रूप से विधि-विधान आदि का विश्लेषण करते हुये पार्थिव पूजन सामग्री, पार्थिव निर्माण और पार्थिव पूजन विधि एवं मंत्र को संकलित किया गया है। रुद्राष्टाध्यायी आदि के लिये अंतर्जाल से सामग्री उपलब्ध की गई है।
आइये हम पूजा करने के साथ-साथ मुख्य विधि-विधानों को भी समझें ताकि वह पूजा सार्थक हो, क्योंकि शास्त्रविधि से रहित किया गया कर्म निरर्थक ही होता है :
“कलौ चण्डीमहेश्वरौ” जैसा आर्ष वचन कलयुग में विशेष रूप चण्डी और महेश्वर की उपासना के लिये प्रेरित करता है। एक विशेषता यह भी है कि कामनापूर्ति में भी भगवान आशुतोष की उपासना विशेष लाभकारी है। अन्य देवी-देवताओं के लिये प्रतिमा आदि की आवश्यकता होती है किन्तु भगवान आशुतोष की उपासना में लिङ्ग पूजन ही विशेष महत्वपूर्ण है और विशेष कर लिङ्ग पूजन ही किया जाता है। भगवान शिव के मंदिर (शिवालय) में लिङ्ग की ही स्थापना की जाती है।
प्रस्तुति : संपूर्ण कर्मकांड विधि

